क़ौम की बेहतरी का छोड़ ख़याल फ़िक्र-ए-तामीर-ए-मुल्क दिल से निकाल तेरा परचम है तेरा दस्त-ए-सवाल बे-ज़मीरी का और क्या हो मआल अब क़लम से इज़ार-बंद ही डाल तंग कर दे ग़रीब पर ये ज़मीं ख़म ही रख आस्तान-ए-ज़र पे जबीं ऐब का दौर है हुनर का नहीं आज हुस्न-ए-कमाल को है ज़वाल अब क़लम से इज़ार-बंद ही डाल क्यूँँ यहाँ सुब्ह-ए-नौ की बात चले क्यूँँ सितम की सियाह रात ढले सब बराबर हैं आसमाँ के तले सब को रजअत-पसंद कह कर टाल अब क़लम से इज़ार-बंद ही डाल नाम से पेशतर लगा के अमीर हर मुसलमान को बना के फ़क़ीर क़स्र-ओ-ऐवाँ में हो क़याम-पज़ीर और ख़ुत्बों में दे 'उमर' की मिसाल अब क़लम से इज़ार-बंद ही डाल आमरिय्यत की हम-नवाई में तेरा हम-सर नहीं ख़ुदाई में बादशाहों की रहनुमाई में रोज़ इस्लाम का जुलूस निकाल अब क़लम से इज़ार-बंद ही डाल लाख होंटों पे दम हमारा हो और दिल सुब्ह का सितारा हो सामने मौत का नज़ारा हो लिख यही ठीक है मरीज़ का हाल अब क़लम से इज़ार-बंद ही डाल
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ
Varun Anand
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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो
Ibn E Insha
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ये एक अहद-ए-सज़ा है जज़ा की बात न कर दुआ से हाथ उठा रख दवा की बात न कर ख़ुदा के नाम पे ज़ालिम नहीं ये ज़ुल्म रवा मुझे जो चाहे सज़ा दे ख़ुदा की बात न कर हयात अब तो इन्हीं महबसों में गुज़रेगी सितमगरों से कोई इल्तिजा की बात न कर उन्हीं के हाथ में पत्थर हैं जिन को प्यार किया ये देख हश्र हमारा वफ़ा की बात न कर अभी तो पाई है मैं ने रिहाई रहज़न से भटक न जाऊँ मैं फिर रहनुमा की बात न कर बुझा दिया है हवा ने हर एक दया का दिया न ढूँड अहल-ए-करम को दया की बात न कर नुज़ूल-ए-हब्स हुआ है फ़लक से ऐ 'जालिब' घुटा घुटा ही सही दम घटा की बात न कर
Habib Jalib
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मैं तुझे फूल कहूँ और कहूँ भंवरो से आओ उस फूल का रस चूस के नाचो-झूमो मैं तुझे शम्अ'' कहूँ और कहूँ परवानो आओ उस शम्अ'' के होंटों को ख़ुशी से चूमो मैं तिरी आँख को तश्बीह दूँ मयख़ाने से और ख़ुद ज़हर-ए-जुदाई का तलबगार रहूँ ग़ैर सोए तिरी ज़ुल्फ़ों की घनी छाँव में और मैं चाँदनी रातों मैं फ़क़त शे'र कहूँ मुझ से ये तेरे क़सीदे न लिखे जाएँगे मुझ से तेरे लिए ये ग़ज़लें न कही जाएँगी याद में तेरी मैं सुलगा न सकूँगा आँखें सख़्तियाँ दर्द की मुझ से न सही जाएँगी शहर में ऐसे मुसव्विर हैं जो सिक्कों के एवज़ हुस्न में लैला-ओ-अज़रा से बढ़ा देंगे तुझे तूल दे कर तिरी ज़ुल्फ़ों को शब-ए-ग़म की तरह फ़न के ए'जाज़ से नागिन सी बना देंगे तुझे तुझ को शहर की ज़रूरत है मोहब्बत की मुझे ऐ हसीना तिरी मंज़िल मिरी मंज़िल में नहीं नाच घर तेरी निगाहों में हैं रक़्साँ लेकिन इस तअ'य्युश की तमन्नाएँ मिरे दिल में नहीं देख के ग़ैर के पहलू में तुझे रक़्स-कुनाँ भीग जाती है मिरी आँख सरिश्क-ए-ग़म से मुझ को बरसों की ग़ुलामी का ख़याल आता है जिस ने अंदाज़-ए-वफ़ा छीन लिया है हम से मुझ को भँवरा न समझ मुझ को पतंगा न समझ मुझ को इंसान समझ मेरी सदाक़त से न खेल तेरी तफ़रीह का सामाँ न बनूँगा हरगिज़ मेरी दुनिया है यही मेरी मोहब्बत से न खेल
