nazmKuch Alfaaz

"रख़्त-ए-सफ़र" अगर ये रुकना मुहाल न हो अगर ये अर्जेंट कॉल न हो न जाने पर गर वबाल न हो तो मेरी मानो ठहर ही जाओ न दूर जा कर मुझे सताओ ये क्या कहा कि नहीं रुकोगे सफ़र ज़रूरी है चल पड़ोगे किसी की मिन्नत नहीं सुनोगे जो ठान ली है तो कर ही दोगे तो मुझ को मेरा ये दर मुबारक तुम्हें वो उजला शहर मुबारक ऐ मेरे पहलू से जाने वाले नए शहर का सफ़र मुबारक जो अब सफ़र पर निकल पड़े हो नई डगर पर जो चल पड़े हो तो अपने दिल का ख़याल रखना मेरी मुहब्बत सँभाल रखना

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"दुख" मुझे जो लगा, वो नहीं हूँ मैं अब उस जगह तो नहीं हूँ तू इक कॉल मैसेज नहीं कर रही है कि ऐसी वो क्या ही शिकायत है? जो मुझ सेे तू कर नहीं पा रही है बताती नहीं है सताती रही है मुझे तू बता क्यूँ ख़फ़ा है मुझे तू बता क्या हुआ है तू कुछ बोल ये ख़ामोशी काटती है मुझे जान ले बस ये आँखें किसे रोती है बस? मुझे किस का दुख है? मुझे पूछ तू फिर बताऊँ तेरा नाम मैं और तुझे मैं सुनाऊँ दिखाऊँ मेरा ग़म मेरे ज़ख़्म जो भर नहीं पा रहे हैं मुझे तेरे ऐसे सताने का दुख है तेरे लौट के फिर न आने का दुख है मेरे पास आ मेरा दुख जान लड़की सखी कोई इतना ख़फ़ा भी नहीं होता है जैसे कि तू है कि ग़ुस्सा ज़ियादा दिनो तक नहीं करना होता है समझी ए लड़की कि ग़लती भुलाने के ख़ातिर बनी है मोहब्बत निभाने के ख़ातिर बनी है कि जब दोस्ती कर ली जाए उसे फिर निभाना भी होता है लड़की मुझे याद है तू मगर मैं भुलाया गया हूँ तू बेशक मुझे छोड़ दे पर ज़रा सुन कहीं भी कभी भी किसी भी हाँ दरिया ने प्यासे को प्यासा नहीं मारा है फिर तो अब तू चली आ घड़ी हाथ की बंद हो जाए इस सेे के पहले चली आ मेरे हाथ को थाम ले दोस्त ये ज़िंदगी बाय बोले मुझे इस सेे पहले तू आ और मुझे तू गले से लगा ले

