"रक्षा बंधन" कच्चे धागों का पक्का बंधन आओ मनाएं हम रक्षा बंधन एक बहन भाई के घर में आए भाई घू में बहन के साथ बन ठन बहन रेशमी धागा लाए रंगीन भाई के घर वो ख़ुशियाँ छाये कपड़े पहने वो नए और नवीन बच्चों के लिए मिठाई है लाई देखो देखो जीजी है एक आई बच्चों में कभी रहे ना अन बन आओ मनाएं हम रक्षा बन्धन घर में बने खूब पकवान है भाई बहना ने एक आरती है सजाई बाजार से राखी नारियल है लाई भाई की भर दी सूनी कलाई छाई ख़ुशियाँ नाचे है तन मन बच्चे मनाएं यहाँ वहाँ हुडदंग बहन दे दुआएँ और ले वचन आओ मनाएं हम रक्षा बंधन
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काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता तू बड़े प्यार से चाव से बड़े मान के साथ अपनी नाज़ुक सी कलाई में चढ़ाती मुझ को और बे-ताबी से फ़ुर्क़त के ख़िज़ाँ लम्हों में तू किसी सोच में डूबी जो घुमाती मुझ को मैं तिरे हाथ की ख़ुश्बू से महक सा जाता जब कभी मूड में आ कर मुझे चूमा करती तेरे होंटों की में हिद्दत से दहक सा जाता रात को जब भी तू नींदों के सफ़र पर जाती मरमरीं हाथ का इक तकिया बनाया करती मैं तिरे कान से लग कर कई बातें करता तेरी ज़ुल्फ़ों को तिरे गाल को चूमा करता जब भी तू बंद-ए-क़बा खोलने लगती जानाँ अपनी आँखों को तिरे हुस्न से ख़ीरा करता मुझ को बेताब सा रखता तिरी चाहत का नशा मैं तिरी रूह के गुलशन में महकता रहता मैं तिरे जिस्म के आँगन में खनकता होता कुछ नहीं तो यही बे-नाम सा बंधन होता काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता
Wasi Shah
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"तन्हाई" एक अकेली तन्हा सी गली जहाँ अब भी है बसेरा मेरा एक कच्चे ईंटों की इमारत जहाँ सफ़हे पर लिखी इबारत कहने को उस घर का तंग दरवाज़ा आने जाने वालों के लिए वही तर-ओ-ताज़ा कई क़िस्से दफ़्न उस काली रौशनाई में हम भी जी रहे इस ग़म-ए-तन्हाई में वो शीशे टूटी खिड़कियों के जैसे चुभते गुलाब पंखुड़ियों के वो रात बे रात जागना अपना वो ख़ाली वक़्त में देखना सपना कुछ हम सेाए बस अपने जैसे ख़ामोश या बेबाक सपने जैसे यूँँ ही ज़िंदगी की बातें बहुत हैं कभी फ़ुर्सत में सुनो ये रातें बहुत हैं
Naviii dar b dar
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आज के दिन जो अपने डर का इज़हार किया तो कि मैं तो अपना लूँ उसे मौत ने इनकार किया तो वो कच्ची सी उम्र वो पक्का सा हादिसा इक काँच का महल आज संगसार किया तो इक रूप बाहर इक है पीछे और इक उन के बीच मैं ने ग़लत से प्यार किया तो दिल पर रख पत्थर या हो पत्थर दिल हू-ब-हू उन की तरह उन पय वार किया तो कि रुकती हैं साँसें लो रोक दी गईं फिर भी सोचा जाए तेरा इंतिज़ार किया तो
Geetanjali Geet
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"मुदावा" कितने बेबाक हैं शाइ'र अब के कितने उर्यां हैं ये अफ़्साना-निगार कुछ समझ में मिरे आते ही नहीं इन अदब-सोज़ों के गुंजलक-अशआर यूँँ तो अपने को ये कहते हैं अदीब पढ़ते हैं जंग के लेकिन अख़बार कभी यूरोप का कभी पूरब का ज़िक्र करने में उड़ाते हैं शरार दास्तानें न क़सीदे न ग़ज़ल अदब-ए-तल्ख़ की हर सू भर मार कभी पंजाब की भोंडी बातें कभी बंगाल के गंदे अफ़्कार ख़ून-आलूदा हैं उन की नस्रें पीप बहते हुए इन के अश'आर उन के अफ़्सानों के मौज़ू अजीब काली लड़की