मसर्रत के उस लम्हा-ए-बे-कराँ में कि हम दोनों लेटे हुए घास पर नीले आकाश को देखते थे तुम्हें याद होगा कि तुम ने कहा था ख़ुशी शादमानी की कितनी बड़ी और हसीं सल्तनत मेरे ज़ेर-ए-नगीं है ये मख़मल सा तोशक-नुमा सब्ज़ा हवा का ये कैफ़-ए-ख़ुमारीं चमकती हुई धूप के गर्म पैवस्त बोसे फ़लक की फ़राख़ी फ़ज़ाओं का ये मेहरबाना रवय्या और इन सब से बढ़ कर तुम्हारी मोहब्बत का सर-शार-ओ-पुर-शोर एहसास ख़ुदाया मसर्रत का ये लम्हा-ए-बे-कराँ मुझ को पागल न कर दे मगर आज जब हम वहीं अपने मानूस गोशे में पिन्हाँ उसी घास तख़्ते पे लेटे हुए नीले आकाश को देखते हैं तो महसूस होता है जैसे ज़मीन सिर्फ़ काँटे उगाती है चमकती हुई धूप पर तीर ही तीर हैं आसमाँ एक पत्थर की सिल की तरह सीने पर बोझ है हवाओं से दम घुट रहा है ख़ुशी शादमानी की वो सल्तनत लुट चुकी है और हम दोनों देहली से भागे हुए दो मुग़ल शाहज़ादे किसी अजनबी ग़ैर-मारूफ़ बस्ती की कोहना सराए में बे-ख़्वाब करवट बदलते बस इस ताक में हैं कि कब आँख झपके और हम अपने साथी के सीने में ख़ंजर उतारें
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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चुनाँचे सर-ए-शाम हम सब किसी ख़ानदान-ए-फ़रंगी से बहर-ए-मुलाक़ात निकले यहाँ मेरा ''हम सब'' से मतलब है वो दूसरे हम-वतन और पड़ोसी कि जो मुल्क-ए-अफ़रंग की इस बड़ी जामिआ में हुसूल-ए-ज़र-ए-इल्म-ओ-दानिश को आए हुए थे ''किसी'' से ये मतलब है हम को ख़बर तक नहीं थी कि हम सब कहाँ जा रहे हैं कहाँ किस को किस शख़्स की मेज़बानी मिलेगी बहर-हाल ये ताइफ़ा अजनबी मेहमानों का इक दरमियाने से घर मेज़बानों ही की रहनुमाई में पहुँचा वहाँ हम से पहले भी कुछ लोग मौजूद थे रिवायात-ए-बेगानगी फ़रंगी में बस्ता तनाबों में बर्फ़ीले ठिठुरे हुए यख़-ज़दा मौसमों में मुक़य्यद मगर जिन के चेहरों पे उन की मईशत के रस्मी शगूफ़े खिले थे तआ'रुफ़ की इक मुख़्तसर तेज़ ठंडी सी गर्दान सो आख़िरी नाम के आख़िरी हर्फ़ की डूबती चंद लहरें सो आख़िरी हाथ के खुरदुरे चंद रेज़े मिरे हाफ़िज़े में तो कुछ भी नहीं रह गया था चुनाँचे तआ'रुफ़ के संगीन फर्शों को इक बार फिर से कुरेदा तो देखा सतह सख़्त थी और नाख़ुन बड़े नर्म थे इस अस्ना में इक ख़ानम मेज़बान दोनों हाथों में सैनी उठाए नबीद-ए-मुसफ़्फ़ा ओ गुल-रंग के कुछ बिलोरीं पियाले सजाए ब-सद-नाज़-ओ-अंदाज़ आईं अभी इस नबीद-ए-मुसफ़्फ़ा के दो चार चक्कर हुए थे कि बोसीदा रस्मों की ऊँची फ़सलें तअस्सुब के तारीक ज़िंदाँ तकल्लुफ़ की चिकनी मुँडेरें तसन्नो की पुर-ख़ार बाढ़ें सरासर ये सब गिर गईं और अजनबी हम-वतन बन गए
Partav Rohila
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मिरे पिन-कुशन में बहुत सी पिनें हैं और अक्सर पुणें इस में ऐसी हैं जो दूर अनजाने मुल्कों स आए ख़तों से निकाली गई हैं ये उस वक़्त ज़ाहिर हक़ीक़त की सूरत मिरे पिन-कुशन में लगी हैं अगर पिन-कुशन की हर इक पिन ये सोचे कि मैं तो फुलाँ देश की हूँ फुलाँ देश ने मेरा लोहा जना था फुलाँ देश ने मेरी सूरत गढ़ी थी तो ये सोचना पिन-कुशन की हक़ीक़त को ख़तरे में डाले न डाले पिनों को यक़ीनन जड़ों से हिला देगा और फिर ये सारी पिनें बे-सकत बे-जहत बे-हदफ़ यूँँही रुलती फिरेंगी
Partav Rohila
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कोई कपड़े पे बूटे काढ़े कोई फूल बनाए कोई अपना बालक पाले कोई घर को सजाए कोई बस आवाज़ के बिल पर बुझते दीप जलाए कोई रंगों से काग़ज़ अंदर जीवन जोत जगाए कोई पत्थर ईंटें जोड़े ताज-महल बनाए कोई मिम्बर ऊपर कूके पाप अग्नी से डराए कोई घुँघरू बाँध के नाचे अंग कला दिखलाए कोई धरती क्यारी सींचे फल-फुलवारी उगाए कोई मिट्टी गूँधे उस को मांस समाँ बनाए कोई बैठा आँखें मीचे गूँगे शब्द बुलाए एक ही सब को रोग है पर तू हर मन को बर्माए कैसे कोई दूजे को नित अपना आप दिखाए
Partav Rohila
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हसीन काफ़ूरी उँगलियों में सफ़ेद सिगरेट लिए वो लड़की खड़ी खड़ी अपने शन्गरफ़ी नर्म होंटों से यूँँ लगाती कि जैसे जीवन के मोम-रस को वो घूँट भर भर के पी रही हो मगर तलब का विसाल-ए-लब का ये लम्हा तेज़-गाम ओ गुरेज़-पा था सियाह एड़ी ज़मीं पर इस को बे-हिसी से कुचल रही थी
Partav Rohila
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