1 मुझ से अंजान बने दूर बहुत दूर सही सामने बैठा नज़र आता है मुझ को महसूस ये होता है मिरी उम्र के सारे लम्हे तितलियाँ बन के तिरी सम्त उड़े जाते हैं और तिरे चार तरफ़ रंग-दर-रंग कई हाले बनाते हुए लहराते हैं फूल चुन चुन के पलट आते हैं मुझे महकाते हैं 2 मुझ से अंजान बने पास बहुत पास से तो जब गुज़रे मुझ को महसूस ये होता है मिरी उम्र के सारे लम्हे रूठ कर मुझ से बहुत दूर किसी सहरा में धूप में जलते हैं तपते हुए ज़र्रों से लिपट जाते हैं और चिंगारियाँ बन बन के पलट आते हैं मुझे झुलसाते हैं
Related Nazm
वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
160 likes
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
54 likes
मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
161 likes
जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”
Zubair Ali Tabish
67 likes
More from Nahid Qasmi
जाने किस जंगल से आ कर भेड़ियों गीदड़ों, लोमड़ियों ने तेरी हुदूद में अपने ठिकाने ढूँड लिए हैं लेकिन तेरे घर में कली कली को चूमता तितली तितली आँख-मिचोली खेलता मेमनों और ख़रगोशों को हम-राह लिए इक नन्हा सा बच्चा तुझ को अब भी शहर बनाए हुए है
Nahid Qasmi
0 likes
अंधी रात के आते ही सब चुप-चाप से इक गोशे में सिमट गए पर मैं ने अपनी कुटिया की तारीकी से जंग की ठानी ख़ुद को इक मटकी के दिए में ढाल दिया तब छोटे से आँगन में नन्ही-मुन्नी मस़्काती किरनों ने झूमर डाला सब के रौशन रौशन चेहरे हँसने लगे लेकिन सुब्ह के जागते ही मिरी थकी थकी सी नन्ही-मुन्नी किरनों को ठोकर से उड़ाते दूर तक फैले हुए खेत में शबनम के क़ुमक़ु में मिटाते रौशनी के अम्बारों में से रस्ता बनाते जगमग जगमग सूरज के ऐवाँ की जानिब बढ़ने वालो! मेरे अपनो मुझ को कुटिया के एक ताक़ में रख कर भूल गए हो?
Nahid Qasmi
0 likes
रुख़्सत होते सूरज की किरनों का आँचल था में था में मैं भी छत पर जा पहुँची थी मिरे गिले-शिकवे तो सारे गूँगे बन बैठे थे और मेरी कुछ कहती आँखें बारह-दरी की चिलमन के हालों में फॅंसती थीं फिर क्यूँँ गाँव से जाते जाते गली के मोड़ पे रुकते रुकते तुम ने ऊपर, मेरी जानिब देखा था और तुम्हारा उठता हाथ ज़रा सा काँप गया था और तुम्हारी रौशन रौशन आँखें बुझ सी गई थीं दूर उफ़ुक़ में सूरज डूब गया था
Nahid Qasmi
0 likes
तुम्हें ये उज़्र है तुम को जो दी गई है ज़मीं वो मुख़्तसर है बहुत जो बाज़ुओं में समेटो तो वो सिमट जाए इसी लिए हो तुम एहसास-ए-कम-तरी का शिकार और उन को कितनी इरादत से देखते हो जिन्हें ज़मीं मिली है हुदूद-ए-निगाह से भी बहुत दूर दूर फैली हुई सुनो ज़मीं की वुसअत तो कोई चीज़ नहीं जो नस्ल आएगी कल वो हदें न नापेगी फ़क़त ये देखेगी कि जो लताफ़त-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र यहाँ पर है क़रीब ओ दूर कहीं भी नहीं कहीं भी नहीं तुम अपने काँधों पे अपना ही सर तुलूअ' करो सफ़र शुरूअ करो
Nahid Qasmi
0 likes
माना मैं इक शहज़ादी हूँ जो क़ैदी है लेकिन मेरे दिल में शहज़ादे की चाह का कोई तीर नहीं है मेरी आँखें उस की राह नहीं तकती हैं फिर भी देव की क़ैद से छुट कर दूर हरे खेतों, नीले दरियाओं, शफ़क़ी बादलों, गाते ताएरों ख़ुशबुओं से लदे हुए झोंकों को छूना चाहूँ चूमना चाहूँ उन में घुल-मिल जाना चाहूँ (मेरे शहज़ादे! मैं जानूँ तू भी तो ये सब कुछ करना चाहता होगा)
Nahid Qasmi
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Nahid Qasmi.
Similar Moods
More moods that pair well with Nahid Qasmi's nazm.







