"नज़र" नज़र के सामने रहना नज़र के पास ही रहना नज़र की जो ज़रूरत हो वही अब काम तुम करना मुझे मालूम है अब ये ठिकाना हो नहीं सकता नज़र भर देख भी तो लूँ गुजारा हो नहीं सकता नज़र की बात करता हूँ नज़र पे रात करता हूँ फ़रेबी हुस्न कहती है तो उस से जा झगड़ता हूँ मुझे तो शौक़ नज़रों का तुम्हारा क्या करूँँ बोलो नज़र भर देख लो जाना मैं दुनिया छोड़ जाऊँगा नज़र का खेल है सब कुछ नज़र का जाल है सब कुछ नज़र देखो गिराता है नज़र देखो उठाता है नज़र चाहे बिगाड़ेगी नज़र चाहे सुधारेगी नज़रिया है तुम्हारा क्या नज़र ख़ुद ही बताएगी नज़र के जाल में पड़ने से बेहतर मर ही जाना है नज़र गर डालनी है तो चलो पुस्तक पे डालो तुम सही 'रंजन' कहा तुम ने नज़र पे क्या भरोसा है
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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नज़्म - बेबसी तेरे साथ गुज़रे दिनों की कोई एक धुँदली सी तस्वीर जब भी कभी सामने आएगी तो हमें एक दुआ थामने आएगी, बुढ़ापे की गहराइयों में उतरते हुए तेरी बे-लौस बाँहों के घेरे नहीं भूल पाएँगे हम हम को तेरे तवस्सुत से हँसते हुए जो मिले थे वो चेहरे नहीं भूल पाएँगे हम तेरे पहलू में लेटे हुओं का अजब क़र्ब है जो रात भर अपनी वीरान आँखों से तुझे तकते थे और तेरे शादाब शानों पे सिर रख के मरने की ख़्वाहिश में जीते रहे पर तेरे लम्स का कोई इशारा मुयस्सर नहीं था मगर इस जहाँ का कोई एक हिस्सा उन्हें तेरे बिस्तर से बेहतर नहीं था पर मोहब्बत को इस सब से कोई इलाका नहीं था एक दुख तो हम बहरहाल हम अपने सीनों में ले के मरेंगे कि हम ने मोहब्बत के दावे किए तेरे माथे पर सिंदूर टाँका नहीं इस सेे क्या फ़र्क पड़ता है दूर हैं तुझ सेे या पास हैं हम को कोई आदमी तो नहीं, हम तो एहसास हैं जो रहे तो हमेशा रहेंगे और गए तो मुड़ कर वापिस नहीं आएँगे
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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माँ मेरी ख़्वाहिश मेरी माता मेरा जीवन मेरी माता अगर आया हूँ दुनिया में वो ज़रिया हैं मेरी माता जो मेरी बात करती हैं ज़माने से भी लड़ जाऍं मुझे दर्पण दिखाती हैं ग़लत क्या है सही क्या है मुझे ग़ुस्सा दिखाती हैं मुझे पुचकारती भी हैं मगर दिल की वो सच्ची हैं वो जग में सब सेे अच्छी हैं मेरे अरमान के ख़ातिर वो आधी पेट खाती है वो ख़ुद का ग़म छुपाती हैं मुझे हँस के दिखाती हैं उन्हें उम्मीद है मुझ सेे करूँँगा नाम मैं रौशन बनूँगा शान मैं उन का उन्हीं के राह पे चल कर कभी जो टूट जाता हूँ सफ़र में छूट जाता हूँ वही इक हाथ देती हैं मुझे गिरने नहीं देती वो कहती हैं मेरे बेटे करो मेहनत रखो हिम्मत करो कोशिश सदा हरदम अभी उम्मीद मत हारो ज़रा सी आँधियाँ हैं ये तुम्हारा क्या बिगाड़ेंगी यक़ीनन चंद लम्हों में तुम्हें मंज़िल बुलाएगी वही जो दूर है तुम सेे वही फिर पास आएँगे जो रिश्ता तोड़ बैठे हैं वही अपना बुलाएँगे समय का खेल है सब कुछ समय ही सब बताएगा क़दम रोको नहीं इक दिन यही मंज़िल दिलाएगा भला कैसे बता रंजन ग़लत का रास्ता चुनता हाँ माँ के आँख में आँसू भला क्या देख सकता है
ABHISHEK RANJAN