BR SUDHAKAR

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ये वक़्त क्या है ये वक़्त क्या है ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है ये जब न गुज़रा था तब कहाँ था कहीं तो होगा गुज़र गया है तो अब कहाँ है कहीं तो होगा कहाँ से आया किधर गया है ये कब से कब तक का सिलसिला है ये वक़्त क्या है ये वाक़िए हादसे तसादुम हर एक ग़म और हर इक मसर्रत हर इक अज़िय्यत हर एक लज़्ज़त हर इक तबस्सुम हर एक आँसू हर एक नग़्मा हर एक ख़ुशबू वो ज़ख़्म का दर्द हो कि वो लम्स का हो जादू ख़ुद अपनी आवाज़ हो कि माहौल की सदाएँ ये ज़ेहन में बनती और बिगड़ती हुई फ़ज़ाएँ वो फ़िक्र में आए ज़लज़ले हों कि दिल की हलचल तमाम एहसास सारे जज़्बे ये जैसे पत्ते हैं बहते पानी की सतह पर जैसे तैरते हैं अभी यहाँ हैं अभी वहाँ हैं और अब हैं ओझल दिखाई देता नहीं है लेकिन ये कुछ तो है जो कि बह रहा है ये कैसा दरिया है किन पहाड़ों से आ रहा है ये किस समुंदर को जा रहा है ये वक़्त क्या है कभी कभी मैं ये सोचता हूँ कि चलती गाड़ी से पेड़ देखो तो ऐसा लगता है दूसरी सम्त जा रहे हैं मगर हक़ीक़त में पेड़ अपनी जगह खड़े हैं तो क्या ये मुमकिन है सारी सदियाँ क़तार-अंदर-क़तार अपनी जगह खड़ी हों ये वक़्त साकित हो और हम ही गुज़र रहे हों इस एक लम्हे में सारे लम्हे तमाम सदियाँ छुपी हुई हों न कोई आइंदा न गुज़िश्ता जो हो चुका है जो हो रहा है जो होने वाला है हो रहा है मैं सोचता हूँ कि क्या ये मुमकिन है सच ये हो कि सफ़र में हम हैं गुज़रते हम हैं जिसे समझते हैं हम गुज़रता है वो थमा है गुज़रता है या थमा हुआ है इकाई है या बटा हुआ है है मुंजमिद या पिघल रहा है किसे ख़बर है किसे पता है ये वक़्त क्या है ये काएनात-ए-अज़ीम लगता है अपनी अज़्मत से आज भी मुतइन नहीं है कि लम्हा लम्हा वसीअ-तर और वसीअ-तर होती जा रही है ये अपनी बाँहें पसारती है ये कहकशाओं की उँगलियों से नए ख़लाओं को छू रही है अगर ये सच है तो हर तसव्वुर की हद से बाहर मगर कहीं पर यक़ीनन ऐसा कोई ख़ला है कि जिस को इन कहकशाओं की उँगलियों ने अब तक छुआ नहीं है ख़ला जहाँ कुछ हुआ नहीं है ख़ला कि जिस ने किसी से भी ''कुन'' सुना नहीं है जहाँ अभी तक ख़ुदा नहीं है वहाँ कोई वक़्त भी न होगा ये काएनात-ए-अज़ीम इक दिन छुएगी इस अन-छुए ख़ला को और अपने सारे वजूद से जब पुकारेगी ''कुन'' तो वक़्त को भी जनम मिलेगा अगर जनम है तो मौत भी है मैं सोचता हूँ ये सच नहीं है कि वक़्त की कोई इब्तिदा है न इंतिहा है ये डोर लंबी बहुत है लेकिन कहीं तो इस डोर का सिरा है अभी ये इंसाँ उलझ रहा है कि वक़्त के इस क़फ़स में पैदा हुआ यहीं वो पला-बढ़ा है मगर उसे इल्म हो गया है कि वक़्त के इस क़फ़स से बाहर भी इक फ़ज़ा है तो सोचता है वो पूछता है ये वक़्त क्या है

Javed Akhtar

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मुश्किल और आसानी में से एक अगर चुनना हो तो हम आसानी ही चुनते हैं मुश्किल बात गले के एवज़ पेट के पास से आती है उस को बाहर आते आते एक ज़माना लगता है मुश्किल है ये कह पाना के "यार, मुझे ग़म खाता है जैसे जैसे रात उतरती है तो रोना आता है" हो सालों का रिश्ता चाहे ये भी कहना मुश्किल है "जब तक ज़ख़्म नहीं भरता ये तू तो हाल सुनेगा ना ? तू तो बहुत क़रीब है मेरे तू तो मदद करेगा ना ?" बस इतनी सी बात बताने में सदियां लग जाती हैं आख़िर में हम बहुत सोच कर फिर आसानी चुनते है कह देते हैं, "हाँ मैं बढ़िया, मुझ को क्या ही होना है" वो भी 'बढ़िया' कह देता है बात ख़तम हो जाती है

