"मैं" मुझे मालूम है ये मैं कहाँ हूँ अभी तन्हाइयों में जी रहा हूँ वो लड़का कुछ नहीं कर पाएगा अब ये तोहमत मुस्कुरा के लिख रहा हूँ दिवाली में भी घर सुनसान मेरा महज़ परछाइयों का यक-जहाँ हूँ तुम्हारे बा'द देखो क्या हुआ है मैं अपनी मौत के दिन गिन रहा हूँ जो मेहनत कर रहे हो हारना मत मैं क़िस्मत का नहीं तेरा जहाँ हूँ कहेगा कौन इस हालत में 'रंजन' ज़रा ठहरो मैं तेरा हम-रहाँ हूँ
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मेरी वाली नज़रों ही नज़रों में बातें करती है अपने ही धुन में वो खोई रहती है पैसा दौलत की उस को परवाह नहीं इश्क़ में सच्चा मजनूॅं उस को भाता है लंबी है माना पर दिल की सच्ची है जैसी भी हो मेरी वाली अच्छी है ज़ुल्फ़ बिखेरे गलियों में जब घू में वो ख़्वाहिश मेरी मेरा माथा चू में वो मैं रक्खूॅं रोज़ा वो भी उपवास करे हर लम्हा हर पल वो मेरे साथ रहे मुझ को देखे मुझ को सोचे बात करे मेरे ही ख़्वाबों में वो दिन रात करे ऐ मालिक तू मेरा उस को कर देना हाथ में मेहॅंदी मेरे नाम की भर देना
ABHISHEK RANJAN
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"आँखें" मचलती झील सी मानो कोई दरिया है ये आँखें तुम्हारे दिल को जाने का कोई जरिया है ये आँखें तुम्हारे बाल ऊपर से ये मानो रश्क करते हैं जहाँ से ख़ूब-सूरत है बहुत बढ़िया हैं ये आँखें मुझे हैरान करती है मेरे ख़्वाबों में आ कर के कभी मुझ को डराती है मुझे ग़ुस्सा दिखा कर के ख़ुशी से झूम जाता हूँ अगर वो सामने हो तो जहाँ में है नहीं दूजा मेरे महबूब सी आँखें न सोता हूँ न रोता हूँ उसे ही याद करता हूँ न जाने बन गई कैसे मिरी दुनिया वही आँखें भरोसा था वही आँखें तो बदली है असंभव था भला कैसा ये जादू कर गया माशूक की आँखें नज़र से दिख ही जाता है दिलों में खलबली हो तो ज़माना पूछता है अब बनेगा आस क्या आँखें जिसे आँखें दिखाते हो वही तो रहनुमा था फिर समय बदला तो पत्थर बन गई देखो कई आँखें कभी तो सोच लो उन का जो तुम सेे दूर बैठे हैं वो आँखें कह रही है देख लेना आएगा इक दिन जो मुझ सेे दूर रहता है मेरी आँखें बनेगा वो वो बूढ़ा आदमी है आस में बैठा हुआ लेकिन ज़रा देखो न 'रंजन' क्या सहारा दे सकेगा वो सभी रिश्तों को कर धूमिल चुना जिस ने ग़लत आँखें
ABHISHEK RANJAN
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"तौबा है" 'रंजन' कल से सब चीज़ों से तौबा है मुझ को उस की उम्मीदों से तौबा है मेरा हो के नहीं मिरा जो बन पाए मुझ को हाँ ऐसे लोगों से तौबा है दिखलाना है मुझ को सीरत दिखलाओ प्यारी मनमोहक शक्लों से तौबा है कब तक वा'दा कर के नहीं निभाएँगे देश की हाँ इन ग़द्दारों से तौबा है प्यार में हारे लड़के मेरी बात सुने अब से इन सस्ते हीरों से तौबा है छोड़ो भी अब कितना आगे जाओगे 'रंजन' तेरी लंबी नज़्मों से तौबा है
ABHISHEK RANJAN
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"नाकामी" नाकामी में घिरा हुआ देखो 'रंजन' अपना कोई मुझ को आज न लगता है ज़िम्मेदारी मुझ पर देखो भारी है चुप ही रहना मेरी तो लाचारी है जो सोचा था आज भी उस से दूर हूँ मैं वक़्त के हाथों हाँ 'रंजन' मजबूर हूँ मैं जग हँसता है मुझ पर मुझ को फ़र्क नहीं जो अपना है वो क्यूँ मुझ पर हँसता है इधर उधर के लोग भी मुझ को क्या जाने अपने बच्चों को हरदम वो कहता है देखो लड़का उस से तुम तो दूर रहो सफल नहीं जो वो क्या सफल बनाएगा घर के पैसों पर ही देखो पलता है देखो तो कैसे वो शान से चलता है पापा की पूँजी में आग लगाता है दिल्ली में रह कर वो मौज उड़ाता है बोलो 'रंजन' ऐसे को मैं क्या बोलूँ हाँ सच है अब तक बिल्कुल नाकाम हूँ मैं मंज़िल थोड़ी दूर सही लेकिन देखो मरते दम तक मैं तो हार न मानूँगा अभी तो दुख के सैलाबों को सहना है जेब है ख़ाली मुझ को तन्हा रहना है हाँ काली मेघा कि ये तो आहट है मुझ को मंज़िल बस तेरी इक चाहत है नाकामी की चादर भी हट जाएगी आख़िर क़िस्मत कब तक मुझे रुलाएगी बस कुछ दिन में बादल ये छँट जाएगा 'रंजन' यक़ीं है मेरा दिन भी आएगा
ABHISHEK RANJAN
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माँ मेरी ख़्वाहिश मेरी माता मेरा जीवन मेरी माता अगर आया हूँ दुनिया में वो ज़रिया हैं मेरी माता जो मेरी बात करती हैं ज़माने से भी लड़ जाऍं मुझे दर्पण दिखाती हैं ग़लत क्या है सही क्या है मुझे ग़ुस्सा दिखाती हैं मुझे पुचकारती भी हैं मगर दिल की वो सच्ची हैं वो जग में सब सेे अच्छी हैं मेरे अरमान के ख़ातिर वो आधी पेट खाती है वो ख़ुद का ग़म छुपाती हैं मुझे हँस के दिखाती हैं उन्हें उम्मीद है मुझ सेे करूँँगा नाम मैं रौशन बनूँगा शान मैं उन का उन्हीं के राह पे चल कर कभी जो टूट जाता हूँ सफ़र में छूट जाता हूँ वही इक हाथ देती हैं मुझे गिरने नहीं देती वो कहती हैं मेरे बेटे करो मेहनत रखो हिम्मत करो कोशिश सदा हरदम अभी उम्मीद मत हारो ज़रा सी आँधियाँ हैं ये तुम्हारा क्या बिगाड़ेंगी यक़ीनन चंद लम्हों में तुम्हें मंज़िल बुलाएगी वही जो दूर है तुम सेे वही फिर पास आएँगे जो रिश्ता तोड़ बैठे हैं वही अपना बुलाएँगे समय का खेल है सब कुछ समय ही सब बताएगा क़दम रोको नहीं इक दिन यही मंज़िल दिलाएगा भला कैसे बता रंजन ग़लत का रास्ता चुनता हाँ माँ के आँख में आँसू भला क्या देख सकता है
ABHISHEK RANJAN
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