याद नहीं किया भरे-पुरे बाज़ार से जब मैं ख़ाली ख़ाली लौट आया था और इक फूल तेरे चमकते हाथ पे रख कर मैं ने कहा था तेरी पसंद के रंग का कपड़ा मिल न सके तो मेरे कोट की जेब में रखे नोट की क़ीमत गिर जाती है
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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दो तरह के हैं बदन दो तरह के पैरहन इक सजल बे-रंग रेशम सा लिबास जिस में लिपटा मेरा फ़न जिस में पलते हैं ख़याल इक तरह का पैरहन ताज़ा उजले सूत का जिस में रखा है बदन और मेरे ख़त्त-ओ-ख़ाल पैरहन ऊपर का उतरे तो पहन लूँ मैं किसी दीवार को या गुमाँ को छोड़ कर मैं यक़ीं को ओढ़ लूँ पैरहन अंदर का उतरे और हूँ मैं बे-लिबास आगही को ढूँड कर मैं इस ज़मीं को ओढ़ लूँ
Yameen
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वो बर्फ़ानी रात बादाम अख़रोट और सत्तू सरमा का शहद और साग की ख़ुशबू और इक लोक कहानी में गुम आग के गिर्द मैं और तुम आओ चलें चर्ख़े की आवाज़ में डूबी उस बस्ती में शाम जहाँ पर ऐसे उतरे जैसे किसी बीमार बदन में जीवन-रस बर्फ़ की रुत का पहला दिन कितना सफ़ेद और आज़ुर्दा है दरिया अपनी मजबूरी का गदला पानी और हमारी नादारी के आँसू अपनी पुश्त पे रक्खे रेंग रहा है और सड़क पर बरसों पुराने लोग निकल कर चलते हैं उन की आँखें एक पुरानी याद से बोझल और चेहरों पर कोई गहरा ख़ौफ़ जमा है धानी घास के जूतों में ये अपने जलते पाँव पहन कर और होंटों पर हिज्र के गीतों को सुलगा कर नए सफ़र पर निकले हैं आओ चलें उन गलियों की दुश्वारी में जो पंजाबी और हाजी पीर के अंदर खुलती हैं जिन के पार एक अलाव सा जलता है जिन में चलने वाला जैसे गहरे ख़्वाब में चलता है आओ चलें और चल कर देखें जिस्म के दाग़ और रूह के सोग आग जलों ने कब देखे हैं बर्फ़ में जलते लोग लोग जिन्हों ने बर्फ़-रुतों का विर्सा पाल के किस जोखिम से माह-ओ-साल के अंदर रहना सीख लिया था उन पर कैसा वक़्त पड़ा है आओ चलें और एक सवाल की शम्अ' जला कर उस बर्फ़ानी रात में उतरें
Yameen
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रेत हमारे तलवे भौंती है और आँखें लाल करती है झील पर कुछ नज़र नहीं आता चाँद हमारे ख़्वाबों से निकल कर सरहदों पर ढेर हो गया है किनारे पर गिरे बीज आँखें खोलते हैं और फिर हमेशा के लिए मूँद लेते हैं ज़ाफ़रान का खेत इस बार भी बार आवर न हुआ कौन कुरेदे मिट्टी और अपना नसीब तलाश करे ज़मीन को कोई देखता ही नहीं सब आसमान की तरफ़ देखते हैं मगर ये नहीं जानते कि चीख़ चिनार से ऊँची क्यूँ नहीं जाती चाँदनी कोहसारों से फिसलती है और बर्फ़ छतों से शन्गरफ़ी सिलों पर गिरते गिरते कोई लफ़्ज़ बना देती है कोई भी लफ़्ज़ जो ज़बान पर आने से पहले कहीं ख़याल में उगता है जिस के मा'नी पर कोई गवाह नहीं
Yameen
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वो उल्टी शलवार पहन कर लोगों से ये कहता है सरकार भी उल्टी है शलवार भी उल्टी है
Yameen
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ये साया तो मेरे ही अंदर से निकल कर भाग रहा है माई तुम ये क्या छनकाती हो आधा भाई जाग रहा है
Yameen
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