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अजब पेड़ थे वो कि छितनार छाया भी झुलसा रही थी वो क्या सर ज़मीं थी जो पेड़ों के नीचे से खिसके चले जा रही थी बहुत बे-तअय्युन सी सम्तें बुझी थीं निगाहों के आगे ख़लाओं सी वीराँ वो कोई फ़ज़ा थी किसी हद-ए-इम्काँ का आग़ाज़ था या किसी बे-ज़मानी की वो इंतिहा थी

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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"इश्क़ " ये इतना किस ने लिखा है इश्क़ पर किस ने उकेरा है अपने महबूब को काग़ज़ पर कितना दर्द भरा था उस के सीने में क़लम भी रो रही थी उस के हाथों में उसे पढ़ा नहीं जिया जाना चाहिए इश्क़ लिखा नहीं , किया जाना चाहिए वे लोग भी क्या ख़ूब थे मौन मोहब्बत को भी कहानियों में लिख गए मुकम्मल न हो सका इश्क़ फिर भी प्यार के अफ़साने दे गए क़लम ही उन का सहारा रही थी उन के अपने ज़ख़्म भी तो बे-वफ़ा हो गए इश्क़ भी क्या ख़ूब चीज़ है उन्हें बर्बाद कर के भी आबाद कर रखा है

Pritam sihag

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"मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं" मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं मेरे पेच खुल चुके हैं मेरे ख़म बिगड़ रहे हैं कहीं चुपके चुपके चुपके मेरी बात चल रही है कहीं कुछ अज़ीज़ मेरे, मेरे पावँ पड़ रहे हैं मेरा काम कर चुका है, मेरा ख़्वाब मर चुका है मेरी ख़ुश्क ख़ुश्क आँखों में सराब गड़ रहे हैं मेरी पसलियाँ चटक कर मेरे मुँह को आ गई हैं ग़म-ए-तिश्नगी के मारे मेरे दाँत झड़ रहे हैं मेरी आस्तीं फटी है मुझे चोट लग रही है मेरी धज्जियाँ उड़ी हैं, मेरे तार उधड़ रहे हैं मेरे ख़ून की सफ़ेदी तुम्हें क्या बता रही है ये मुझे जता रही है, मेरे ज़ख़्म सड़ रहे हैें मेरे सर पे चढ़ के अब तक वही ख़ौफ़ नाचता है कि तू कब का जा चुका है कि तू कब का जा चुका है

Ammar Iqbal

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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

Jaun Elia

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समुंदर सर झुकाए बा नहीं फैलाए हुए चुप चाप बैठा है अभी कुछ देर ही पहले तलातुम ख़ेज़ मौजें थीं ज़माना उस की ठोकर पर समुंदर सर झुकाए बा नहीं फैलाए हुए चुप-चाप बैठा है थका-माँदा किसी हारे खिलाड़ी की तरह लेकिन अचानक ही किसी मानूस ख़ुश्बू ने उसे चौंका दिया है सामने मा'सूम नदिया साँस रोके दम-ब-ख़ुद हैराँ समुंदर की उदासी देखती है मिरी ओमा चली आओ पुरानी रीत सदियों की नदी सागर से मिलती है सदा मिलती रहेगी मिरी अज़्मत मिरी वुसअ'त कि जिस पर नाज़ था मुझ को वो बस इक इल्तिबास-ए-वक़्त था अब तो मिरे पानी में गदलाहट है मिरे ज़ाइक़े में खारे-पन की काट है ऐसी कि सैराबी किसी भी तिश्ना-लब की हो नहीं सकती फ़क़त तू ही तो पाकीज़ा तिरे बहते हुए पानी में वो तासीर है जो सात क़ुल्ज़ुम की कसाफ़त को मिटा डाले मिरी ओमा ज़माना झूट है लेकिन तो सच्चाई ये रिश्ते आँख का धोका मगर तू चश्म-ए-बीना और बीनाई महा-सागर तुझ तो याद है सच्चे ज़मानों से मिरा वो गुनगुनाता रास्ता सीधा तुम्हारी ओर आता था मगर तू किस क़दर मग़रूर था तेरी र'ऊनत ने फ़क़त इक नाँ के बूते पर मिरे अल्हड़ बहाव को वहीं पर रोक डाला था मैं नदिया थी सफ़र नदिया के पानी की वदीअ'त है मुझे बहना था हर सूरत किसी भी तौर चलना था मुदव्वर घाटियों दिलबर ज़मीनों और मैदानों ने फ़य्याज़ी से मुझ को रास्ता बख़्शा महा-सागर मुझे अब लौट जाना है हसीं सूरज की किरनों से मिलन कर के अभी बादल बनाना है मुझे चटयल ज़मीनों गर्म मैदानों को भूरी घाटियों को सात रंगी पेंग का एहसान लौटाना है बिन जल के जो धरती है वहाँ सब्ज़ बिछाना है

