जुस्तुजू का निडर क़ाफ़िला मिशअलें थाम कर, रात को चीरता हँसता गाता हुआ, अपनी मंज़िल की जानिब रवाना हुआ सब के चेहरों पर रौशन हुईं काविशें खोजी आँखों में झिलमिल सितारे जले कितनी रौशन फ़ज़ा कितनी रौशन फ़ज़ा!! आओ अपने क़दम तेज़ कर लें कि वो सामने अपनी मेहनत का पौदा तनावर शजर बन गया पर ये रौशन फ़ज़ा में धुँदलका सा क्यूँँ छा गया (मिशअलों को जलाए रखो साथियो, गीत गाते रहो, आगे बढ़ते रहो) एक चमकीला गोशा दिखाई नहीं दे रहा, किन अँधेरों की फ़ौजों का हमला हुआ (मिशअलों को जलाए रखो) मंज़िलें तो क़रीब आ गईं फिर ये क़दमों में बेड़ी सी क्या! फिर ये आँखों पे बादल से क्यूँँ मिश्अलों की क़तारें रुकीं (और चलते हुए साए भी थम गए) गीत सब तौक़-ए-गर्दन हुए क़ाफ़िला दायरा बन गया झुक गया रो दिया एक मंज़र सदा के लिए गीली आँखों में ज़िंदा हुआ एक बाज़ू गिरा एक मिशअल बुझी एक रौशन जवाँ जुस्तुजू सो गई एक चमकीला गोशा अँधेरा हुआ
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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राजा बोला रात है रानी बोली रात है मंत्री बोला रात है संतरी बोला रात है ये सुब्ह सुब्ह की बात है
Gorakh Pandey
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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जाने किस जंगल से आ कर भेड़ियों गीदड़ों, लोमड़ियों ने तेरी हुदूद में अपने ठिकाने ढूँड लिए हैं लेकिन तेरे घर में कली कली को चूमता तितली तितली आँख-मिचोली खेलता मेमनों और ख़रगोशों को हम-राह लिए इक नन्हा सा बच्चा तुझ को अब भी शहर बनाए हुए है
Nahid Qasmi
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रुख़्सत होते सूरज की किरनों का आँचल था में था में मैं भी छत पर जा पहुँची थी मिरे गिले-शिकवे तो सारे गूँगे बन बैठे थे और मेरी कुछ कहती आँखें बारह-दरी की चिलमन के हालों में फॅंसती थीं फिर क्यूँँ गाँव से जाते जाते गली के मोड़ पे रुकते रुकते तुम ने ऊपर, मेरी जानिब देखा था और तुम्हारा उठता हाथ ज़रा सा काँप गया था और तुम्हारी रौशन रौशन आँखें बुझ सी गई थीं दूर उफ़ुक़ में सूरज डूब गया था
Nahid Qasmi
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अंधी रात के आते ही सब चुप-चाप से इक गोशे में सिमट गए पर मैं ने अपनी कुटिया की तारीकी से जंग की ठानी ख़ुद को इक मटकी के दिए में ढाल दिया तब छोटे से आँगन में नन्ही-मुन्नी मस़्काती किरनों ने झूमर डाला सब के रौशन रौशन चेहरे हँसने लगे लेकिन सुब्ह के जागते ही मिरी थकी थकी सी नन्ही-मुन्नी किरनों को ठोकर से उड़ाते दूर तक फैले हुए खेत में शबनम के क़ुमक़ु में मिटाते रौशनी के अम्बारों में से रस्ता बनाते जगमग जगमग सूरज के ऐवाँ की जानिब बढ़ने वालो! मेरे अपनो मुझ को कुटिया के एक ताक़ में रख कर भूल गए हो?
Nahid Qasmi
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माना मैं इक शहज़ादी हूँ जो क़ैदी है लेकिन मेरे दिल में शहज़ादे की चाह का कोई तीर नहीं है मेरी आँखें उस की राह नहीं तकती हैं फिर भी देव की क़ैद से छुट कर दूर हरे खेतों, नीले दरियाओं, शफ़क़ी बादलों, गाते ताएरों ख़ुशबुओं से लदे हुए झोंकों को छूना चाहूँ चूमना चाहूँ उन में घुल-मिल जाना चाहूँ (मेरे शहज़ादे! मैं जानूँ तू भी तो ये सब कुछ करना चाहता होगा)
Nahid Qasmi
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अपनी अपनी राहों पर मुद्दत तक चलते चलते आज अचानक इक चौराहे पर जो तुम से मेल हुआ तो मैं ने तेरी गहरी आँखों में झाँका और चौंक उठी इन में तपते सहराओं का बसेरा था और दूर दूर तक वीराने थे रीत के धुँदले धुँदले बादल उड़ते फिरते थे लेकिन मैं ने एक लम्हे को ये मंज़र भी देख लिया कि तपते जलते सहराओं में मेरे नाम का इक आँसू, इक ठंडा मीठा नख़लिस्तान भी उगा हुआ था
Nahid Qasmi
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