कभी काली शलवार अन्न-दाता से कभी लड़ बैठे कभी अफ़्लास पे खींचती तलवार उन की नज़्मों में कोई लुत्फ़ नहीं न कोई नग़्मा न तफ़सीर-ए-बहार कभी आवारा कभी ख़ाना-ब-दोश कभी औरत कभी मीना-बाज़ार बद-मज़ाक़ी की सरासर बातें रंग ओ बू छोड़ के आँधी की पुकार हरफ़-ए-आख़िर की वो शमशीर दो-दम ज़हर में डूबी हुई जिस की धार जंग-ए-आज़ादी का सर में सौदा बेसवा के लिए इतने ईसार ऐब-पोशी उन्हें आती ही नहीं ज़ख़्म धोते हैं सर-ए-राहगुज़ार एक मैं भी तो हूँ पक्का शाइ'र मगर इन बातों से बिल्कुल इनकार सनद-ए-माज़ी से पुर मेरा कलाम फ़िक्र-ए-इमरोज़ से करता हूँ फ़रार होता है साफ़ मिरा हर मिसरा एक भी शे'र नहीं ज़ेहन पे बार लेकिन उस के लिए अब क्या मैं करूँँ ये समझते नहीं मुझ को फ़नकार इंक़िलाब और अदब-हा-ए-ग़ज़ब कितने मख़दूश हैं ये सब आसार गोर्की जाबिर ओ नज़्र-उल-इस्लाम यही दो चार हैं इन के मेआ'र सुनने में आया है बहरे मिरे कान कि ख़ुदा से भी उन्हें है इनकार मज़हबों से उन्हें बेहद नफ़रत माबदों पर ये उड़ाते हैं ग़ुबार हुक्मरानों का कोई ख़ौफ़ नहीं उमरा का नहीं कुछ दिल में वक़ार चाँद पर ख़ाक उड़ाने के लिए जब भी देखा उन्हें पाया तय्यार मुख़्तसर ये कि हर इक फ़ेल उन का शोला-दर-क़स्र शिकन-दर-दीवार मैं तो आजिज़ हूँ इलाही तौबा आख़िर आएगा कभी उन को क़रार कोई लिल्लाह हटाओ उन को जाग उट्ठे हैं सुलाओ उन को
Wamiq Jaunpuri
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"तुझ सेे मिल कर" तुझ सेे मिल कर एक दफ़ा ही बात हुई फिर इस दिल में बेचैनी दिन रात हुई इस पागल दिल की फ़रमाइश है तेरा चेहरा हाथों में भरने की ख़्वाहिश है ख़्वाबों में तेरा चेहरा आए हाथों से रेत की तरह फिसला जाए जाते जाते मेरे होंठों पर ठहरे तू सारे के सारे अल्फ़ाज़ ले गया खनक खनक कर मुझ सेे तेरी बातें करती थीं उन चूड़ियों की भी तू आवाज़ ले गया इक मुद्दत से तुझे नहीं देखा भला मुझे ख़ुद का भी कैसे होश रहे फिर से तेरी आहट सुनने को अब मेरी पायल बिल्कुल ख़ामोश रहे तेरे हाथों रोज़ सुलझने की चाहतें लिए मेरी ज़ुल्फ़ें उलझी उलझी रहती हैं तू क्या जाने कि मौसम-ए-सर्मा में अब कैसे मेरी साँसें तन्हा सर्द हवाएँ सहती हैं ग़ुस्से में तेरे नाम की मेहॅंदी जब मैं ने अपने कोरे आँचल पर पोंछी इस बात से ख़फ़ा मेरे उस आँचल ने ख़ुद पर गहरा दाग़ लिया तेरे आने की झूठी ख़बरों से उकता कर इन कानों ने झुमकों से वैराग लिया तेरे कपड़ों पर सिर्फ़ इस्तरी करने के ही कितने ख़्वाब लिए अपनी इन आँखों में तुझ को क्या मालूम कि मैं अपने कितने आँचल कितनी बार जला बैठी याद तुझे रखने की कोशिश में ख़ुद को पूरी तरह भुला बैठी पता नहीं कब तेरे काले कुर्ते ने मेरी आँखों से काजल लूटा पता नहीं बरसात मुसलसल क्यूँ रहती पता नहीं कैसे आँखों का दिल टूटा मैं ख़ुद सिल दूँगी अपनी साँसों के धागों से अगर उलझ कर मेरी ज़ुल्फ़ों से कभी बटन तेरे कुर्ते का जो टूटा वक़्त तेरी आस्तीन की सिलवटें लिए मेरे चेहरे से कब गुज़रा पता नहीं कई बहारें मुझ सेे हो कर गुज़रीं यार मगर मुरझाया जो दिल का फूल दुबारा खिला नहीं तू आ कर देख तो सही तेरे इंतिज़ार में अपनी उम्र जवानी की बुनते बुनते मैं ने और किया ही क्या अपने लिए लिबास बुढ़ापे का अपने हाथों से तैयार किया
Meenakshi Masoom
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