Parveen Tahir

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जाने किस की लौ का परतव पल पल जलती बुझती आँखें जाने किस की मध भरी मुस्कान का हीला डावाँ-डोल लरज़ती बस्ती इक बे अंत सा आलम है इक पैहम सी गर्दिश है इक अंधा सा हाला है और हाले में गुम-सुम रूहें आगाही का भारी पत्थर सर पर उठाए अदम-आगाही के महलों के दर खुलने की आशा बाँधे सदियों से लाइन में लगी हैं पहले किस की मुक्ती होगी

Parveen Tahir

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ऐ ज़माने हम तिरी तकज़ीब कर सकते नहीं तू ने हटाए पर्दा-हा-ए-ख़ुशनुमा वो जिन के पीछे छुप के बैठी ज़िंदगी पहचान भी पाते तो कैसे ऐ ज़माने हम तिरी तकज़ीब कर सकते नहीं काँटों पे तू ने जब घसीटा तो सुबुक फूलों में तलने की किताबी ख़्वाहिशों से जान छूटी ऐ ज़माने तू ने हम को तज्रबा-ए-गाह-ए-नफ़ी में ला के फेंका तो तबाह ज़ात की असली गुज़रगाहों का नज़ारा मिला ऐ ज़माने हम को बतलाया है तू ने दूसरों के पाँव में रहने पड़े रहने से वो जा आस्ताना दिल का बन सकती नहीं मन की मुरादें बर तो आती हैं मगर अपने ही दर को खटखटाने से लगन को आज़माने से ज़माने हम तिरी

Parveen Tahir

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कहाँ जा रहे हो सियह रौशनी की चका-चौंद धारा के दूजे किनारे पे अंधा कुआँ इक क़दम फ़ासला कहाँ जी रहे हो खुली आँख के दिल-नशीं ख़्वाब की एक तस्वीर में जिस की ता'बीर अज़लों से मादूम है कहाँ हँस रहे हो पस-ए-क़हक़हा ऑडीबल रेंज से भी बहुत दूर नीचे कराहों की लहरें फ़ना हो रही हैं कहाँ देखते हो सितारों के पीछे नई कहकशाएँ जहाँ पे तजाज़ुब भी इस पार जैसा रिपल्शन भी जो कि यहाँ भोगते हो कहाँ जा रहे हो

Parveen Tahir

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मगर ऐ रौशनी ऐ काएनाती रौशनी इन सूरजों तारों ज़मीनों कहकशाओं के लिए दिल में तिरा नूर-ए-मोहब्बत एक जैसा है मुझे पाताल से खींचा मिरा मैला बदन धोया उलूही घेर में ले कर मिरी इन ख़ुश्क झीलों को मुक़द्दस आँसुओं से फिर शनासा कर दिया ऐ रौशनी इन ख़ुश्क झीलों के किनारों पर तिरी हल्की सी शबनम से तिरे शीतल झपाके में छुपी मीठी हरारत से मैं सरमा के गुलाबों की कोई बे-अंत खेती ख़ुद उगा लूँगी कि मुझ में सूरजों के ज़ुल्म सहने की सकत बाक़ी नहीं

Parveen Tahir

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