कहाँ जा रहे हो सियह रौशनी की चका-चौंद धारा के दूजे किनारे पे अंधा कुआँ इक क़दम फ़ासला कहाँ जी रहे हो खुली आँख के दिल-नशीं ख़्वाब की एक तस्वीर में जिस की ता'बीर अज़लों से मादूम है कहाँ हँस रहे हो पस-ए-क़हक़हा ऑडीबल रेंज से भी बहुत दूर नीचे कराहों की लहरें फ़ना हो रही हैं कहाँ देखते हो सितारों के पीछे नई कहकशाएँ जहाँ पे तजाज़ुब भी इस पार जैसा रिपल्शन भी जो कि यहाँ भोगते हो कहाँ जा रहे हो
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है
ZafarAli Memon
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"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है
ZafarAli Memon
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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समुंदर सर झुकाए बा नहीं फैलाए हुए चुप चाप बैठा है अभी कुछ देर ही पहले तलातुम ख़ेज़ मौजें थीं ज़माना उस की ठोकर पर समुंदर सर झुकाए बा नहीं फैलाए हुए चुप-चाप बैठा है थका-माँदा किसी हारे खिलाड़ी की तरह लेकिन अचानक ही किसी मानूस ख़ुश्बू ने उसे चौंका दिया है सामने मा'सूम नदिया साँस रोके दम-ब-ख़ुद हैराँ समुंदर की उदासी देखती है मिरी ओमा चली आओ पुरानी रीत सदियों की नदी सागर से मिलती है सदा मिलती रहेगी मिरी अज़्मत मिरी वुसअ'त कि जिस पर नाज़ था मुझ को वो बस इक इल्तिबास-ए-वक़्त था अब तो मिरे पानी में गदलाहट है मिरे ज़ाइक़े में खारे-पन की काट है ऐसी कि सैराबी किसी भी तिश्ना-लब की हो नहीं सकती फ़क़त तू ही तो पाकीज़ा तिरे बहते हुए पानी में वो तासीर है जो सात क़ुल्ज़ुम की कसाफ़त को मिटा डाले मिरी ओमा ज़माना झूट है लेकिन तो सच्चाई ये रिश्ते आँख का धोका मगर तू चश्म-ए-बीना और बीनाई महा-सागर तुझ तो याद है सच्चे ज़मानों से मिरा वो गुनगुनाता रास्ता सीधा तुम्हारी ओर आता था मगर तू किस क़दर मग़रूर था तेरी र'ऊनत ने फ़क़त इक नाँ के बूते पर मिरे अल्हड़ बहाव को वहीं पर रोक डाला था मैं नदिया थी सफ़र नदिया के पानी की वदीअ'त है मुझे बहना था हर सूरत किसी भी तौर चलना था मुदव्वर घाटियों दिलबर ज़मीनों और मैदानों ने फ़य्याज़ी से मुझ को रास्ता बख़्शा महा-सागर मुझे अब लौट जाना है हसीं सूरज की किरनों से मिलन कर के अभी बादल बनाना है मुझे चटयल ज़मीनों गर्म मैदानों को भूरी घाटियों को सात रंगी पेंग का एहसान लौटाना है बिन जल के जो धरती है वहाँ सब्ज़ बिछाना है
Parveen Tahir
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जाने किस की लौ का परतव पल पल जलती बुझती आँखें जाने किस की मध भरी मुस्कान का हीला डावाँ-डोल लरज़ती बस्ती इक बे अंत सा आलम है इक पैहम सी गर्दिश है इक अंधा सा हाला है और हाले में गुम-सुम रूहें आगाही का भारी पत्थर सर पर उठाए अदम-आगाही के महलों के दर खुलने की आशा बाँधे सदियों से लाइन में लगी हैं पहले किस की मुक्ती होगी
Parveen Tahir
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अजब पेड़ थे वो कि छितनार छाया भी झुलसा रही थी वो क्या सर ज़मीं थी जो पेड़ों के नीचे से खिसके चले जा रही थी बहुत बे-तअय्युन सी सम्तें बुझी थीं निगाहों के आगे ख़लाओं सी वीराँ वो कोई फ़ज़ा थी किसी हद-ए-इम्काँ का आग़ाज़ था या किसी बे-ज़मानी की वो इंतिहा थी
Parveen Tahir
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ऐ ज़माने हम तिरी तकज़ीब कर सकते नहीं तू ने हटाए पर्दा-हा-ए-ख़ुशनुमा वो जिन के पीछे छुप के बैठी ज़िंदगी पहचान भी पाते तो कैसे ऐ ज़माने हम तिरी तकज़ीब कर सकते नहीं काँटों पे तू ने जब घसीटा तो सुबुक फूलों में तलने की किताबी ख़्वाहिशों से जान छूटी ऐ ज़माने तू ने हम को तज्रबा-ए-गाह-ए-नफ़ी में ला के फेंका तो तबाह ज़ात की असली गुज़रगाहों का नज़ारा मिला ऐ ज़माने हम को बतलाया है तू ने दूसरों के पाँव में रहने पड़े रहने से वो जा आस्ताना दिल का बन सकती नहीं मन की मुरादें बर तो आती हैं मगर अपने ही दर को खटखटाने से लगन को आज़माने से ज़माने हम तिरी
Parveen Tahir
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मगर ऐ रौशनी ऐ काएनाती रौशनी इन सूरजों तारों ज़मीनों कहकशाओं के लिए दिल में तिरा नूर-ए-मोहब्बत एक जैसा है मुझे पाताल से खींचा मिरा मैला बदन धोया उलूही घेर में ले कर मिरी इन ख़ुश्क झीलों को मुक़द्दस आँसुओं से फिर शनासा कर दिया ऐ रौशनी इन ख़ुश्क झीलों के किनारों पर तिरी हल्की सी शबनम से तिरे शीतल झपाके में छुपी मीठी हरारत से मैं सरमा के गुलाबों की कोई बे-अंत खेती ख़ुद उगा लूँगी कि मुझ में सूरजों के ज़ुल्म सहने की सकत बाक़ी नहीं
Parveen Tahir
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