nazmKuch Alfaaz

मिरे पिन-कुशन में बहुत सी पिनें हैं और अक्सर पुणें इस में ऐसी हैं जो दूर अनजाने मुल्कों स आए ख़तों से निकाली गई हैं ये उस वक़्त ज़ाहिर हक़ीक़त की सूरत मिरे पिन-कुशन में लगी हैं अगर पिन-कुशन की हर इक पिन ये सोचे कि मैं तो फुलाँ देश की हूँ फुलाँ देश ने मेरा लोहा जना था फुलाँ देश ने मेरी सूरत गढ़ी थी तो ये सोचना पिन-कुशन की हक़ीक़त को ख़तरे में डाले न डाले पिनों को यक़ीनन जड़ों से हिला देगा और फिर ये सारी पिनें बे-सकत बे-जहत बे-हदफ़ यूँँही रुलती फिरेंगी

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

Allama Iqbal

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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चुनाँचे सर-ए-शाम हम सब किसी ख़ानदान-ए-फ़रंगी से बहर-ए-मुलाक़ात निकले यहाँ मेरा ''हम सब'' से मतलब है वो दूसरे हम-वतन और पड़ोसी कि जो मुल्क-ए-अफ़रंग की इस बड़ी जामिआ में हुसूल-ए-ज़र-ए-इल्म-ओ-दानिश को आए हुए थे ''किसी'' से ये मतलब है हम को ख़बर तक नहीं थी कि हम सब कहाँ जा रहे हैं कहाँ किस को किस शख़्स की मेज़बानी मिलेगी बहर-हाल ये ताइफ़ा अजनबी मेहमानों का इक दरमियाने से घर मेज़बानों ही की रहनुमाई में पहुँचा वहाँ हम से पहले भी कुछ लोग मौजूद थे रिवायात-ए-बेगानगी फ़रंगी में बस्ता तनाबों में बर्फ़ीले ठिठुरे हुए यख़-ज़दा मौसमों में मुक़य्यद मगर जिन के चेहरों पे उन की मईशत के रस्मी शगूफ़े खिले थे तआ'रुफ़ की इक मुख़्तसर तेज़ ठंडी सी गर्दान सो आख़िरी नाम के आख़िरी हर्फ़ की डूबती चंद लहरें सो आख़िरी हाथ के खुरदुरे चंद रेज़े मिरे हाफ़िज़े में तो कुछ भी नहीं रह गया था चुनाँचे तआ'रुफ़ के संगीन फर्शों को इक बार फिर से कुरेदा तो देखा सतह सख़्त थी और नाख़ुन बड़े नर्म थे इस अस्ना में इक ख़ानम मेज़बान दोनों हाथों में सैनी उठाए नबीद-ए-मुसफ़्फ़ा ओ गुल-रंग के कुछ बिलोरीं पियाले सजाए ब-सद-नाज़-ओ-अंदाज़ आईं अभी इस नबीद-ए-मुसफ़्फ़ा के दो चार चक्कर हुए थे कि बोसीदा रस्मों की ऊँची फ़सलें तअस्सुब के तारीक ज़िंदाँ तकल्लुफ़ की चिकनी मुँडेरें तसन्नो की पुर-ख़ार बाढ़ें सरासर ये सब गिर गईं और अजनबी हम-वतन बन गए

Partav Rohila

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हसीन काफ़ूरी उँगलियों में सफ़ेद सिगरेट लिए वो लड़की खड़ी खड़ी अपने शन्गरफ़ी नर्म होंटों से यूँँ लगाती कि जैसे जीवन के मोम-रस को वो घूँट भर भर के पी रही हो मगर तलब का विसाल-ए-लब का ये लम्हा तेज़-गाम ओ गुरेज़-पा था सियाह एड़ी ज़मीं पर इस को बे-हिसी से कुचल रही थी

Partav Rohila

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कोई कपड़े पे बूटे काढ़े कोई फूल बनाए कोई अपना बालक पाले कोई घर को सजाए कोई बस आवाज़ के बिल पर बुझते दीप जलाए कोई रंगों से काग़ज़ अंदर जीवन जोत जगाए कोई पत्थर ईंटें जोड़े ताज-महल बनाए कोई मिम्बर ऊपर कूके पाप अग्नी से डराए कोई घुँघरू बाँध के नाचे अंग कला दिखलाए कोई धरती क्यारी सींचे फल-फुलवारी उगाए कोई मिट्टी गूँधे उस को मांस समाँ बनाए कोई बैठा आँखें मीचे गूँगे शब्द बुलाए एक ही सब को रोग है पर तू हर मन को बर्माए कैसे कोई दूजे को नित अपना आप दिखाए

Partav Rohila

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मसर्रत के उस लम्हा-ए-बे-कराँ में कि हम दोनों लेटे हुए घास पर नीले आकाश को देखते थे तुम्हें याद होगा कि तुम ने कहा था ख़ुशी शादमानी की कितनी बड़ी और हसीं सल्तनत मेरे ज़ेर-ए-नगीं है ये मख़मल सा तोशक-नुमा सब्ज़ा हवा का ये कैफ़-ए-ख़ुमारीं चमकती हुई धूप के गर्म पैवस्त बोसे फ़लक की फ़राख़ी फ़ज़ाओं का ये मेहरबाना रवय्या और इन सब से बढ़ कर तुम्हारी मोहब्बत का सर-शार-ओ-पुर-शोर एहसास ख़ुदाया मसर्रत का ये लम्हा-ए-बे-कराँ मुझ को पागल न कर दे मगर आज जब हम वहीं अपने मानूस गोशे में पिन्हाँ उसी घास तख़्ते पे लेटे हुए नीले आकाश को देखते हैं तो महसूस होता है जैसे ज़मीन सिर्फ़ काँटे उगाती है चमकती हुई धूप पर तीर ही तीर हैं आसमाँ एक पत्थर की सिल की तरह सीने पर बोझ है हवाओं से दम घुट रहा है ख़ुशी शादमानी की वो सल्तनत लुट चुकी है और हम दोनों देहली से भागे हुए दो मुग़ल शाहज़ादे किसी अजनबी ग़ैर-मारूफ़ बस्ती की कोहना सराए में बे-ख़्वाब करवट बदलते बस इस ताक में हैं कि कब आँख झपके और हम अपने साथी के सीने में ख़ंजर उतारें

Partav Rohila

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