nazmKuch Alfaaz

हसीन काफ़ूरी उँगलियों में सफ़ेद सिगरेट लिए वो लड़की खड़ी खड़ी अपने शन्गरफ़ी नर्म होंटों से यूँँ लगाती कि जैसे जीवन के मोम-रस को वो घूँट भर भर के पी रही हो मगर तलब का विसाल-ए-लब का ये लम्हा तेज़-गाम ओ गुरेज़-पा था सियाह एड़ी ज़मीं पर इस को बे-हिसी से कुचल रही थी

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मिरे पिन-कुशन में बहुत सी पिनें हैं और अक्सर पुणें इस में ऐसी हैं जो दूर अनजाने मुल्कों स आए ख़तों से निकाली गई हैं ये उस वक़्त ज़ाहिर हक़ीक़त की सूरत मिरे पिन-कुशन में लगी हैं अगर पिन-कुशन की हर इक पिन ये सोचे कि मैं तो फुलाँ देश की हूँ फुलाँ देश ने मेरा लोहा जना था फुलाँ देश ने मेरी सूरत गढ़ी थी तो ये सोचना पिन-कुशन की हक़ीक़त को ख़तरे में डाले न डाले पिनों को यक़ीनन जड़ों से हिला देगा और फिर ये सारी पिनें बे-सकत बे-जहत बे-हदफ़ यूँँही रुलती फिरेंगी

Partav Rohila

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चुनाँचे सर-ए-शाम हम सब किसी ख़ानदान-ए-फ़रंगी से बहर-ए-मुलाक़ात निकले यहाँ मेरा ''हम सब'' से मतलब है वो दूसरे हम-वतन और पड़ोसी कि जो मुल्क-ए-अफ़रंग की इस बड़ी जामिआ में हुसूल-ए-ज़र-ए-इल्म-ओ-दानिश को आए हुए थे ''किसी'' से ये मतलब है हम को ख़बर तक नहीं थी कि हम सब कहाँ जा रहे हैं कहाँ किस को किस शख़्स की मेज़बानी मिलेगी बहर-हाल ये ताइफ़ा अजनबी मेहमानों का इक दरमियाने से घर मेज़बानों ही की रहनुमाई में पहुँचा वहाँ हम से पहले भी कुछ लोग मौजूद थे रिवायात-ए-बेगानगी फ़रंगी में बस्ता तनाबों में बर्फ़ीले ठिठुरे हुए यख़-ज़दा मौसमों में मुक़य्यद मगर जिन के चेहरों पे उन की मईशत के रस्मी शगूफ़े खिले थे तआ'रुफ़ की इक मुख़्तसर तेज़ ठंडी सी गर्दान सो आख़िरी नाम के आख़िरी हर्फ़ की डूबती चंद लहरें सो आख़िरी हाथ के खुरदुरे चंद रेज़े मिरे हाफ़िज़े में तो कुछ भी नहीं रह गया था चुनाँचे तआ'रुफ़ के संगीन फर्शों को इक बार फिर से कुरेदा तो देखा सतह सख़्त थी और नाख़ुन बड़े नर्म थे इस अस्ना में इक ख़ानम मेज़बान दोनों हाथों में सैनी उठाए नबीद-ए-मुसफ़्फ़ा ओ गुल-रंग के कुछ बिलोरीं पियाले सजाए ब-सद-नाज़-ओ-अंदाज़ आईं अभी इस नबीद-ए-मुसफ़्फ़ा के दो चार चक्कर हुए थे कि बोसीदा रस्मों की ऊँची फ़सलें तअस्सुब के तारीक ज़िंदाँ तकल्लुफ़ की चिकनी मुँडेरें तसन्नो की पुर-ख़ार बाढ़ें सरासर ये सब गिर गईं और अजनबी हम-वतन बन गए

Partav Rohila

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कोई कपड़े पे बूटे काढ़े कोई फूल बनाए कोई अपना बालक पाले कोई घर को सजाए कोई बस आवाज़ के बिल पर बुझते दीप जलाए कोई रंगों से काग़ज़ अंदर जीवन जोत जगाए कोई पत्थर ईंटें जोड़े ताज-महल बनाए कोई मिम्बर ऊपर कूके पाप अग्नी से डराए कोई घुँघरू बाँध के नाचे अंग कला दिखलाए कोई धरती क्यारी सींचे फल-फुलवारी उगाए कोई मिट्टी गूँधे उस को मांस समाँ बनाए कोई बैठा आँखें मीचे गूँगे शब्द बुलाए एक ही सब को रोग है पर तू हर मन को बर्माए कैसे कोई दूजे को नित अपना आप दिखाए

Partav Rohila

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मसर्रत के उस लम्हा-ए-बे-कराँ में कि हम दोनों लेटे हुए घास पर नीले आकाश को देखते थे तुम्हें याद होगा कि तुम ने कहा था ख़ुशी शादमानी की कितनी बड़ी और हसीं सल्तनत मेरे ज़ेर-ए-नगीं है ये मख़मल सा तोशक-नुमा सब्ज़ा हवा का ये कैफ़-ए-ख़ुमारीं चमकती हुई धूप के गर्म पैवस्त बोसे फ़लक की फ़राख़ी फ़ज़ाओं का ये मेहरबाना रवय्या और इन सब से बढ़ कर तुम्हारी मोहब्बत का सर-शार-ओ-पुर-शोर एहसास ख़ुदाया मसर्रत का ये लम्हा-ए-बे-कराँ मुझ को पागल न कर दे मगर आज जब हम वहीं अपने मानूस गोशे में पिन्हाँ उसी घास तख़्ते पे लेटे हुए नीले आकाश को देखते हैं तो महसूस होता है जैसे ज़मीन सिर्फ़ काँटे उगाती है चमकती हुई धूप पर तीर ही तीर हैं आसमाँ एक पत्थर की सिल की तरह सीने पर बोझ है हवाओं से दम घुट रहा है ख़ुशी शादमानी की वो सल्तनत लुट चुकी है और हम दोनों देहली से भागे हुए दो मुग़ल शाहज़ादे किसी अजनबी ग़ैर-मारूफ़ बस्ती की कोहना सराए में बे-ख़्वाब करवट बदलते बस इस ताक में हैं कि कब आँख झपके और हम अपने साथी के सीने में ख़ंजर उतारें

Partav Rohila

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