Habib Jalib
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क़स्र-ए-शाही से ये हुक्म सादिर हुआ लाड़काने चलो वर्ना थाने चलो अपने होंटों की ख़ुश्बू लुटाने चलो गीत गाने चलो वर्ना थाने चलो मुंतज़िर हैं तुम्हारे शिकारी वहाँ कैफ़ का है समाँ अपने जल्वों से महफ़िल सजाने चलो मुस्कुराने चलो वर्ना थाने चलो हाकिमों को बहुत तुम पसंद आई हो ज़ेहन पर छाई हो जिस्म की लौ से शमएँ जलाने चलो, ग़म भुलाने चलो वर्ना थाने चलो
Habib Jalib
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ये ज़ाबता है कि बातिल को मत कहूँ बातिल ये ज़ाबता है कि गिर्दाब को कहूँ साहिल ये ज़ाबता है बनूँ दस्त-ओ-बाज़ू-ए-क़ातिल ये ज़ाबता है धड़कना भी छोड़ दे ये दिल ये ज़ाबता है कि ग़म को न ग़म कहा जाए ये ज़ाबता है सितम को करम कहा जाए बयाँ करूँँ न कभी अपने दिल की हालत को न लाऊँ लब पे कभी शिक्वा-ओ-शिकायत को कमाल-ए-हुस्न कहूँ ऐब को जहालत को कभी जगाऊँ न सोई हुई अदालत को ये ज़ाबता है हक़ीक़त को इक फ़साना कहूँ ये ज़ाबता है क़फ़स को ही आशियाना कहूँ ये ज़ाबता है कहूँ दश्त को गुलिस्ताँ-ज़ार ख़िज़ाँ के रूप को लिक्खूँ फ़रोग़-ए-हुस्न-ए-बहार हर एक दुश्मन-ए-जाँ को कहूँ मैं हमदम-ओ-यार जो काटती है सर-ए-हक़ वो चूम लूँ तलवार ख़ता-ओ-जुर्म कहूँ अपनी बे-गुनाही को सहर का नूर लिखूँ रात की सियाही को जो मिटने वाले हैं उन के लिए दवाम लिखूँ सना यज़ीद की और शिम्र पर सलाम लिखूँ जो डस रहा है वतन को न उस का नाम लिखूँ समझ सकें न जिसे लोग वो कलाम लिखूँ दारोग़-गोई को सच्चाई का पयाम कहूँ जो राहज़न है उसे रहबर-ए-अवाम कहूँ मिरे जुनूँ को न पहना सकोगे तुम ज़ंजीर न हो सकेगा कभी तुम से मेरा ज़ेहन असीर जो देखता हूँ जो सच है करूँँगा वो तहरीर मता-ए-हर-दो-जहाँ भी नहीं बहा-ए-ज़मीर न दे सकेगी सहारा तुम्हें कोई तदबीर फ़ना तुम्हारा मुक़द्दर बक़ा मिरी तक़दीर
Habib Jalib
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जो हो न सकी बात वो चेहरों से अयां थी हालात का मातम था मुलाक़ात कहाँ थी उस ने न ठहरने दिया पहरों मिरे दिल को जो तेरी निगाहों में शिकायत मिरी जाँ थी घर में भी कहाँ चैन से सोए थे कभी हम जो रात है ज़िंदां में वही रात वहाँ थी यकसां हैं मिरी जान क़फ़स और नशेमन इंसान की तौक़ीर यहाँ है न वहाँ थी शाहों से जो कुछ रब्त न क़ाएम हुआ अपना आदत का भी कुछ जब्र था कुछ अपनी ज़बां थी सय्याद ने यूँ ही तो क़फ़स में नहीं डाला मशहूर गुलिस्ताँ में बहुत मेरी फ़ुग़ाँ थी तू एक हक़ीक़त है मिरी जाँ मिरी हमदम जो थी मिरी ग़ज़लों में वो इक वहम-ओ-गुमां थी महसूस किया मैं ने तिरे ग़म से ग़म-ए-दहर वर्ना मिरे अश'आर में ये बात कहाँ थी
Habib Jalib
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