nazmKuch Alfaaz

ख़ूब-सूरत शय हर इक निकली है तेरी ज़ात से ही छू के शजरों को गुज़रती ये हवाएँ और अब्र-आलूद रंगीं ये फ़ज़ाएँ दरिया में अटखेलियाँ करती ये लहरें और साहिल पर निखरती ये शुआएँ जानता हूँ हू-ब-हू जन्नत है ये सारे नज़ारे लेकिन इक दिन ये नज़ारे ही सबब होंगे तबाही का जहाँ की ज़ुल्फ़-ओ-चश्मों-ओ-आरिज़ तेरे और तेरा हर इक ढब सर-ब-सर एहसास देते है इरम का मुझ को भी या'नी सबब मेरी तबाही का तू होगी

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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

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हम दोनो घर चल देंगे हाथ पकड़ कर रख मेरा सर सीने पर रख मेरा यक़ीन तू कर, तू कहीं जाने वाला नहीं है वेंटिलेटर कम पड़ जाए तो क्या ? अपने हाथों को वेंटिलेटर, मैं बना दूँगा मैं तेरी सांसो की ख़ातिर सच में सनम मैं अपनी सांसे तक गिरवी रख दूँगा मैं रब से झगड़ा कर लूंगा पर कैसे भी मैं तुझ को जाने नहीं दूँगा तू घबरा मत सब कुछ ठीक हो जाएगा जैसे पहले था सब वैसा हो जाएगा तू रो मत इतनी सी तो बात है, और इतना कुछ तो हम ने साथ में झेला है और फिर इक दिन ये भी दुख चला जाएगा ऐसा समझो हम एक जंग में है ऐसा जानो हम जीतेंगे बस तू अपना हौसला मत जाने देना बाकी तो तू मुझ पर छोड़ दे सब कुछ मैं हूँ ना !! क्यूँ फिक्र तू करती है ? जैसे कट जाता है हर इक दिन वैसे ये दिन भी कट जाएगा ये अँधेरा धीरे-धीरे हट जाएगा फिर से सहर होगी हमनें कितना कुछ जीना है अभी तो अपना वेट भी करता होगा, घर अपना तेरी बातों में फिर से खोना है मुझे तेरे साथ अभी कितना हँसना है मुझे मैं ने तेरे हाथों का खाना फिर से खाना है तू टेंशन मत रख हम जल्दी ही घर चल देंगे तुझ को कुछ नहीं होगा बस कुछ दिन की बात है फिर हम दोनो घर चल देंगे

BR SUDHAKAR

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क्या एक भी तुम को भाता था - २ बात बस कुछ यूँ है कि एक मुद्दत से शे'र नहीं कहा गया शे'र नहीं सुना गया बस एक ख़याल जो मन में बुन रहा था वो कुछ कुछ इस तरह था की वो ख़त जो तेरे नाम लिखे वो बातें जो तेरे हक़ में हैं वो शे'र जो तेरी खिदमत में मैं अब तक सब को सुनाता था सच-सच कहना उन में से क्या एक भी तुम को भाता था?

Alankrat Srivastava

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"हिज्र" न जाने कैसे लोग थे वो जो उन के दिल को भा गए मैं ने मोहब्बत चाही तो वो यादें मुझ को थमा गए प्रेम जितना दिल में था ज़बाँ पर आ कर लफ़्ज़ हुआ जब तुम ने उन को सुना नहीं नम बनकर नयन में समा गए दिल में थी एक आस बची तेरी बे-रुख़ी से हार गई वो मोहब्बत थी मेरी जो तुम हँसी में उड़ा गए तुम ने आँखें जो फेरी हैं अब ऐसा शाम सवेरा है सूरज है जैसे बुझा हुआ चँदा तुम जैसे जला गए कानों को थे जो तीर लगे वो दिल पर आ कर ज़ख़्म हुए अब दर्द आँखों में रहता है ये क्या तुम मुझ को सुना गए सागर जो बादल बनकर साहिल से था जुदा हुआ पर्वत ने पूछा हाल ज़रा सारा मंज़र वो बहा गए नींद हटा कर आँखों से ये ख़्वाब तुम्हारे बैठे हैं याद उठी जब आँखों में तो ख़्वाब ये सारे नहा गए बस पैदल ही चल कर के कोई भव-सागर पार हुआ और इस ज़मीं पर डूब कर ये जान कितने गँवा गए अब बस अकेला रहता है और बात तुम्हारी करता है बस खोया सा रहता है क्या तुम दिल को सिखा गए जब साथ तुम्हारा छूटा तो सब ख़्वाब ये मेरे टूटे हैं जब ख़्वाब को पाना चाहा तो सब ज़िम्मेदारी बता गए

Divya 'Kumar Sahab'

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सर्द रातों का हसीं इक ख़्वाब है चेहरा तिरा क्या कहूँ बस मंज़र-ए-नायाब है चेहरा तिरा निकहत-ए-गेसू को तेरी निकहत-ए-सुम्बुल लिखूँ तेरे नर्म-ओ-नाज़ुक इन होंटों को बर्ग-ए-गुल लिखूँ आरज़ू पर ये अरक़ लगता है शबनम की तरह और सनी इस में लटें लगती है रेशम की तरह जैसे कोई गुलशन-ए-शादाब है चेहरा तिरा क्या कहूँ बस मंज़र-ए-नायाब है चेहरा तिरा नूर से कुछ इस तरह है चश्म तेरी तर-ब-तर चाँदनी का अक्स जों उतरा हो सत्ह-ए-आब पर पुतलियाँ दोनों तिरी आँखों में दो नीलम लगे और तिरी आँखों का पानी मुझ को जाम-ए-जम लगे वक़्त-ए-सुब्ह ये आलम-ए-सीमाब है चेहरा तिरा क्या कहूँ बस मंज़र-ए-नायाब है चेहरा तिरा क़ौल हर निकला ज़बाँ से जो तिरी शहदाब है और लबों का तिल किताब-ए-इश्क़ का इक बाब है है मुसव्विर की तिरे अंग अंग में गुल-कारियाँ मो'जिज़ा लगती है तेरे हुस्न की रंगीनियाँ गौहर-ए-नायाब है ज़रताब है चेहरा तिरा क्या कहूँ बस मंज़र-ए-नायाब है चेहरा तिरा

Jai Raj Singh Jhala

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