“सावधान” ये तुम्हारे हाथों में दिल थमा ही इसीलिए रहा है कि तुम उसे तोड़ दो भले टूट जाओगी ख़ुद भी तुम ये गले लगाएगा तुम को और किसी बम की तरह फटेगा फिर इसे सिर्फ़ वस्ल नहीं फ़िराक़ भी चाहिए कि ये नज़्म कह सके हिज्र पर ये वो लड़का है जिसे जौन बनके दिखाना है इसे शा'इरी से ही नाम अपना कमाना है इसे तुम नहीं इसे फ़ारिहा कोई चाहिए इसे शा'इरी के लिए गिला कोई चाहिए इसे तुम नहीं इसे मिसरा चाहिए सावधान
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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“दरवाज़ा” देखो तो रिश्ता बन जाता है कमरे से दीवारों से छत से खिड़कियों से मेरा भी था इन सब से ही लेकिन जाने क्यूँ आज मुझे उस दरवाज़े की याद में बेचैनी सी होती है जिस ने जाते हुए सब सेे आख़िर में और आते हुए सब सेे पहले मेरे क़दमों को सुना है जिस सेे मेरा अंदर बाहर होता रहना चलता रहता था उस दिन तक जिस दिन तक वो घर घर था उस दरवाज़े ने मेरे बचपन को जाते हुए और जवानी को आते हुए देखा है उस शहर से तो नाते के लगभग सारे डोर ही टूट चुके हैं आज वो घर भी बिक गया है
Ananth Faani
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“मंतर” सर्द सी उस सुब्ह का वो मंज़र अब तक याद है कोहरा कैसा छाया था पानी पर अब तक याद है पीछे धुंधली रौशनी बल्बों की आगे कुछ नहीं ऐसे में दरिया से निकला मंतर अब तक याद है डूब जा गहरा है पानी देर मत कर डूब जा कोशिशें तह तक पहुँचने की कर आ जा और उतर तैरना बेकार है उस पार क्या ही पाएगा फ़ाइदा इस मौज का इस लहर का ले डूब जा डूब जा ठंडा है पानी ये घड़ी है डूब जा आग तेरी और कैसे शांत होगी सोच मत हिचकिचाहट चीज़ तेरे ध्यान के लाइक़ नहीं राम तक डूबे हैं पानी में तुझे फिर क्या भरम डूब जा प्यासा है पा- तब तक किनारा आ गया नक़्द देकर ना-ख़ुदा को शुक्रिया कह कर उसे शाल थोड़ी और कसके ओढ़कर मैं चल दिया बात थोड़े पहले की है ये पर अब तक याद है
Ananth Faani
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“जलता जंगल” कभी लेटे हुए आकाश में तारे दिखे हों गर बहुत सारे तो क्या ऐसा लगा है तुम को जैसे कोई जंगल हो लगी हो आग जिस में और सारे पेड़ जलते हों कि जैसे कहकशाँ का कहकशाँ जलता हुआ वन हो चमकते टिमटिमाते नुक़्ते हों जितने फ़लक में वो न हों तारे वो हों उन जलते पेड़ों की सुलगती शाख़ों की नोकें और इस मंज़र को तुम ऊपर से केवल देख सकते हो तुम्हें लटका दिया हो जैसे इस जलते हुए जंगल के ऊपर क्या कभी ऐसा नहीं सोचा समझ सकता हूँ इतने तारे दिखते ही कहाँ हैं शहर में और इतनी वहशत भी कहाँ तुम में
Ananth Faani
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