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"सवाल" उदासियों के सफ़र में जानाँ तुम्हारी यादों के सारे ज़र्रे मैं अंदरूँ से उठा-उठा कर गुज़िश्ता लम्हों की रह-गुज़र पर बिखेरता हूँ समेटता हूँ तुम ही बताओ ये सारे ज़र्रे मेरे ही दश्त-ए-वुजूद के हैं या फिर तुम्हारी नमूद के हैं

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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'होप' कैसे तुझ को बतलाऊँ मैं जब भी तुझ सेे मिल कर लौटा कितने तीर चले हैं मुझ पर कितने सपने चाक हुए हैं कैसे मैं ने ख़ुद को समेटा कैसे तुझ सेे ज़ख़्म छुपाएँ लम्हा-लम्हा मौसम-मौसम इक वहशत थी तारी मुझ पर एक चुभन सी साथ थी हर दम लेकिन फिर भी तुझ सेे मिलने हँसते हँसते आ जाता हूँ

ZARKHEZ

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"द लास्ट गुडबाय" शाम की ख़ामोशी में इज़्तिराब भरने को शोर पैदा करने को उस की कॉल आई है कह रही है वो मुझ से ठीक ही हुआ है सब ख़ुश बहुत हूँ शादी से आख़िरी दफ़ा लेकिन मुझ को तुम से मिलना है सोचता हूँ मैं कह दूँ आख़िरी दफ़ा देखो मिल चुका हूँ मैं पहले और अब के मिल कर भी क्या कहोगी तुम आख़िर फिर वही गिले शिकवे क्या कमी थी रिश्ते में क्यों जुदा हुए थे हम बात मुख़्तसर कर लो तुम जहाँ हो जैसी हो ज़िंदगी बसर कर लो पर मैं हामी भरता हूँ मैं उसे ये कहता हूँ हाँ मैं मिलने आता हूँ इक उदास कैफ़े में इक उदास कैफ़े में आ मिले हैं हम फिर से सामने वो बैठी है चाय पी रहे हैं हम चाय पीते देख उस को था अजब सुकूँ पहले था अजब सुकूँ पहले जब वो हँस के कहती थी मुझ को मिल गए हो तुम मुझ को मिल गया है सब चाय पी रही है वो और मैं ख़यालों में घिर चुका हूँ वहशत से वहशतों से घिर कर मैं सोचने लगा हूँ ये खो दिया उसे मैं ने खो दिया है मैं ने सब अब न चाहने पर भी उस से पूछ बैठा हूँ क्यों जुदा हुए थे हम क्या कमी थी पहले जो पूरी कर चुकी हो तुम आज भी तो देखो ना मेरे सामने हो तुम और वो हँस के कहती है बात मुख़्तसर कर लो तुम जहाँ हो जैसे हो ज़िंदगी बसर कर लो

ZARKHEZ

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'स्लीपिंग पिल एडिक्शन' काफ़ी देर से शब बेचारी टहल रही है इस कमरे में और मैं बोझल पलकें लेकर लेटे-लेटे कुछ घंटों से घूर रहा हूँ मेज़ पे रखे उस डब्बे को जिसमें मेरी नींद के ज़र्रे पड़े हुए थे कल तक तो मैं अपना हर इक शोरीदा दिन इक ज़र्रे की तह में रख कर पानी के इक घूँट के साथ निगल जाता था लेकिन आज ये बोझल आँखें जाग रही हैं नींद मिरे कमरे का रस्ता भूल चुकी है डब्बा खाली पड़ा हुआ है और मिरा इक शोरीदा दिन मुझ को ज़र्रा-ज़र्रा कर के निगल रहा है

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"ख़्वाबों का सौदागर" सुनहरे मंज़र बड़े पहाड़ों से गिर के बे-मौत मर गए हैं जो चाँद है वो नदी के पानी में लम्हा लम्हा लरज़ रहा है जो चाँदनी थी घरों की छत पर बिखर गई है हमारे कमरे की लाइटें बंद हो गई हैं हर इक दरीचे ने अपनी बाहें समेट ली हैं शिकस्ता दीवार पर पुरानी उदास पेंटिंग लगी हुई है वो इस अँधेरे में मुझ पर अपने तमाम नुक़्तों को खोलती है मेरे सिरहाने अजीब काला सा एक साया कोई कहानी सुना रहा है गुज़िश्ता चेहरे गुज़िश्ता गलियाँ गुज़िश्ता पैकर दिखा रहा है मगर मैं फिर भी हर एक शय में से ध्यान का ज़र चुरा रहा हूँ कि मुझ को ख़्वाबों में आज फिर से हमारी वस्लत के क़ीमती पल ख़रीदने हैं

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"बुत-तराश" तुम्हारे दिल ने हमेशा मुझ सेे शिकायतें की कि मेरे सीने में दिल नहीं है जो दूरियाँ जाँ-गुसिल नहीं हैं मैं चाहता हूँ कभी तुम अपनी शिकायतों के तमाम ख़ंजर मेरे बदन में शरीक कर के बड़े बड़े से सुराख कर दो और उन में देखो मुझे यक़ीं है तुम्हें वहाँ इक हया तक़ल्लुफ़ झिझक का मारा रिवाज-ओ-रस्म-ए-जहाँ का क़ैदी मिलेगा जो ख़ुद शदीद फ़ुर्क़त के पत्थरों पर तुम्हारी सूरत निखारता है तुम्हारे बुत को तराशता है

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