Siddharth Saaz

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"नाम तुम्हारा" देखो मैं ने नज़्म लिखी है इक छोटे सादे काग़ज़ पर एक हँसी होंठों पर ले कर तुम इस को चुपके से पढ़ना लोग अगर कुछ पूछें तुम सेे चुप ही रहना कुछ मत कहना ख़्वाब मेरे कुछ लिक्खे होंगे कुछ ख़ुशियों की बातें होंगी अल साए से दिन कुछ होंगे कुछ सहमी सी रातें होंगी एक नदी भी बहती होगी कुछ परियाँ भी उड़ती होंगी चाँद वहीं पर बैठा होगा थक कर घर को लौटा होगा फूल खिले होंगे काग़ज़ पर बरसातों का मौसम होगा तितली होगी पंछी होंगे इठलाता सा सावन होगा एक अँधेरे से जंगल में सावन की बारिश में खिलते नील कँवल को चुनने जाते दिख जाएँगे तुम को बच्चे दूर कहीं इक बस्ती होगी रात गए देखोगे उस में एक दिया जलता सहमा सा औ उस में जलती उम्मीदें उस छोटे काग़ज़ पर मैं ने सारी दुनिया लिख डाली है सारी ख़ुशियाँ भी लिक्खी हैं और ग़मों की हरियाली है पर्वत भी है झरना भी है जीवन है औ मरना भी है और ख़ुदा भी तो लिक्खा है वाँ तो कोने में रक्खा है तुम भी हैराँ सोच रही हो सारी बातें खोज रही हो मैं तुम को पागल लगता हूँ सब लिक्खा है सच कहता हूँ कुछ ही हर्फ़ लिखे थे मैं ने इन में सब दुनिया सिमटी है ग़ौर करो तुम फिर से देखो नाम तुम्हारा लिक्खा है बस

Ashutosh Kumar "Baagi"

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"पहला इश्क़" तअर्रुफ़ हुआ था अभी ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा गुज़रा है बातें होती थी बहुत ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा सुधरा है अंकों में दिलचस्पी मुझे उर्दू का थोड़ा-सा ज्ञान था वो अंग्रेज़ी से वाक़िफ़ बहुत लेकिन शून्य सा अभिमान था पसंद उन की आँखों में काजल और उन पर वो चश्मा था उन्हें पसंद मेरी घनी दाढ़ी और आँखों में सुरमा था कभी ये ला दो तो कभी वो ला दो मैं ने की हर ख़्वाहिश पूरी लेकिन महरम बनाने की मेरी ख़्वाहिश रह गई अधूरी कहा था उन्होंने पहले ही मुझ से रख दो अपने माँ-बाप को अर्ज़ी पर ज़फ़र डरता खोने से उन को और कहा जैसी रब की मर्ज़ी न जाने कौन सा लज़ीज़ वक़्त था की इश्क़ की रसोई को हम ने पकाया अगर अलाहिदा करना ही था मक़्सद तो फिर क्यूँँ हम दोनों को मिलाया

ZafarAli Memon

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"एक लम्हा" सारी दुनिया जिसे दिन समझ कर कारख़ानों की जानिब चली जा रही है इस को क्या ही ख़बर है कि चेहरे पे इस के वक़्त के हाथों कालिख़ मली जा रही है किस को मअ'लूम है हम जिसे दिन समझते हैं वो रात हो मैं तो सूरज के उगने को, दुनिया के उठने को गाड़ियों के हार्न से होने वाले शोर और शराबे को इस जहाँ के ख़राबे को रात गरदान्ता हूँ और वो लम्हा कि जब चाँद की परत पर एक चेहरा नमूदार हो जाता है होश खो जाता है मैं उसी एक लम्हे को दिन मानता हूँ

