nazmKuch Alfaaz

चुनाँचे सर-ए-शाम हम सब किसी ख़ानदान-ए-फ़रंगी से बहर-ए-मुलाक़ात निकले यहाँ मेरा ''हम सब'' से मतलब है वो दूसरे हम-वतन और पड़ोसी कि जो मुल्क-ए-अफ़रंग की इस बड़ी जामिआ में हुसूल-ए-ज़र-ए-इल्म-ओ-दानिश को आए हुए थे ''किसी'' से ये मतलब है हम को ख़बर तक नहीं थी कि हम सब कहाँ जा रहे हैं कहाँ किस को किस शख़्स की मेज़बानी मिलेगी बहर-हाल ये ताइफ़ा अजनबी मेहमानों का इक दरमियाने से घर मेज़बानों ही की रहनुमाई में पहुँचा वहाँ हम से पहले भी कुछ लोग मौजूद थे रिवायात-ए-बेगानगी फ़रंगी में बस्ता तनाबों में बर्फ़ीले ठिठुरे हुए यख़-ज़दा मौसमों में मुक़य्यद मगर जिन के चेहरों पे उन की मईशत के रस्मी शगूफ़े खिले थे तआ'रुफ़ की इक मुख़्तसर तेज़ ठंडी सी गर्दान सो आख़िरी नाम के आख़िरी हर्फ़ की डूबती चंद लहरें सो आख़िरी हाथ के खुरदुरे चंद रेज़े मिरे हाफ़िज़े में तो कुछ भी नहीं रह गया था चुनाँचे तआ'रुफ़ के संगीन फर्शों को इक बार फिर से कुरेदा तो देखा सतह सख़्त थी और नाख़ुन बड़े नर्म थे इस अस्ना में इक ख़ानम मेज़बान दोनों हाथों में सैनी उठाए नबीद-ए-मुसफ़्फ़ा ओ गुल-रंग के कुछ बिलोरीं पियाले सजाए ब-सद-नाज़-ओ-अंदाज़ आईं अभी इस नबीद-ए-मुसफ़्फ़ा के दो चार चक्कर हुए थे कि बोसीदा रस्मों की ऊँची फ़सलें तअस्सुब के तारीक ज़िंदाँ तकल्लुफ़ की चिकनी मुँडेरें तसन्नो की पुर-ख़ार बाढ़ें सरासर ये सब गिर गईं और अजनबी हम-वतन बन गए

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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"उजड़ते बसते घर" बहुत तूफ़ान हैं मेरी जान, न घर बना इस ख़ुश्क साहिल पे सुनो! ये घर नहीं बस रेत का छोटा घरौंदा है, न जाने कितने तूफ़ानों ने कितनी बार रौंदा है बहुत टूटा है और फिर टूट कर बनता बिगड़ता है, ये मेरी हसरतों को चैन देकर फिर उजड़ता है उजड़कर चल पड़ा ये फिर किसी उजड़े से साहिल पे तो क्या? तूफ़ान हैं मेरी जान पर! तू घर बना इसी ख़ुश्क साहिल पे

Anmol Mishra

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हवा का एक झोंका ऐसे गुज़रा कि अपने साथ उस सूनी सड़क पर पड़े बेजान पीले हो चुके उन आम के इमली के गुलमोहर के पत्तों को जिन्हें हम रोज़ अपने पाँव से बाइक के टायर से कुचलते देते थे और इग्नोर कर के आगे बढ़ जाते थे.. अपने साथ सड़कों के किनारों पर बने उन छोटे सूखे नालों में सरका के फेंक आया ये पत्ते याद दिलवाते हैं उन बीते पलों की कि जब हम अपनी धुन में कान में वो लीड ठूँसे अपनी मस्ती से गुज़रते थे किसी जाती हुई स्कूटी पर शहरीली परी को उस के शानों से लटकते बेहया आँचल को बेहद ध्यान से तकते हुए और पास आ कर बोल कर कि "देखिए ये ख़ुश-नसीब आँचल कहीं ग़लती से टायर में न फँस जाए" ओवर टेक करते थे ज़रा सा तेज़ चल कर और आगे बाईं जानिब वो चचा जो 10 की सिगरेट हम को अक्सर 9 में देते थे और उन की ये मुहब्बत पाँव की ज़ंजीर होती थी जो हम को रोक देती थी इन्हें इग्नोर करने से कि ऑफ़िस लेट पहुँचो.. डोंट केयर मगर याँ एक कश तो खींच ही लो क़सम से लॉकडाउन क्या हुआ है ये सब कुछ एक पुरानी फ़िल्म का एक सीन सा मालूम होता है कि जिस में हीरो ग़लती से बहुत पीछे चला आया जहाँ पर दूर तक इंसान क्या हैवान भी ढूँढ़े नहीं मिलते दुआ करता हूँ हम सब इस बला से जीत जाएँ हमारे पाँव चलती ज़िन्दगी के ब्रेक से हट कर दुबारा एक्सेलेटर को दबाएँ !!

