"सख़्त लम्हें" वक़्त थोड़ा मुश्किल है रात थोड़ी भारी है आँख के कटोरे से अश्कबारी जारी है वस्ल की उम्मीदों पर बेबसी के साए हैं गुलशनों की राहों पर नाचती ख़िज़ाएँ है ये जो सख़्त लम्हें हैं ये जो स्याह मंज़र है इस के ख़त्म होने का वक़्त एक मुक़र्रर है वक़्त के थपेड़ों का सामना किया जाए अब हुसूल-ए-मक़सद का हौसला किया जाए क़ब्ल अपने मरने से थोड़ा जी लिया जाए
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??
Shadab Javed
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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राजा बोला रात है रानी बोली रात है मंत्री बोला रात है संतरी बोला रात है ये सुब्ह सुब्ह की बात है
Gorakh Pandey
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“ज़रूरत-ए-लम्स” मुहब्बत में बोसा ज़रूरी नहीं ज़रूरी नहीं तुम कि कलियों को चाहो और उसपर ये चाहो कि वो भी जहाँ पर रुकी हैं रुकी न रहें मुहब्बत का मतलब ये हरगिज़ नहीं परिंदों को पिंजरे में पकड़े रखो उन के पर काट लो फूल ख़ुश्बू न दे तो वो किस काम का बिन परों के परिंदे परिंदे नहीं जिस्म की तलब तो मुहब्बत नहीं लम्स की तमन्ना तो उल्फ़त नहीं इश्क़ को जिस्म की एक ज़र्रा बराबर ज़रूरत नहीं
Salman Yusuf
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"एक लम्हा" सारी दुनिया जिसे दिन समझ कर कारख़ानों की जानिब चली जा रही है इस को क्या ही ख़बर है कि चेहरे पे इस के वक़्त के हाथों कालिख़ मली जा रही है किस को मअ'लूम है हम जिसे दिन समझते हैं वो रात हो मैं तो सूरज के उगने को, दुनिया के उठने को गाड़ियों के हार्न से होने वाले शोर और शराबे को इस जहाँ के ख़राबे को रात गरदान्ता हूँ और वो लम्हा कि जब चाँद की परत पर एक चेहरा नमूदार हो जाता है होश खो जाता है मैं उसी एक लम्हे को दिन मानता हूँ
Salman Yusuf
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"इक आस" उम्मीदें सिसकियाँ लेती हैं दिल के गहरे कोने में तसल्ली धड़कनें देती हैं नाज़ुक हाथ की मानिंद पलक पर अश्क के मेले यहाँ हर रोज़ लगते हैं लबों पर प्यास की शम्में यहाँ हर शाम जलती हैं मुसलसल दर्द बहता है तो पलकें भीग जाती हैं हुजूम-ए-आदमीयत में फ़क़त मैं ही हूँ तन्हा सा कटे से पैरहन पर कुछ पुराने छींट के धब्बे यही पैग़ाम देते हैं मुझे दुनिया से नफ़रत है मैं एक बोसीदा सी टूटी हुई दीवार के भीतर ख़ुद अपने आप के साए से यूँँ ही लिपटा रहता हूँ हक़ीक़त में मैं ख़ुद इक लाश की मानिंद हूँ लेकिन अभी कुछ साँस बाक़ी हैं अभी इक आस बाक़ी है कि तुम फिर लौट आओगे कि तुम फिर लौट आओगे
Salman Yusuf
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लिखना ज़रूरी है लिखो लिखना ज़रूरी है मगर लिखने से पहले ये अख़ज़ कर लो कि क्या लिखना ज़रूरी है वही जो कुछ तुम्हारे दरमियाँ में घट रहा है मुहब्बत का गला क्यूँँ कट रहा है समाज बँट रहा है अख़ुव्वत आजिज़ी और इंकिसारी स भरा बादल फ़ज़ा में नफ़रतों की घुल रहा है छँट रहा है मुहाफ़िज़ इस्मतों के इस्मतों का क़त्ल करते हैं अमीर-ए-शहर ग़रीबों के लहू से पेट भरते हैं लिखो लिखना ज़रूरी है लिखो अब बे-हयाई ने फ़्रीडम नाम रखा है जो ज़िल्लत ख़त्म होनी थी उसी को थाम रखा है हमारे मुंसिफ़ों ने ही हमारे सर हमारे क़त्ल का इल्ज़ाम रखा है सभी तो सर-ब-सज्दा हैं फुहश तहज़ीब के आगे सभी तो ज़ुल्म की ताईद में परचम उठाए हैं मगर कुछ हैं अभी जो कुव्वत-ए-इज़हार रखते हैं वो लहजा तीर रखते हैं ज़बाँ तलवार रखते हैं हमेशा ज़ुल्म की गर्दन पे आहनी वार करते हैं यज़ीद-ए-वक़्त की ताईद से इनकार करते हैं अभी कुछ लोग ज़िंदा हैं लिखो लिखना ज़रूरी है!
Salman Yusuf
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ख़मोशी मैं कि ठहरे हुए पानी की ख़मोशी से ख़फ़ा हूँ मेरी ख़्वाहिश कि कोई बात करे मुझ सेे मुसलसल वो कि साकित ही रहा सूखे दरख़्तों की तरह लब पे ताले पड़े ऐसे कि सभी हर्फ़ नदारद मेरी आहों की सलामी भी क़ुबूली न गई मेरी आँखों से गिरे अश्क भी ख़ाली ही गए ख़्वाहिश-ए-दीद ने बस रंज ही बख़्शे यारों कू-ए-जानाँ से सवाली के सवाली ही गए लब पे शिकवे न शिकायत न मलामत न कोई बात ऐसे रूठे को मनाएँ तो मनाएँ कैसे
Salman Yusuf
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