मेरी वाली नज़रों ही नज़रों में बातें करती है अपने ही धुन में वो खोई रहती है पैसा दौलत की उस को परवाह नहीं इश्क़ में सच्चा मजनूॅं उस को भाता है लंबी है माना पर दिल की सच्ची है जैसी भी हो मेरी वाली अच्छी है ज़ुल्फ़ बिखेरे गलियों में जब घू में वो ख़्वाहिश मेरी मेरा माथा चू में वो मैं रक्खूॅं रोज़ा वो भी उपवास करे हर लम्हा हर पल वो मेरे साथ रहे मुझ को देखे मुझ को सोचे बात करे मेरे ही ख़्वाबों में वो दिन रात करे ऐ मालिक तू मेरा उस को कर देना हाथ में मेहॅंदी मेरे नाम की भर देना
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए
Abrar Kashif
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"तौबा है" 'रंजन' कल से सब चीज़ों से तौबा है मुझ को उस की उम्मीदों से तौबा है मेरा हो के नहीं मिरा जो बन पाए मुझ को हाँ ऐसे लोगों से तौबा है दिखलाना है मुझ को सीरत दिखलाओ प्यारी मनमोहक शक्लों से तौबा है कब तक वा'दा कर के नहीं निभाएँगे देश की हाँ इन ग़द्दारों से तौबा है प्यार में हारे लड़के मेरी बात सुने अब से इन सस्ते हीरों से तौबा है छोड़ो भी अब कितना आगे जाओगे 'रंजन' तेरी लंबी नज़्मों से तौबा है
ABHISHEK RANJAN
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माँ मेरी ख़्वाहिश मेरी माता मेरा जीवन मेरी माता अगर आया हूँ दुनिया में वो ज़रिया हैं मेरी माता जो मेरी बात करती हैं ज़माने से भी लड़ जाऍं मुझे दर्पण दिखाती हैं ग़लत क्या है सही क्या है मुझे ग़ुस्सा दिखाती हैं मुझे पुचकारती भी हैं मगर दिल की वो सच्ची हैं वो जग में सब सेे अच्छी हैं मेरे अरमान के ख़ातिर वो आधी पेट खाती है वो ख़ुद का ग़म छुपाती हैं मुझे हँस के दिखाती हैं उन्हें उम्मीद है मुझ सेे करूँँगा नाम मैं रौशन बनूँगा शान मैं उन का उन्हीं के राह पे चल कर कभी जो टूट जाता हूँ सफ़र में छूट जाता हूँ वही इक हाथ देती हैं मुझे गिरने नहीं देती वो कहती हैं मेरे बेटे करो मेहनत रखो हिम्मत करो कोशिश सदा हरदम अभी उम्मीद मत हारो ज़रा सी आँधियाँ हैं ये तुम्हारा क्या बिगाड़ेंगी यक़ीनन चंद लम्हों में तुम्हें मंज़िल बुलाएगी वही जो दूर है तुम सेे वही फिर पास आएँगे जो रिश्ता तोड़ बैठे हैं वही अपना बुलाएँगे समय का खेल है सब कुछ समय ही सब बताएगा क़दम रोको नहीं इक दिन यही मंज़िल दिलाएगा भला कैसे बता रंजन ग़लत का रास्ता चुनता हाँ माँ के आँख में आँसू भला क्या देख सकता है
ABHISHEK RANJAN
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"मैं" मुझे मालूम है ये मैं कहाँ हूँ अभी तन्हाइयों में जी रहा हूँ वो लड़का कुछ नहीं कर पाएगा अब ये तोहमत मुस्कुरा के लिख रहा हूँ दिवाली में भी घर सुनसान मेरा महज़ परछाइयों का यक-जहाँ हूँ तुम्हारे बा'द देखो क्या हुआ है मैं अपनी मौत के दिन गिन रहा हूँ जो मेहनत कर रहे हो हारना मत मैं क़िस्मत का नहीं तेरा जहाँ हूँ कहेगा कौन इस हालत में 'रंजन' ज़रा ठहरो मैं तेरा हम-रहाँ हूँ
ABHISHEK RANJAN
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"वही जो" वही जो ख़ूब-सूरत है बहुत वो वही जो दिल में मेरे बस चुकी है वही जो मुझ सेे तो कुछ भी न कहती दिलों से बात करती है वो अक्सर इशारे में मुझे कहती है सब कुछ वही जो दिल की है अच्छी बहुत वो मुझे यूँॅं पास में अपने सुलाती मुझे वो रात को लोरी सुनाती मेरे नख़रे ख़ुशी से झेलती है वो अक्सर साथ मेरे खेलती है मुझे संसार का राजा बुलाती मैं रोता तो मुझे सीने लगाती अगर मैं बोल सकता तो मैं कहता हाँ तुम हो प्रेम की संगम मेरी माँ मुझे कहती है तुम इक काम करना बड़ा होकर के जग में नाम करना ग़रीबों की सदा इज़्ज़त हाँ करना ग़लत का साथ भी देना नहीं तुम
ABHISHEK RANJAN
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"नज़र" नज़र के सामने रहना नज़र के पास ही रहना नज़र की जो ज़रूरत हो वही अब काम तुम करना मुझे मालूम है अब ये ठिकाना हो नहीं सकता नज़र भर देख भी तो लूँ गुजारा हो नहीं सकता नज़र की बात करता हूँ नज़र पे रात करता हूँ फ़रेबी हुस्न कहती है तो उस से जा झगड़ता हूँ मुझे तो शौक़ नज़रों का तुम्हारा क्या करूँँ बोलो नज़र भर देख लो जाना मैं दुनिया छोड़ जाऊँगा नज़र का खेल है सब कुछ नज़र का जाल है सब कुछ नज़र देखो गिराता है नज़र देखो उठाता है नज़र चाहे बिगाड़ेगी नज़र चाहे सुधारेगी नज़रिया है तुम्हारा क्या नज़र ख़ुद ही बताएगी नज़र के जाल में पड़ने से बेहतर मर ही जाना है नज़र गर डालनी है तो चलो पुस्तक पे डालो तुम सही 'रंजन' कहा तुम ने नज़र पे क्या भरोसा है
ABHISHEK RANJAN
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