Salman Yusuf

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"सख़्त लम्हें" वक़्त थोड़ा मुश्किल है रात थोड़ी भारी है आँख के कटोरे से अश्कबारी जारी है वस्ल की उम्मीदों पर बेबसी के साए हैं गुलशनों की राहों पर नाचती ख़िज़ाएँ है ये जो सख़्त लम्हें हैं ये जो स्याह मंज़र है इस के ख़त्म होने का वक़्त एक मुक़र्रर है वक़्त के थपेड़ों का सामना किया जाए अब हुसूल-ए-मक़सद का हौसला किया जाए क़ब्ल अपने मरने से थोड़ा जी लिया जाए

Salman Yusuf

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"इक आस" उम्मीदें सिसकियाँ लेती हैं दिल के गहरे कोने में तसल्ली धड़कनें देती हैं नाज़ुक हाथ की मानिंद पलक पर अश्क के मेले यहाँ हर रोज़ लगते हैं लबों पर प्यास की शम्में यहाँ हर शाम जलती हैं मुसलसल दर्द बहता है तो पलकें भीग जाती हैं हुजूम-ए-आदमीयत में फ़क़त मैं ही हूँ तन्हा सा कटे से पैरहन पर कुछ पुराने छींट के धब्बे यही पैग़ाम देते हैं मुझे दुनिया से नफ़रत है मैं एक बोसीदा सी टूटी हुई दीवार के भीतर ख़ुद अपने आप के साए से यूँँ ही लिपटा रहता हूँ हक़ीक़त में मैं ख़ुद इक लाश की मानिंद हूँ लेकिन अभी कुछ साँस बाक़ी हैं अभी इक आस बाक़ी है कि तुम फिर लौट आओगे कि तुम फिर लौट आओगे

Salman Yusuf

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"अपनी कहानी" मैं अपनी कहानी क़लमबंद करने की कोशिश तो करता रहा हूँ मगर मेरा माज़ी तो नाकामियों के अँधेरों से उजड़ा हुआ है नहीं याद मुझ को कि उम्र-ए-गुज़िश्ता के इक मरहले में हयात-ए-रवां से रक़ीब-ए-अमाँ से भी वहम-ओ-गुमाँ में कभी जीत पाया मैं लिखने को लिख दूँ कि मैं ने ज़माने से जो कुछ भी चाहा नहीं मिल सका कँवल मेरे ख़्वाबों का हक़ीक़त की बंजर ज़मीनो पे हरगिज़ नहीं खिल सका मैं लड़ता रहा पर हमेशा कि मैं ने कभी भी सर-ए-तस्लीम-ए-ख़म ना किया मैं टूटा मैं बिखरा मैं हारा मगर हौसला फिर भी कम ना किया मैं फिर से चला हूँ सवा लाख कोशिश को एक रंग देने मैं लिखने को लिख दूँ मगर ये कहानी भी पढ़नी है किस ने सभी को तो दुनिया में सक्सेस का नुस्ख़ा ही लाहक रहा है जो हारा नालायक़ जो जीता हमेशा वही तो ज़माने की असली कसौटी पे लायक़ रहा है मेरे फ़ेलियर के तजरबात मुझ को बताने लगे हैं कि मेरी कहानी अधूरी है अबतक इसे दरकिनार है सक्सेस की दस्तक वो सक्सेस जो बहरो के कानों में चीख़े चिल्लाए उन्हे ये बताए कि चलने से पहले कई मर्तबा तुम को गिरना पड़ेगा

Salman Yusuf

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“ज़रूरत-ए-लम्स” मुहब्बत में बोसा ज़रूरी नहीं ज़रूरी नहीं तुम कि कलियों को चाहो और उसपर ये चाहो कि वो भी जहाँ पर रुकी हैं रुकी न रहें मुहब्बत का मतलब ये हरगिज़ नहीं परिंदों को पिंजरे में पकड़े रखो उन के पर काट लो फूल ख़ुश्बू न दे तो वो किस काम का बिन परों के परिंदे परिंदे नहीं जिस्म की तलब तो मुहब्बत नहीं लम्स की तमन्ना तो उल्फ़त नहीं इश्क़ को जिस्म की एक ज़र्रा बराबर ज़रूरत नहीं

Salman Yusuf

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