nazmKuch Alfaaz

ख़ाक में ख़ाक मिली और हुआ क़िस्सा तमाम आग में आग मिले तो भड़के आब में आब मिले तो मचले ख़ाक में ख़ाक मिले और हो सब क़िस्सा तमाम जैसे साए पे गिरा हो साया जैसे छा जाए शाम गर्म पुर-शोर से दिन का ये भयानक अंजाम वक़्त बे-रहम ग़ज़बनाक बला का सफ़्फ़ाक वक़्त वो सैल-ए-रवाँ जिस के आगे जो चले वो भी मरे जिस से पीछे जो रहे वो भी मरे और वो वक़्त की तस्ख़ीर को निकला था कभी फिर वो रस्ते में रहा शाम हुई देर हुई ख़ाक में ख़ाक मिली उस को मालूम था ''रेत आईना है'' आईना कैसा है किरची किरची धूप ऐसी कि मुंडेरों से गिरी जाती है ख़्वाब से रंग चुराना आग से ख़ुद को बचाना कोई आसाँ तो नहीं वक़्त से आगे निकलना होगा सो वो निकला और फिर रंग में रंग मिला आग से आग जली ख़ाक में ख़ाक मिली ज़िंदगी खुल के हँसी

Related Nazm

"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

180 likes

क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

42 likes

"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

158 likes

जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”

Zubair Ali Tabish

67 likes

वे डरते हैं किस चीज़ से डरते हैं वे तमाम धन-दौलत गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ? वे डरते हैं कि एक दिन निहत्थे और ग़रीब लोग उन सेे डरना बंद कर देंगे

Gorakh Pandey

33 likes

More from Faheem Shanas Kazmi

मुंडेरों से जब धूप उतरी अभी रात जागी नहीं थी अभी ख़्वाब का चाँद सहरा में सोया हुआ था समुंदर के बालों में चाँदी चमकती नहीं थी किसी ताक़ में भी दिए की कोई लो भड़कती नहीं थी फ़ज़ाओं में गीतों की महकार थी परिंदे अभी आशियानों को भूले नहीं थे वो सपनों में खोई हुई थी ज़माने पे जब धूप उतरी तो उस ने बदन को समेटा नहीं था ये मिट्टी की ज़रख़ेज़ी जागी नहीं थी सो जब रात उतरी ज़मीं ख़्वाब ख़ुश्बू ये मौसम ये मैं मेरी आँखें मिरा दिल उसे रो रहे थे ज़माने पर जब रात उतरी

Faheem Shanas Kazmi

0 likes

अली-बाबा ये उजलत हिम्मतों को पस्त करती है मोहब्बत रास्ते में मौत को तज्वीज़ करती है हवस तेरी घने जंगल से चोरों को मिरी बस्ती में ले आई वो चालीस चोर..... बस्ती के गली-कूचों में अब मक़्तल सजाते हैं अली-बाबा ख़ज़ाना पाने की उजलत तिरे माज़ी की महरूमी का अबतर शाख़साना है ये तेरी बद-नसीबी से भी बद-तर इक फ़साना है नहीं है कोई मरजीना, तिरी अच्छी कनीज़ों में जो बस्ती को बचा लेती सलामत है न तेरा घर न मेरा दिल न अब दरबार-ए-शाहाना? तुझे क्या है? हवस तेरी रहे बाक़ी ये बस्ती आग की तस्वीर हो जाए अगर ये राख का ही ढेर हो जाए तुझे क्या है? कनीज़ों ख़ासा-दारों और ग़ुलामों से तुझे फ़ुर्सत नहीं मिलती वही बग़दाद जिस के सब गली-कूचे कभी थे मह-वशों के गुल-रुख़ों के आईना-ख़ाने सितारे आसमाँ से झुक के जिन को रोज़ तकते थे जो औराक़-ए-मुसव्वर थे वहाँ पर धूल उड़ती है हर इक जानिब अजल की हुक्मरानी है ज़मीं पर आग जलती है ज़मीं पर आग जलती है अली-बाबा ख़ज़ाना पाने की मसर्रत से ज़ियादा अब अज़िय्यत है ख़ज़ाना पाने की उजलत हवस तेरी घने जंगल से चोरों को मिरी बस्ती में ले आई कोई सिम-सिम कोई भी इस्म-ए-आज़म अब हमारी मुश्किलें आसाँ नहीं करता कोई दरमाँ नहीं करता

Faheem Shanas Kazmi

0 likes

कितने मंज़र टूट के गिरते रहते हैं इन आँखों से यख़-बस्ता पातालों में कितने दुख हर लम्हा लिपटे रहते हैं उजले पाँव के छालों से किन यादों का बोझ उठाए फिरते हैं हम ज़ेहनों में जो बाक़ी नहीं हवालों में चाँदनी जैसे कितने ही जिस्म डूबते डूबते चीख़ रहे थे मिट्टी के कच्चे प्यालों में और अब तो कुछ ऐसा है जिन की ख़ातिर हम ने सारी उम्र गँवाई याद नहीं वो आए गुज़रे सालों में

Faheem Shanas Kazmi

0 likes

ख़्वाब गर्मी की छुट्टीयों पे गए हो गए बंद गेट आँखों के इश्क़ को दाख़िला मिला ही नहीं ख़्वाहिशें लॉकरों में क़ैद रहीं जो बिके उस के दाम अच्छे हों ज़िंदगी हो कि कोई तितली हो बे-सबाती के रंग कच्चे हैं कौन बतलाए उन ज़मीनों को जंगलों के घने दरख़्तों में गर ख़िज़ाँ बेले-डांस करती हो मिस्र को कौन याद करता है कम नहीं लखनऊ की उमराओ इस से बेहतर यहाँ पे हैं फ़िरऔन कौन सा देवता और क्या र'अमीस मिर्ज़ा-'वाजिद'-अली भी कम तो नहीं कौन गिर्या करे, करे मातम कौन तारीख़-ए-किश्त-ओ-ख़ूँ को पढ़े बेबसी गीत बुनती रहती है दोनों आँखों को ढाँपे हाथों से

Faheem Shanas Kazmi

0 likes

इस के आदाब तो पहले सीखो ख़ाक में ख़ून-ए-रग-ए-जाँ तो मिला कर देखो आँख दरिया तो बना कर देखो शाम की ठंडी हवा रास्तों को देगी बोसे ख़्वाब आँखों में समुंदर का उतर आएगा रंग में रंग मिलेंगे गीत फिर छेड़ेंगे दरिया के किनारे अश्जार आईना देखते हो सतह-ए-दरिया पे जहाँ काई बने आईना चाँदनी झील की लहरों पे बने आईना अश्क आँखों से गिरे और बने आईना सारबानों के क़दम चूमते जो दश्त बने आईना आतिश-ए-ग़म से जले दिल तो बने आईना आँख से साफ़ करो गर्द नज़र तेज़ करो ख़ाक में ख़्वाब मिलाओ उसे महमेज़ करो

Faheem Shanas Kazmi

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Faheem Shanas Kazmi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Faheem Shanas Kazmi's nazm.