रुख़्सत होते सूरज की किरनों का आँचल था में था में मैं भी छत पर जा पहुँची थी मिरे गिले-शिकवे तो सारे गूँगे बन बैठे थे और मेरी कुछ कहती आँखें बारह-दरी की चिलमन के हालों में फॅंसती थीं फिर क्यूँँ गाँव से जाते जाते गली के मोड़ पे रुकते रुकते तुम ने ऊपर, मेरी जानिब देखा था और तुम्हारा उठता हाथ ज़रा सा काँप गया था और तुम्हारी रौशन रौशन आँखें बुझ सी गई थीं दूर उफ़ुक़ में सूरज डूब गया था
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
ZafarAli Memon
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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अंधी रात के आते ही सब चुप-चाप से इक गोशे में सिमट गए पर मैं ने अपनी कुटिया की तारीकी से जंग की ठानी ख़ुद को इक मटकी के दिए में ढाल दिया तब छोटे से आँगन में नन्ही-मुन्नी मस़्काती किरनों ने झूमर डाला सब के रौशन रौशन चेहरे हँसने लगे लेकिन सुब्ह के जागते ही मिरी थकी थकी सी नन्ही-मुन्नी किरनों को ठोकर से उड़ाते दूर तक फैले हुए खेत में शबनम के क़ुमक़ु में मिटाते रौशनी के अम्बारों में से रस्ता बनाते जगमग जगमग सूरज के ऐवाँ की जानिब बढ़ने वालो! मेरे अपनो मुझ को कुटिया के एक ताक़ में रख कर भूल गए हो?
Nahid Qasmi
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अपनी अपनी राहों पर मुद्दत तक चलते चलते आज अचानक इक चौराहे पर जो तुम से मेल हुआ तो मैं ने तेरी गहरी आँखों में झाँका और चौंक उठी इन में तपते सहराओं का बसेरा था और दूर दूर तक वीराने थे रीत के धुँदले धुँदले बादल उड़ते फिरते थे लेकिन मैं ने एक लम्हे को ये मंज़र भी देख लिया कि तपते जलते सहराओं में मेरे नाम का इक आँसू, इक ठंडा मीठा नख़लिस्तान भी उगा हुआ था
Nahid Qasmi
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जाने किस जंगल से आ कर भेड़ियों गीदड़ों, लोमड़ियों ने तेरी हुदूद में अपने ठिकाने ढूँड लिए हैं लेकिन तेरे घर में कली कली को चूमता तितली तितली आँख-मिचोली खेलता मेमनों और ख़रगोशों को हम-राह लिए इक नन्हा सा बच्चा तुझ को अब भी शहर बनाए हुए है
Nahid Qasmi
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माना मैं इक शहज़ादी हूँ जो क़ैदी है लेकिन मेरे दिल में शहज़ादे की चाह का कोई तीर नहीं है मेरी आँखें उस की राह नहीं तकती हैं फिर भी देव की क़ैद से छुट कर दूर हरे खेतों, नीले दरियाओं, शफ़क़ी बादलों, गाते ताएरों ख़ुशबुओं से लदे हुए झोंकों को छूना चाहूँ चूमना चाहूँ उन में घुल-मिल जाना चाहूँ (मेरे शहज़ादे! मैं जानूँ तू भी तो ये सब कुछ करना चाहता होगा)
Nahid Qasmi
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जुस्तुजू का निडर क़ाफ़िला मिशअलें थाम कर, रात को चीरता हँसता गाता हुआ, अपनी मंज़िल की जानिब रवाना हुआ सब के चेहरों पर रौशन हुईं काविशें खोजी आँखों में झिलमिल सितारे जले कितनी रौशन फ़ज़ा कितनी रौशन फ़ज़ा!! आओ अपने क़दम तेज़ कर लें कि वो सामने अपनी मेहनत का पौदा तनावर शजर बन गया पर ये रौशन फ़ज़ा में धुँदलका सा क्यूँँ छा गया (मिशअलों को जलाए रखो साथियो, गीत गाते रहो, आगे बढ़ते रहो) एक चमकीला गोशा दिखाई नहीं दे रहा, किन अँधेरों की फ़ौजों का हमला हुआ (मिशअलों को जलाए रखो) मंज़िलें तो क़रीब आ गईं फिर ये क़दमों में बेड़ी सी क्या! फिर ये आँखों पे बादल से क्यूँँ मिश्अलों की क़तारें रुकीं (और चलते हुए साए भी थम गए) गीत सब तौक़-ए-गर्दन हुए क़ाफ़िला दायरा बन गया झुक गया रो दिया एक मंज़र सदा के लिए गीली आँखों में ज़िंदा हुआ एक बाज़ू गिरा एक मिशअल बुझी एक रौशन जवाँ जुस्तुजू सो गई एक चमकीला गोशा अँधेरा हुआ
Nahid Qasmi
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