लिखना ज़रूरी है लिखो लिखना ज़रूरी है मगर लिखने से पहले ये अख़ज़ कर लो कि क्या लिखना ज़रूरी है वही जो कुछ तुम्हारे दरमियाँ में घट रहा है मुहब्बत का गला क्यूँँ कट रहा है समाज बँट रहा है अख़ुव्वत आजिज़ी और इंकिसारी स भरा बादल फ़ज़ा में नफ़रतों की घुल रहा है छँट रहा है मुहाफ़िज़ इस्मतों के इस्मतों का क़त्ल करते हैं अमीर-ए-शहर ग़रीबों के लहू से पेट भरते हैं लिखो लिखना ज़रूरी है लिखो अब बे-हयाई ने फ़्रीडम नाम रखा है जो ज़िल्लत ख़त्म होनी थी उसी को थाम रखा है हमारे मुंसिफ़ों ने ही हमारे सर हमारे क़त्ल का इल्ज़ाम रखा है सभी तो सर-ब-सज्दा हैं फुहश तहज़ीब के आगे सभी तो ज़ुल्म की ताईद में परचम उठाए हैं मगर कुछ हैं अभी जो कुव्वत-ए-इज़हार रखते हैं वो लहजा तीर रखते हैं ज़बाँ तलवार रखते हैं हमेशा ज़ुल्म की गर्दन पे आहनी वार करते हैं यज़ीद-ए-वक़्त की ताईद से इनकार करते हैं अभी कुछ लोग ज़िंदा हैं लिखो लिखना ज़रूरी है!
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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"मज़हबी जंग" उधर मज़हबी जंग का शोर है ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर है टूटी इमारत दुकानें सभी है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर कहीं चीख़ ने की सदा है कहीं ख़ामुशी का है आलम कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई हैं तलवार हाथों में पकड़े कई सितमगर बढ़ाते बग़ावत न दैर-ओ-हरम है सलामत ज़मीं पर है उतरी क़यामत है बिगड़े से हालात अब शहर में हुई हैं मियाँ कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की समुंदर लबा-लब है लाशों से ही न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है ये उठता धुआँ और जलता मकाँ बताते हैं नफ़रत का ये दौर है
MAHESH CHAUHAN NARNAULI
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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"एक लम्हा" सारी दुनिया जिसे दिन समझ कर कारख़ानों की जानिब चली जा रही है इस को क्या ही ख़बर है कि चेहरे पे इस के वक़्त के हाथों कालिख़ मली जा रही है किस को मअ'लूम है हम जिसे दिन समझते हैं वो रात हो मैं तो सूरज के उगने को, दुनिया के उठने को गाड़ियों के हार्न से होने वाले शोर और शराबे को इस जहाँ के ख़राबे को रात गरदान्ता हूँ और वो लम्हा कि जब चाँद की परत पर एक चेहरा नमूदार हो जाता है होश खो जाता है मैं उसी एक लम्हे को दिन मानता हूँ
Salman Yusuf
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“ज़रूरत-ए-लम्स” मुहब्बत में बोसा ज़रूरी नहीं ज़रूरी नहीं तुम कि कलियों को चाहो और उसपर ये चाहो कि वो भी जहाँ पर रुकी हैं रुकी न रहें मुहब्बत का मतलब ये हरगिज़ नहीं परिंदों को पिंजरे में पकड़े रखो उन के पर काट लो फूल ख़ुश्बू न दे तो वो किस काम का बिन परों के परिंदे परिंदे नहीं जिस्म की तलब तो मुहब्बत नहीं लम्स की तमन्ना तो उल्फ़त नहीं इश्क़ को जिस्म की एक ज़र्रा बराबर ज़रूरत नहीं
Salman Yusuf
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"सख़्त लम्हें" वक़्त थोड़ा मुश्किल है रात थोड़ी भारी है आँख के कटोरे से अश्कबारी जारी है वस्ल की उम्मीदों पर बेबसी के साए हैं गुलशनों की राहों पर नाचती ख़िज़ाएँ है ये जो सख़्त लम्हें हैं ये जो स्याह मंज़र है इस के ख़त्म होने का वक़्त एक मुक़र्रर है वक़्त के थपेड़ों का सामना किया जाए अब हुसूल-ए-मक़सद का हौसला किया जाए क़ब्ल अपने मरने से थोड़ा जी लिया जाए
Salman Yusuf
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नज़्म- मक़सद-ए-वजूद ज़माँ मकाँ के दरमियाँ है रात दिन का फ़लसफ़ा यहाँ हुजूम-ए इंस-ओ-जाँ कोई इधर कोई उधर भटक रहा है गुमशुदा किसी को है भी ये ख़बर वो कौन है मैं कौन हूँ कि हम सफ़र में हैं अगर तो मंज़िलें हैं किस तरफ़ अगर पता हैं मंज़िलें तो तख़्त की ये जंग क्यूँँ सभी जो एक से है फिर क़ुलूब इतने तंग क्यूँँ ये धर्म ज़ात रंग का ज़मीन पर है फ़र्क क्यूँँ ये जाहिलों के फ़लसफ़े ये अनपढ़ों के तर्क क्यूँँ ये जिस्म गिल का बुत है बस अगर न साँस पास हो शरीर ख़ाक ही का है तुम इस का बस लिबास हो सो जब लिबास उतर गया क़ज़ा की भेंट चढ़ गया तो बल का जो ग़ुरूर था वो अब बचा या मर गया? या फिर किसी को भी यहाँ यही पता न चल सका वो कौन है, मैं कौन हूँ वो कौन है, मैं कौन हूँ
Salman Yusuf
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"रख़्त-ए-सफ़र" अगर ये रुकना मुहाल न हो अगर ये अर्जेंट कॉल न हो न जाने पर गर वबाल न हो तो मेरी मानो ठहर ही जाओ न दूर जा कर मुझे सताओ ये क्या कहा कि नहीं रुकोगे सफ़र ज़रूरी है चल पड़ोगे किसी की मिन्नत नहीं सुनोगे जो ठान ली है तो कर ही दोगे तो मुझ को मेरा ये दर मुबारक तुम्हें वो उजला शहर मुबारक ऐ मेरे पहलू से जाने वाले नए शहर का सफ़र मुबारक जो अब सफ़र पर निकल पड़े हो नई डगर पर जो चल पड़े हो तो अपने दिल का ख़याल रखना मेरी मुहब्बत सँभाल रखना
Salman Yusuf
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