nazmKuch Alfaaz

अपनी अपनी राहों पर मुद्दत तक चलते चलते आज अचानक इक चौराहे पर जो तुम से मेल हुआ तो मैं ने तेरी गहरी आँखों में झाँका और चौंक उठी इन में तपते सहराओं का बसेरा था और दूर दूर तक वीराने थे रीत के धुँदले धुँदले बादल उड़ते फिरते थे लेकिन मैं ने एक लम्हे को ये मंज़र भी देख लिया कि तपते जलते सहराओं में मेरे नाम का इक आँसू, इक ठंडा मीठा नख़लिस्तान भी उगा हुआ था

Related Nazm

"मशवरा" बदलेंगे लोग बदलेंगे उन के तेवर भी जाने अनजाने में हर तेवर समझता हूँ मैं अपने अलफ़ाज़ को दिल-ओ-दिमाग़ से लिखता हूँ दिल टूटा आशिक़ हूँ हर रंग को परखता हूँ अपनी उन हरकत और बे-वजह प्यार पर होने पर एक शाम ख़ुद में कहीं खटकता हूँ तस्वीर को देख कर तेरी ले कर तेरा नाम उन पुरानी याद में हर रोज़ कहीं भटकता हूँ तेरी सब चीज़ और सब तोहफ़ों को ख़ूब उनहें सँवार कर और सँभाले रखता हूँ भूल कर तुझ को अपने मन से रद्द कर के तेरी यादें शुरू करने एक नई ज़िंदगी सुब्ह-सवेरे निकलता हूँ बे-वफ़ा मैं न तुझे कहूँगा न ही ख़ुद को मतलबी रहो हमेशा तुम ख़ुशहाल मिन्नतें इस की करता हूँ मशवरा-ए-ज़फ़र सुन लो दोस्तों आज मैं तुम को कहता हूँ पहले राज़ी वालिदैन को बा'द ही इश्क़ करना रोज़ ऐसे कितने आशिक़ों मैं देखता बिछड़ता हूँ

ZafarAli Memon

14 likes

"इंसान" मैं हिंदू, तू मुसलमान है अब अपनी यही पहचान है? 'गीता' मेरे हिस्से में आई तेरे हिस्से में 'कुरान' है अब अपनी यही पहचान है? अल्लाह तेरा हाफ़िज़ है मेरा रक्षक भगवान है अब अपनी यही पहचान है? तेरा मुल्क पाकिस्तान मेरा देश हिंदुस्तान है अब अपनी यही पहचान है? तेरा मुल्क जिंदाबाद मेरा भारत महान है अब अपनी यही पहचान है? हिंदू, मुसलमान से पहले हम सिर्फ़ एक इंसान हैं आओ मिल कर कहें, कि अब हमारी एक ही पहचान है

Vikas Sangam

8 likes

भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ

Lal Chand Falak

14 likes

"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

236 likes

"अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है" गुज़रती उम्र ढ़लती जा रही है ज़मीं पाँव निगलती जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है परी आगे निकलती जा रही है सितारे बारी-बारी बुझ रहे हैं हवा मोअत्तर होती जा रही है चमकती जा रही है कोई मछली समुंदर बर्फ़ करती जा रही है मैं अपनी नाव में बेकस पड़ा हूँ उफकती नब्ज़ डूबी जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है अँधेरा ही समुंदर का ख़ुदा है ख़ुदा मछली पकड़ना चाहता है

Ammar Iqbal

13 likes

More from Nahid Qasmi

अंधी रात के आते ही सब चुप-चाप से इक गोशे में सिमट गए पर मैं ने अपनी कुटिया की तारीकी से जंग की ठानी ख़ुद को इक मटकी के दिए में ढाल दिया तब छोटे से आँगन में नन्ही-मुन्नी मस़्काती किरनों ने झूमर डाला सब के रौशन रौशन चेहरे हँसने लगे लेकिन सुब्ह के जागते ही मिरी थकी थकी सी नन्ही-मुन्नी किरनों को ठोकर से उड़ाते दूर तक फैले हुए खेत में शबनम के क़ुमक़ु में मिटाते रौशनी के अम्बारों में से रस्ता बनाते जगमग जगमग सूरज के ऐवाँ की जानिब बढ़ने वालो! मेरे अपनो मुझ को कुटिया के एक ताक़ में रख कर भूल गए हो?

Nahid Qasmi

0 likes

जाने किस जंगल से आ कर भेड़ियों गीदड़ों, लोमड़ियों ने तेरी हुदूद में अपने ठिकाने ढूँड लिए हैं लेकिन तेरे घर में कली कली को चूमता तितली तितली आँख-मिचोली खेलता मेमनों और ख़रगोशों को हम-राह लिए इक नन्हा सा बच्चा तुझ को अब भी शहर बनाए हुए है

Nahid Qasmi

0 likes

रुख़्सत होते सूरज की किरनों का आँचल था में था में मैं भी छत पर जा पहुँची थी मिरे गिले-शिकवे तो सारे गूँगे बन बैठे थे और मेरी कुछ कहती आँखें बारह-दरी की चिलमन के हालों में फॅंसती थीं फिर क्यूँँ गाँव से जाते जाते गली के मोड़ पे रुकते रुकते तुम ने ऊपर, मेरी जानिब देखा था और तुम्हारा उठता हाथ ज़रा सा काँप गया था और तुम्हारी रौशन रौशन आँखें बुझ सी गई थीं दूर उफ़ुक़ में सूरज डूब गया था

Nahid Qasmi

0 likes

तुम्हें ये उज़्र है तुम को जो दी गई है ज़मीं वो मुख़्तसर है बहुत जो बाज़ुओं में समेटो तो वो सिमट जाए इसी लिए हो तुम एहसास-ए-कम-तरी का शिकार और उन को कितनी इरादत से देखते हो जिन्हें ज़मीं मिली है हुदूद-ए-निगाह से भी बहुत दूर दूर फैली हुई सुनो ज़मीं की वुसअत तो कोई चीज़ नहीं जो नस्ल आएगी कल वो हदें न नापेगी फ़क़त ये देखेगी कि जो लताफ़त-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र यहाँ पर है क़रीब ओ दूर कहीं भी नहीं कहीं भी नहीं तुम अपने काँधों पे अपना ही सर तुलूअ' करो सफ़र शुरूअ करो

Nahid Qasmi

0 likes

1 मुझ से अंजान बने दूर बहुत दूर सही सामने बैठा नज़र आता है मुझ को महसूस ये होता है मिरी उम्र के सारे लम्हे तितलियाँ बन के तिरी सम्त उड़े जाते हैं और तिरे चार तरफ़ रंग-दर-रंग कई हाले बनाते हुए लहराते हैं फूल चुन चुन के पलट आते हैं मुझे महकाते हैं 2 मुझ से अंजान बने पास बहुत पास से तो जब गुज़रे मुझ को महसूस ये होता है मिरी उम्र के सारे लम्हे रूठ कर मुझ से बहुत दूर किसी सहरा में धूप में जलते हैं तपते हुए ज़र्रों से लिपट जाते हैं और चिंगारियाँ बन बन के पलट आते हैं मुझे झुलसाते हैं

Nahid Qasmi

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Nahid Qasmi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Nahid Qasmi's nazm.