Shadab Javed

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हसीन काफ़ूरी उँगलियों में सफ़ेद सिगरेट लिए वो लड़की खड़ी खड़ी अपने शन्गरफ़ी नर्म होंटों से यूँँ लगाती कि जैसे जीवन के मोम-रस को वो घूँट भर भर के पी रही हो मगर तलब का विसाल-ए-लब का ये लम्हा तेज़-गाम ओ गुरेज़-पा था सियाह एड़ी ज़मीं पर इस को बे-हिसी से कुचल रही थी

Partav Rohila

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मिरे पिन-कुशन में बहुत सी पिनें हैं और अक्सर पुणें इस में ऐसी हैं जो दूर अनजाने मुल्कों स आए ख़तों से निकाली गई हैं ये उस वक़्त ज़ाहिर हक़ीक़त की सूरत मिरे पिन-कुशन में लगी हैं अगर पिन-कुशन की हर इक पिन ये सोचे कि मैं तो फुलाँ देश की हूँ फुलाँ देश ने मेरा लोहा जना था फुलाँ देश ने मेरी सूरत गढ़ी थी तो ये सोचना पिन-कुशन की हक़ीक़त को ख़तरे में डाले न डाले पिनों को यक़ीनन जड़ों से हिला देगा और फिर ये सारी पिनें बे-सकत बे-जहत बे-हदफ़ यूँँही रुलती फिरेंगी

Partav Rohila

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कोई कपड़े पे बूटे काढ़े कोई फूल बनाए कोई अपना बालक पाले कोई घर को सजाए कोई बस आवाज़ के बिल पर बुझते दीप जलाए कोई रंगों से काग़ज़ अंदर जीवन जोत जगाए कोई पत्थर ईंटें जोड़े ताज-महल बनाए कोई मिम्बर ऊपर कूके पाप अग्नी से डराए कोई घुँघरू बाँध के नाचे अंग कला दिखलाए कोई धरती क्यारी सींचे फल-फुलवारी उगाए कोई मिट्टी गूँधे उस को मांस समाँ बनाए कोई बैठा आँखें मीचे गूँगे शब्द बुलाए एक ही सब को रोग है पर तू हर मन को बर्माए कैसे कोई दूजे को नित अपना आप दिखाए

Partav Rohila

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मसर्रत के उस लम्हा-ए-बे-कराँ में कि हम दोनों लेटे हुए घास पर नीले आकाश को देखते थे तुम्हें याद होगा कि तुम ने कहा था ख़ुशी शादमानी की कितनी बड़ी और हसीं सल्तनत मेरे ज़ेर-ए-नगीं है ये मख़मल सा तोशक-नुमा सब्ज़ा हवा का ये कैफ़-ए-ख़ुमारीं चमकती हुई धूप के गर्म पैवस्त बोसे फ़लक की फ़राख़ी फ़ज़ाओं का ये मेहरबाना रवय्या और इन सब से बढ़ कर तुम्हारी मोहब्बत का सर-शार-ओ-पुर-शोर एहसास ख़ुदाया मसर्रत का ये लम्हा-ए-बे-कराँ मुझ को पागल न कर दे मगर आज जब हम वहीं अपने मानूस गोशे में पिन्हाँ उसी घास तख़्ते पे लेटे हुए नीले आकाश को देखते हैं तो महसूस होता है जैसे ज़मीन सिर्फ़ काँटे उगाती है चमकती हुई धूप पर तीर ही तीर हैं आसमाँ एक पत्थर की सिल की तरह सीने पर बोझ है हवाओं से दम घुट रहा है ख़ुशी शादमानी की वो सल्तनत लुट चुकी है और हम दोनों देहली से भागे हुए दो मुग़ल शाहज़ादे किसी अजनबी ग़ैर-मारूफ़ बस्ती की कोहना सराए में बे-ख़्वाब करवट बदलते बस इस ताक में हैं कि कब आँख झपके और हम अपने साथी के सीने में ख़ंजर उतारें

Partav Rohila

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