nazmKuch Alfaaz

समुंदर सर झुकाए बा नहीं फैलाए हुए चुप चाप बैठा है अभी कुछ देर ही पहले तलातुम ख़ेज़ मौजें थीं ज़माना उस की ठोकर पर समुंदर सर झुकाए बा नहीं फैलाए हुए चुप-चाप बैठा है थका-माँदा किसी हारे खिलाड़ी की तरह लेकिन अचानक ही किसी मानूस ख़ुश्बू ने उसे चौंका दिया है सामने मा'सूम नदिया साँस रोके दम-ब-ख़ुद हैराँ समुंदर की उदासी देखती है मिरी ओमा चली आओ पुरानी रीत सदियों की नदी सागर से मिलती है सदा मिलती रहेगी मिरी अज़्मत मिरी वुसअ'त कि जिस पर नाज़ था मुझ को वो बस इक इल्तिबास-ए-वक़्त था अब तो मिरे पानी में गदलाहट है मिरे ज़ाइक़े में खारे-पन की काट है ऐसी कि सैराबी किसी भी तिश्ना-लब की हो नहीं सकती फ़क़त तू ही तो पाकीज़ा तिरे बहते हुए पानी में वो तासीर है जो सात क़ुल्ज़ुम की कसाफ़त को मिटा डाले मिरी ओमा ज़माना झूट है लेकिन तो सच्चाई ये रिश्ते आँख का धोका मगर तू चश्म-ए-बीना और बीनाई महा-सागर तुझ तो याद है सच्चे ज़मानों से मिरा वो गुनगुनाता रास्ता सीधा तुम्हारी ओर आता था मगर तू किस क़दर मग़रूर था तेरी र'ऊनत ने फ़क़त इक नाँ के बूते पर मिरे अल्हड़ बहाव को वहीं पर रोक डाला था मैं नदिया थी सफ़र नदिया के पानी की वदीअ'त है मुझे बहना था हर सूरत किसी भी तौर चलना था मुदव्वर घाटियों दिलबर ज़मीनों और मैदानों ने फ़य्याज़ी से मुझ को रास्ता बख़्शा महा-सागर मुझे अब लौट जाना है हसीं सूरज की किरनों से मिलन कर के अभी बादल बनाना है मुझे चटयल ज़मीनों गर्म मैदानों को भूरी घाटियों को सात रंगी पेंग का एहसान लौटाना है बिन जल के जो धरती है वहाँ सब्ज़ बिछाना है

Related Nazm

"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

236 likes

"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

216 likes

"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

191 likes

"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

180 likes

तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

117 likes

More from Parveen Tahir

जाने किस की लौ का परतव पल पल जलती बुझती आँखें जाने किस की मध भरी मुस्कान का हीला डावाँ-डोल लरज़ती बस्ती इक बे अंत सा आलम है इक पैहम सी गर्दिश है इक अंधा सा हाला है और हाले में गुम-सुम रूहें आगाही का भारी पत्थर सर पर उठाए अदम-आगाही के महलों के दर खुलने की आशा बाँधे सदियों से लाइन में लगी हैं पहले किस की मुक्ती होगी

Parveen Tahir

0 likes

ऐ ज़माने हम तिरी तकज़ीब कर सकते नहीं तू ने हटाए पर्दा-हा-ए-ख़ुशनुमा वो जिन के पीछे छुप के बैठी ज़िंदगी पहचान भी पाते तो कैसे ऐ ज़माने हम तिरी तकज़ीब कर सकते नहीं काँटों पे तू ने जब घसीटा तो सुबुक फूलों में तलने की किताबी ख़्वाहिशों से जान छूटी ऐ ज़माने तू ने हम को तज्रबा-ए-गाह-ए-नफ़ी में ला के फेंका तो तबाह ज़ात की असली गुज़रगाहों का नज़ारा मिला ऐ ज़माने हम को बतलाया है तू ने दूसरों के पाँव में रहने पड़े रहने से वो जा आस्ताना दिल का बन सकती नहीं मन की मुरादें बर तो आती हैं मगर अपने ही दर को खटखटाने से लगन को आज़माने से ज़माने हम तिरी

Parveen Tahir

0 likes

अजब पेड़ थे वो कि छितनार छाया भी झुलसा रही थी वो क्या सर ज़मीं थी जो पेड़ों के नीचे से खिसके चले जा रही थी बहुत बे-तअय्युन सी सम्तें बुझी थीं निगाहों के आगे ख़लाओं सी वीराँ वो कोई फ़ज़ा थी किसी हद-ए-इम्काँ का आग़ाज़ था या किसी बे-ज़मानी की वो इंतिहा थी

Parveen Tahir

0 likes

हमें हर खेल में हर बात पर ऐ मात के ख़्वाहाँ कभी खींचेंगे हम बागें जुनूनी सर-फिरी अंधी हवाओं की उड़ाएँगे फ़लक पर चाँद तारों से बने रथ को फिर आएँगे तुझे हमराह करने सुरमई धुँदले जज़ीरों से सुनहरी आस रंगी सर ज़मीं तक नए मोहरों से फिर अपना पुराना खेल खेलेंगे तिरी हर मात की हर चाल को शह-मात देखेंगे

Parveen Tahir

0 likes

कई सदियों से आवाज़ों ने रूहों को भँभोड़ा है सजल एहसास की रग से लहू का आख़िरी क़तरा क़रीने से निचोड़ा है मिरे अगलों को मुझ को गुम-शुदा ख़्वाबों की मंज़िल पर बिना आवाज़ जाना है सदा के मा'बदों की तीरगी को छोड़ कर पीछे ख़लाओं में नया रस्ता बनाना है

Parveen Tahir

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Parveen Tahir.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Parveen Tahir's nazm.