"प्रेरक" दिन भर में पढ़ता था 'दिनकर' और 'मुंशी जी' के लेख शुरू से पसंद थे मुझे 'ग़ालिब' और 'फ़ैज़' 'निराला' था बचपन मेरा 'जॉन साहब' से जैसे कोई रिश्ता है 'भगत सिंह' के विचारो से प्रेरित मैं और मेरे जैसे अनेक 'हरिवंश जी' की मधुशाला में डूबने का करता है मन कभी तो कभी फ़ासला हुआ अपनो से तो 'निदा फ़ाजली' के क़रीब गया मैं 'अमृता प्रीतम जी' से जाना की ख़ुदा लेगा इम्तिहान मेरा भी इश्क़ में 'साहिर' सा लिख पाऊँ मैं भी कभी 'कुमार' को पढ़के ये 'विश्वास' जगा मुझ में
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"शायद" शायद किसी दौर में किसी युग में हम ने एक दूसरे से वा'दा किया होगा कि अभी नहीं तो कभी और हम एक दूसरे से मिलेंगे तो ज़रूर हम ने एक दूसरे का कितना इंतिज़ार किया होगा तब से ले कर अब तक कितने और लोगों में हम ने एक दूसरे को ढूँढा होगा या शायद अब मिले भी हैं तो नहीं याद होगा वो कुछ भी जो कभी रहा होगा हमारे दरमियाँ या कभी कुछ रहा ही नहीं होगा ये मेरी मात्र कल्पना होगी पर तुम्हें देख कर तो यही लगता है मुझे कि शायद किसी दौर में किसी युग में हम ने एक दूसरे से वा'दा किया होगा कि अभी नहीं तो कभी और हम एक दूसरे से मिलेंगे तो ज़रूर तुम बहुत रूठती होगी उस वक़्त मुझ सेे क्यूँँकि मैं भूल जाता हूँ छोटी छोटी बातें जैसे की तुम्हारी आँखों में खो कर मुझे याद नहीं रहा होगा की तुम ने कैसे कपड़े पहने थे वक़्त का ध्यान न रहता होगा मुझे तुम याद दिलाती मुझे कि अब देर हो गई है बहुत, जाना पड़ेगा कभी कभी तुम सेे मिलने के उत्साह में मैं ने कई बार देरी भी की होगी और तुम ने मूँह फूला कर मुझ सेे नाराज़गी भी जताई होगी कि तुम हमेशा देर कर देते हो शायद उस वक़्त की तरह मैं ने आने में अब भी देर कर दी पर मुझे तुम्हें मनाना आता था और तुम मान जाती थी अब वो मनाने के तरीक़े मुझे न जाने क्यूँ याद नहीं आ रहे या फिर ये सब मेरी मात्र कल्पना ही है पर तुम्हें देख कर तो यही लगता है मुझे कि शायद किसी दौर में किसी युग में हम ने एक दूसरे से वा'दा किया होगा कि अभी नहीं तो कभी और हम एक दूसरे से मिलेंगे तो ज़रूर
Rudhraxx
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"चाय" ये चाय है न ये तुम्हारी याद दिलाती है इस सेे भी इश्क़ है और तुम सेे भी हमेशा एक कप ज़्यादा ही बन जाती है लगता है की काश तुम साथ होती पास बैठते कुछ बातें होती तुम्हारी बातो का स्वाद भी मुझे इस की तरह बेहद पसंद है इस का भी उतना ही नशा है जितना तुम्हारी नज़रों का आज तुम साथ नहीं हो पर ये चाय तो है और ये चाय है न ये तुम्हारी याद दिलाती है इस सेे भी इश्क़ है और तुम सेे भी हमेशा एक कप ज़्यादा ही बन जाती है
Rudhraxx
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