कई सदियों से आवाज़ों ने रूहों को भँभोड़ा है सजल एहसास की रग से लहू का आख़िरी क़तरा क़रीने से निचोड़ा है मिरे अगलों को मुझ को गुम-शुदा ख़्वाबों की मंज़िल पर बिना आवाज़ जाना है सदा के मा'बदों की तीरगी को छोड़ कर पीछे ख़लाओं में नया रस्ता बनाना है
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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याद रहे चाहतों का ये शहर ख़्वाबों का मोहल्ला इश्क़ की गली और कच्चा मकाँ मोहब्बत का जो हमारा है ख़ुश्बूओं की दीवारें हैं जहाँ एहसासात की छतें हँसी और आँसुओं से लिपा-पुता आँगन है हरा-भरा गहरी छाँव वाला प्यार का एक पेड़ है जहाँ क़िस्सों के चौके में बातों के कुछ बर्तन औंधे हैं शर्मीले से तो कुछ सीधे मुस्कुराते हुए शिकायतों के धुएँ से काले कुछ बर्तन हमारा मुँह ताकते हैं कि क्यूँँ नहीं उन्हें साफ़ किया रगड़ कर हम ने भीतर एक ट्रंक भी है लम्हों से भरा रेशमी चादरों में यादों की सिलवटें हैं आले में जलता चराग़ वो खूटियों पर लटकते दो जिस्मों की झिल्लियाँ जंगलों और खिड़कियों से झाँकती चाहतें हमारी दरवाज़े की चौखट से टपकती हुई बरसात की पागल बूँदें कुछ हवा के कुछ झोंके और न जाने क्या क्या सब बिक जाएगा इक दिन समाज के हाथों रिवाज़ें बोलियाँ लगाएँगी ज़ात भाव बढ़ाएगी अपना और ख़रीद लेंगे जनम के ज़मीन-दार वो मकाँ हमारा
Varsha Gorchhia
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नज़्म- अजनबी महबूबा हम तुझे जानते न थे पहले तुझ को पहचानते न थे पहले आज तुझ को जो जान पाए हैं मेरे अश'आर जगमगाए हैं तू कोई आन बान वाली है तू हसीनों में शान वाली है तू समुंदर सा गहरा पानी है तेरे होने से सब कहानी है तू मिला है मुझे मनाने से आज मैं ख़ुश हूँ तेरे आने से तुझ को मैं रास्ता अगर कह दूँ तुझ को जीने का गर हुनर कह दूँ तुझ को अपनी मता-ए-जाॅं कह दूँ तुझ को अपना मैं हमनवा कह दूँ मेरा तुझ सेे ही राब्ता है अब सदियों सदियों का वास्ता है अब दूर मैं तुझ सेे अब किधर जाऊॅं तुझ को मैं देख कर सॅंवर जाऊॅं मुझ को साया भी तेरा भाता है रात दिन तू ही याद आता है तेरे होने से मुयस्सर है सुकूॅं बिन तेरे मैं तो कहीं भी न रहूॅं हो के अनजान अब नहीं जीना बिन तेरे जान अब नहीं जीना तुम पे सब कुछ मैं आज हारा हूँ तुम मेरे और मैं तुम्हारा हूँ
Hameed Sarwar Bahraichi
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"नादान परी" वो मेरी नादान परी सब सेे छिपकर रहती थी अक्सर मुझ सेे कहती थी छोड़ो प्यार व्यार की बातें हिस्से आती तन्हा रातें इस सेे क्या ही मिल पाएगा जो है वो भी ख़ो जाएगा मैं ने सोचा सच ही तो है प्यार किसे ही मिल पाया है इस को तो एहसास दिला दूँ दुनिया से भी मैं लड़ लूँगा क़िस्मत से कैसे जीतूँगा मैं तो ये ग़म पाल ही लूँगा टूटा दिल सँभाल ही लूँगा वो तो सचमुच मर जाएगी और फिर कुछ ना कर पाएगी उस को एक जीवन जीना है मुझ को हर आँसू पीना है वैसे भी क्या ही है मुझ में मेरे जैसे कितने होंगे मेरे होने से क्या होगा बस इक गिनती बढ़ जाएगी उस के आगे अड़ जाएगी मेरा जाना ही बेहतर है साँस ही लेनी है ले लूँगा जान ही देनी है दे दूँगा जान तो वैसे भी उस की है उस को कहाँ मालूम है इतना वो मेरी नादान परी