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मेरी वाली नज़रों ही नज़रों में बातें करती है अपने ही धुन में वो खोई रहती है पैसा दौलत की उस को परवाह नहीं इश्क़ में सच्चा मजनूॅं उस को भाता है लंबी है माना पर दिल की सच्ची है जैसी भी हो मेरी वाली अच्छी है ज़ुल्फ़ बिखेरे गलियों में जब घू में वो ख़्वाहिश मेरी मेरा माथा चू में वो मैं रक्खूॅं रोज़ा वो भी उपवास करे हर लम्हा हर पल वो मेरे साथ रहे मुझ को देखे मुझ को सोचे बात करे मेरे ही ख़्वाबों में वो दिन रात करे ऐ मालिक तू मेरा उस को कर देना हाथ में मेहॅंदी मेरे नाम की भर देना
ABHISHEK RANJAN
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"तौबा है" 'रंजन' कल से सब चीज़ों से तौबा है मुझ को उस की उम्मीदों से तौबा है मेरा हो के नहीं मिरा जो बन पाए मुझ को हाँ ऐसे लोगों से तौबा है दिखलाना है मुझ को सीरत दिखलाओ प्यारी मनमोहक शक्लों से तौबा है कब तक वा'दा कर के नहीं निभाएँगे देश की हाँ इन ग़द्दारों से तौबा है प्यार में हारे लड़के मेरी बात सुने अब से इन सस्ते हीरों से तौबा है छोड़ो भी अब कितना आगे जाओगे 'रंजन' तेरी लंबी नज़्मों से तौबा है
ABHISHEK RANJAN
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"आँखें" मचलती झील सी मानो कोई दरिया है ये आँखें तुम्हारे दिल को जाने का कोई जरिया है ये आँखें तुम्हारे बाल ऊपर से ये मानो रश्क करते हैं जहाँ से ख़ूब-सूरत है बहुत बढ़िया हैं ये आँखें मुझे हैरान करती है मेरे ख़्वाबों में आ कर के कभी मुझ को डराती है मुझे ग़ुस्सा दिखा कर के ख़ुशी से झूम जाता हूँ अगर वो सामने हो तो जहाँ में है नहीं दूजा मेरे महबूब सी आँखें न सोता हूँ न रोता हूँ उसे ही याद करता हूँ न जाने बन गई कैसे मिरी दुनिया वही आँखें भरोसा था वही आँखें तो बदली है असंभव था भला कैसा ये जादू कर गया माशूक की आँखें नज़र से दिख ही जाता है दिलों में खलबली हो तो ज़माना पूछता है अब बनेगा आस क्या आँखें जिसे आँखें दिखाते हो वही तो रहनुमा था फिर समय बदला तो पत्थर बन गई देखो कई आँखें कभी तो सोच लो उन का जो तुम सेे दूर बैठे हैं वो आँखें कह रही है देख लेना आएगा इक दिन जो मुझ सेे दूर रहता है मेरी आँखें बनेगा वो वो बूढ़ा आदमी है आस में बैठा हुआ लेकिन ज़रा देखो न 'रंजन' क्या सहारा दे सकेगा वो सभी रिश्तों को कर धूमिल चुना जिस ने ग़लत आँखें
ABHISHEK RANJAN
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"हिज्र" चलो तुम छोड़कर जाओ यहाँ से ज़रा देखूँ कोई आया वहाँ से यही है आख़िरी पैग़ाम उस का किसी क़ीमत न मंज़िल से मैं भटकूँ तमन्ना साथ का करते हैं रब से मुझे रस्ता दिखाओ ना तुम मौला महक उस इत्र का अब तक न भूला लगा जो सामने आई थी मेरी मुझे बोला कि सुन ले ऐ मुसाफ़िर मिरा दिल साथ ले जाओगे क्या तुम लबों से यूँँ तो वो कुछ भी न बोली दिलों का खेल मानो चल रहा था दिलों के पास ही ख़ंजर छुपा था हाँ पागल था न मुझ को क्या पता था समय आया जहाँ रस्ता अलग था मिरा कमरा था उस का तो महल था मिटा के फ़ासले कैसे बनाता बता 'रंजन' उसे दुल्हन बनाता
ABHISHEK RANJAN
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