nazmKuch Alfaaz

"तन्हाई" एक अकेली तन्हा सी गली जहाँ अब भी है बसेरा मेरा एक कच्चे ईंटों की इमारत जहाँ सफ़हे पर लिखी इबारत कहने को उस घर का तंग दरवाज़ा आने जाने वालों के लिए वही तर-ओ-ताज़ा कई क़िस्से दफ़्न उस काली रौशनाई में हम भी जी रहे इस ग़म-ए-तन्हाई में वो शीशे टूटी खिड़कियों के जैसे चुभते गुलाब पंखुड़ियों के वो रात बे रात जागना अपना वो ख़ाली वक़्त में देखना सपना कुछ हम सेाए बस अपने जैसे ख़ामोश या बेबाक सपने जैसे यूँँ ही ज़िंदगी की बातें बहुत हैं कभी फ़ुर्सत में सुनो ये रातें बहुत हैं

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए

Abrar Kashif

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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हवा का एक झोंका ऐसे गुज़रा कि अपने साथ उस सूनी सड़क पर पड़े बेजान पीले हो चुके उन आम के इमली के गुलमोहर के पत्तों को जिन्हें हम रोज़ अपने पाँव से बाइक के टायर से कुचलते देते थे और इग्नोर कर के आगे बढ़ जाते थे.. अपने साथ सड़कों के किनारों पर बने उन छोटे सूखे नालों में सरका के फेंक आया ये पत्ते याद दिलवाते हैं उन बीते पलों की कि जब हम अपनी धुन में कान में वो लीड ठूँसे अपनी मस्ती से गुज़रते थे किसी जाती हुई स्कूटी पर शहरीली परी को उस के शानों से लटकते बेहया आँचल को बेहद ध्यान से तकते हुए और पास आ कर बोल कर कि "देखिए ये ख़ुश-नसीब आँचल कहीं ग़लती से टायर में न फँस जाए" ओवर टेक करते थे ज़रा सा तेज़ चल कर और आगे बाईं जानिब वो चचा जो 10 की सिगरेट हम को अक्सर 9 में देते थे और उन की ये मुहब्बत पाँव की ज़ंजीर होती थी जो हम को रोक देती थी इन्हें इग्नोर करने से कि ऑफ़िस लेट पहुँचो.. डोंट केयर मगर याँ एक कश तो खींच ही लो क़सम से लॉकडाउन क्या हुआ है ये सब कुछ एक पुरानी फ़िल्म का एक सीन सा मालूम होता है कि जिस में हीरो ग़लती से बहुत पीछे चला आया जहाँ पर दूर तक इंसान क्या हैवान भी ढूँढ़े नहीं मिलते दुआ करता हूँ हम सब इस बला से जीत जाएँ हमारे पाँव चलती ज़िन्दगी के ब्रेक से हट कर दुबारा एक्सेलेटर को दबाएँ !!

Shadab Javed

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"मीठी तक़रार" मेरे हालात को तुम जानकर क्यूँ मुस्कुराते हो फ़क़त ख़ामोश रहते हो निगाहें क्यूँ चुराते हो जो दिल में बात है मुझ को भला कहके तो देखो तुम ये नज़रें चार हों कैसे मुझे तुम भूल जाते हो हज़ारों ख़्वाब ऐसे हैं जो पूरे हो नहीं सकते मुहब्बत के सफ़र में दिल अधूरे हो नहीं सकते मिलें मुझ को सितारे चाँद क़दमों में इन्हें लाऊॅं ये वा'दा करते हो मुझ सेे उसी पल भूल जाते हो

Naviii dar b dar

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"बचपन" उम्र की इस दहलीज़ पे यूँँ भोलेपन में रहना है ऐ ज़िन्दगी मुझे अब भी उसी बचपन में रहना है ना-समझी के वो सारे क़िस्से और वो कहानियाँ सच्ची थीं उस दौर की बातें भी तो इस दौर से अच्छी थीं मीठी यादों के साए लिए आँखों के दर्पण में रहना है ऐ ज़िन्दगी मुझे अब भी उसी बचपन में रहना है

Naviii dar b dar

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"मेरी हस्ती" मेरी हस्ती को दुनिया में इस तरह से भुलाया गया मैं कमोबेश ऐसा न था जैसा तुम को बताया गया दुनिया को इस तरह जानने का जुनूँ मुझ में भी था नवी दुनिया की नज़रों में ही मुझे कैसे यूँँ भी सताया गया बात को दिल से भी तो कहा जैसे हो आसमाँ झुक गया पंख लगने लगे ख़्वाबों को ज़हर भी वो पिलाया गया मंज़िलें पाना आसाँ नहीं कल को भी पाना आसाँ नहीं सच्ची बातें नहीं चलती जब झूठ किस्तों में लाया गया

Naviii dar b dar

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"जान-ए-बहार" मुद्दतों बा'द वो मिलता ही गया जान-ए-बहार दोष अपनों पे यूँँ मढ़ता ही गया जान-ए-बहार किस तरह उस को भुलाया मैं ने शाम-ओ-सहर प्यार मुझ सेे ही वो करता ही गया जान-ए-बहार किस तरह इश्क़ में सूरत हसीं यूँँ लगती है उम्र कितनी भी हो पर बेहतरीन यूँँ लगती है अब तो बस आँखों से मैं बात किया करता हूँ बात कहने से मैं डरता ही गया जान-ए-बहार अब तो हर एक बात पे यूँँ ज़िक्र उन का आता है किस पे हम दिल हार गए कुछ न सूझ पाता है निकले वो जब चौक मोहल्ले गली चौबारे से प्यार नदियों सा उमड़ता ही गया जान-ए-बहार

Naviii dar b dar

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"इंसानियत" क़ीमत नहीं है अब इंसानों में इंसानों की बस्तियाँ बन गई है अब जुर्म के शैतानों की चार पैसों में क़त्ल पेशा हो गया अब इनका ख़ुशामद हो रही है फिर भी इन अस्मत के हैवानों की जिन की शह पर ये इंसानियत का गला घोटते हैं फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है ऐसे हुक्मरानों की वो ख़ून चूसने में कोई कसर नहीं छोड़ते ख़्वाहिश रखते हैं वो ऊँचे आसमानों की 'नवी' अपने सितारे गर्दिशों में ही सही इंसानियत ज़िंदा रखी है हम ने उसूलों और ईमानों की

Naviii dar b dar

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