Rohit tewatia 'Ishq'
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'प्रेम लिखने लगा हूँ' सुनो मालूम है क्या तुम्हें? मैं आज-कल प्रेम लिखने लगा हूँ और प्रेम में तुम्हें लिखने लगा हूँ लिखता हूँ पेशानी पर सुशोभित छोटी सी बिंदी काली गुलाबी लब औ' सुकुमार रुख़सारों की लाली तुम्हारे खुले हुए गेसू और उस में उलझी बाली। तो कभी लिखता हूँ नाज़ुक पाँव में बँधे नूपुरों की झंकार सुरमई अँखियों से बहते यादों में अश्क ज़ार-ज़ार मेरी ज़रा सी ग़लती पर आँखें तरेरना छोटी-छोटी बातों पर अबोध बालक के मानिंद रूठ कर मुँह फुलाना लिखता हूँ मनाने के लिए जबीं पर एक बोसा चाहना महफ़िल में नज़रों से नज़रें मिलाना शरमा के पलभर में पलकें गिराना शीतलता से ओतप्रोत निशा में गोद में सर रख के फ़लक को अपलक निहारना टूटते तारों से दु'आओं में हमें माँगना कभी शूल सी चुभती तुम्हारी ख़ामोशी तो कभी गर्मजोशी लिखता हूँ अदाएँ हैं तुम्हारी सब निराली मैं पतझड़ में हरियाली लिखता हूँ कभी तुम्हारी नादानी तो कभी समझदारी लिखता हूँ कभी आँखों का पानी कभी मुस्कान प्यारी लिखता हूँ कभी मिलन की शीतल छाँव तो कभी वियोग की धूप लिखता हूँ आज-कल मैं प्रेम का ज़रा ज़रा सा हर एक रूप लिखता हूँ कभी तुम्हें दूर तो कभी अपने पास लिखता हूँ तुम्हारे साथ बिताए हर एक लम्हें को मैं ख़ास लिखता हूँ तुम सेे और तुम्हारी सादगी से मैं बहुत कुछ सीखने लगा हूँ मैं आज-कल प्रेम लिखने लगा हूँ और प्रेम में तुम्हें लिखने लगा हूँ, है ये ख़ूब-सूरत एहसास और आज-कल इसे जीने लगा हूँ
Sandeep dabral 'sendy'
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समुंदर सर झुकाए बा नहीं फैलाए हुए चुप चाप बैठा है अभी कुछ देर ही पहले तलातुम ख़ेज़ मौजें थीं ज़माना उस की ठोकर पर समुंदर सर झुकाए बा नहीं फैलाए हुए चुप-चाप बैठा है थका-माँदा किसी हारे खिलाड़ी की तरह लेकिन अचानक ही किसी मानूस ख़ुश्बू ने उसे चौंका दिया है सामने मा'सूम नदिया साँस रोके दम-ब-ख़ुद हैराँ समुंदर की उदासी देखती है मिरी ओमा चली आओ पुरानी रीत सदियों की नदी सागर से मिलती है सदा मिलती रहेगी मिरी अज़्मत मिरी वुसअ'त कि जिस पर नाज़ था मुझ को वो बस इक इल्तिबास-ए-वक़्त था अब तो मिरे पानी में गदलाहट है मिरे ज़ाइक़े में खारे-पन की काट है ऐसी कि सैराबी किसी भी तिश्ना-लब की हो नहीं सकती फ़क़त तू ही तो पाकीज़ा तिरे बहते हुए पानी में वो तासीर है जो सात क़ुल्ज़ुम की कसाफ़त को मिटा डाले मिरी ओमा ज़माना झूट है लेकिन तो सच्चाई ये रिश्ते आँख का धोका मगर तू चश्म-ए-बीना और बीनाई महा-सागर