nazmKuch Alfaaz

'प्रेम लिखने लगा हूँ' सुनो मालूम है क्या तुम्हें? मैं आज-कल प्रेम लिखने लगा हूँ और प्रेम में तुम्हें लिखने लगा हूँ लिखता हूँ पेशानी पर सुशोभित छोटी सी बिंदी काली गुलाबी लब औ' सुकुमार रुख़सारों की लाली तुम्हारे खुले हुए गेसू और उस में उलझी बाली। तो कभी लिखता हूँ नाज़ुक पाँव में बँधे नूपुरों की झंकार सुरमई अँखियों से बहते यादों में अश्क ज़ार-ज़ार मेरी ज़रा सी ग़लती पर आँखें तरेरना छोटी-छोटी बातों पर अबोध बालक के मानिंद रूठ कर मुँह फुलाना लिखता हूँ मनाने के लिए जबीं पर एक बोसा चाहना महफ़िल में नज़रों से नज़रें मिलाना शरमा के पलभर में पलकें गिराना शीतलता से ओतप्रोत निशा में गोद में सर रख के फ़लक को अपलक निहारना टूटते तारों से दु'आओं में हमें माँगना कभी शूल सी चुभती तुम्हारी ख़ामोशी तो कभी गर्मजोशी लिखता हूँ अदाएँ हैं तुम्हारी सब निराली मैं पतझड़ में हरियाली लिखता हूँ कभी तुम्हारी नादानी तो कभी समझदारी लिखता हूँ कभी आँखों का पानी कभी मुस्कान प्यारी लिखता हूँ कभी मिलन की शीतल छाँव तो कभी वियोग की धूप लिखता हूँ आज-कल मैं प्रेम का ज़रा ज़रा सा हर एक रूप लिखता हूँ कभी तुम्हें दूर तो कभी अपने पास लिखता हूँ तुम्हारे साथ बिताए हर एक लम्हें को मैं ख़ास लिखता हूँ तुम सेे और तुम्हारी सादगी से मैं बहुत कुछ सीखने लगा हूँ मैं आज-कल प्रेम लिखने लगा हूँ और प्रेम में तुम्हें लिखने लगा हूँ, है ये ख़ूब-सूरत एहसास और आज-कल इसे जीने लगा हूँ‌

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"मैं देखता हूँ" ख़ुद को खोने का उस की आँखों में डर देखता हूँ उस के दिल में ख़ुद के लिए मैं एक घर देखता हूँ कैसे कह दूँ मैं कि लोग यहाँ यादों में मार देते हैं पर उस की यादों में ख़ुद को मैं अमर देखता हूँ डूब जाता हूँ अक्सर उस की झील सी आँखों में निगाहों को जब मैं फ़क़त नज़र भर देखता हूँ यादों का क़ाफ़िला करता है जब भी मुझे परेशाँ फ़लक में अपलक नीमशब मैं क़मर देखता हूँ देता हूँ तवज्जोह सदा सूरत के ऊपर सीरत को हर चीज़ में सीरत मैं शाम-ओ-सहर देखता हूँ होते अक्सर ख़िज़ाँ में बेरूखे शजर-ए-निस्बत ख़िज़ाँ में भी वो लहलहाता है शजर देखता हूँ सोच नज़रिया बर्ताव दुनिया से ख़ास है उस का ख़ुद पर उस की सादगी का मैं असर देखता हूँ सादगी उस की क़ल्ब में कुछ ऐसा घर कर गई कि ख़्वाबों ख़्यालों में पहर-दर-पहर देखता हूँ उस की नेकदिली की अब क्या मिसाल दूँ आप को बाग़ में न उस सेे हसीन मैं गुल-ए-तर देखता हूँ

Sandeep dabral 'sendy'

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