तुझ तो याद है सच्चे ज़मानों से मिरा वो गुनगुनाता रास्ता सीधा तुम्हारी ओर आता था मगर तू किस क़दर मग़रूर था तेरी र'ऊनत ने फ़क़त इक नाँ के बूते पर मिरे अल्हड़ बहाव को वहीं पर रोक डाला था मैं नदिया थी सफ़र नदिया के पानी की वदीअ'त है मुझे बहना था हर सूरत किसी भी तौर चलना था मुदव्वर घाटियों दिलबर ज़मीनों और मैदानों ने फ़य्याज़ी से मुझ को रास्ता बख़्शा महा-सागर मुझे अब लौट जाना है हसीं सूरज की किरनों से मिलन कर के अभी बादल बनाना है मुझे चटयल ज़मीनों गर्म मैदानों को भूरी घाटियों को सात रंगी पेंग का एहसान लौटाना है बिन जल के जो धरती है वहाँ सब्ज़ बिछाना है
Parveen Tahir
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जाने किस की लौ का परतव पल पल जलती बुझती आँखें जाने किस की मध भरी मुस्कान का हीला डावाँ-डोल लरज़ती बस्ती इक बे अंत सा आलम है इक पैहम सी गर्दिश है इक अंधा सा हाला है और हाले में गुम-सुम रूहें आगाही का भारी पत्थर सर पर उठाए अदम-आगाही के महलों के दर खुलने की आशा बाँधे सदियों से लाइन में लगी हैं पहले किस की मुक्ती होगी
Parveen Tahir
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अजब पेड़ थे वो कि छितनार छाया भी झुलसा रही थी वो क्या सर ज़मीं थी जो पेड़ों के नीचे से खिसके चले जा रही थी बहुत बे-तअय्युन सी सम्तें बुझी थीं निगाहों के आगे ख़लाओं सी वीराँ वो कोई फ़ज़ा थी किसी हद-ए-इम्काँ का आग़ाज़ था या किसी बे-ज़मानी की वो इंतिहा थी
Parveen Tahir
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हबीब-ए-जाँ तुम अगर वबा के दिनों में आए तो ब-सद अक़ीदत-ओ-मोहब्बत तुम्हारे हाथ चूमूँगी क्यूँँकि ये मेरे मसीहा के हाथ हैं तुम्हारी चादर को अपने हाथों से तह कर के अपने सिरहाने रखूँगी कि इस बकल की हरारत मुझ पर कश्फ़ के दर खोलती है तुम्हारे जूतों को क़रीने से जोड़ कर पलंग के पास रखूँगी तुम्हारे साथ एक प्लेट में खाना खाऊँगी और तुम्हारी ज़िद्दी नज़रों का भरम रखूँगी न-जाने मुझे क्यूँ लगता है कि वबा की आँख में मोहब्बत करने वालों के लिए कुछ हया बाक़ी होगी
Parveen Tahir
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ऐ ज़माने हम तिरी तकज़ीब कर सकते नहीं तू ने हटाए पर्दा-हा-ए-ख़ुशनुमा वो जिन के पीछे छुप के बैठी ज़िंदगी पहचान भी पाते तो कैसे ऐ ज़माने हम तिरी तकज़ीब कर सकते नहीं काँटों पे तू ने जब घसीटा तो सुबुक फूलों में तलने की किताबी ख़्वाहिशों से जान छूटी ऐ ज़माने तू ने हम को तज्रबा-ए-गाह-ए-नफ़ी में ला के फेंका तो तबाह ज़ात की असली गुज़रगाहों का नज़ारा मिला ऐ ज़माने हम को बतलाया है तू ने दूसरों के पाँव में रहने पड़े रहने से वो जा आस्ताना दिल का बन सकती नहीं मन की मुरादें बर तो आती हैं मगर अपने ही दर को खटखटाने से लगन को आज़माने से ज़माने हम तिरी
Parveen Tahir
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