ये आए दिन के हंगा में ये जब देखो सफ़र करना यहाँ जाना वहाँ जाना इसे मिलना उसे मिलना हमारे सारे लम्हे ऐसे लगते हैं कि जैसे ट्रेन के चलने से पहले रेलवे-स्टेशन पर जल्दी जल्दी अपने डब्बे ढूँडते कोई मुसाफ़िर हों जिन्हें कब साँस भी लेने की मोहलत है कभी लगता है तुम को मुझ से मुझ को तुम से मिलने का ख़याल आए कहाँ इतनी भी फ़ुर्सत है मगर जब संग-दिल दुनिया मेरा दिल तोड़ती है तो कोई उम्मीद चलते चलते जब मुँह मोड़ती है तो कभी कोई ख़ुशी का फूल जब इस दिल में खिलता है कभी जब मुझ को अपने ज़ेहन से कोई ख़याल इन'आम मिलता है कभी जब इक तमन्ना पूरी होने से ये दिल ख़ाली सा होता है कभी जब दर्द आ के पलकों पे मोती पिरोता है तो ये एहसास होता है ख़ुशी हो ग़म हो हैरत हो कोई जज़्बा हो इस में जब कहीं इक मोड़ आए तो वहाँ पल भर को सारी दुनिया पीछे छूट जाती है वहाँ पल भर को इस कठ-पुतली जैसी ज़िंदगी की डोरी टूट जाती है मुझे उस मोड़ पर बस इक तुम्हारी ही ज़रूरत है मगर ये ज़िंदगी की ख़ूब-सूरत इक हक़ीक़त है कि मेरी राह में जब ऐसा कोई मोड़ आया है तो हर उस मोड़ पर मैं ने तुम्हें हम-राह पाया है
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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घर में बैठे हुए क्या लिखते हो बाहर निकलो देखो क्या हाल है दुनिया का ये क्या आलम है सूनी आँखें हैं सभी ख़ुशियों से ख़ाली जैसे आओ इन आँखों में ख़ुशियों की चमक हम लिख दें ये जो माथे हैं उदासी की लकीरों के तले आओ इन माथों पे क़िस्मत की दमक हम लिख दें चेहरों से गहरी ये मायूसी मिटा के आओ इन पे उम्मीद की इक उजली किरन हम लिख दें दूर तक जो हमें वीराने नज़र आते हैं आओ वीरानों पर अब एक चमन हम लिख दें लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ समुंदर सा बहे मौज-ब-मौज बहर-ए-नग़्मात में हर कोह-ए-सितम हल हो जाए दुनिया दुनिया न रहे एक ग़ज़ल हो जाए
Javed Akhtar
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मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ ये काएनात और इस की वुसअत तमाम हैरत तमाम हैरत ये क्या तमाशा ये क्या समाँ है ये क्या अयाँ है ये क्या निहाँ है अथाह साग़र है इक ख़ला का न जाने कब से न जाने कब तक कहाँ तलक है हमारी नज़रों की इंतिहा है जिसे समझते हैं हम फ़लक है ये रात का छलनी छलनी सा काला आसमाँ है कि जिस में जुगनू की शक्ल में बे-शुमार सूरज पिघल रहे हैं शहाब-ए-साक़िब है या हमेशा की ठंडी काली फ़ज़ाओं में जैसे आग के तीर चल रहे हैं करोड़-हा नूरी बरसों के फ़ासलों में फैली ये कहकशाएँ ख़ला घेरे हैं या ख़लाओं की क़ैद में है ये कौन किस को लिए चला है हर एक लम्हा करोड़ों मीलों की जो मसाफ़त है इन को आख़िर कहाँ है जाना अगर है इन का कहीं कोई आख़िरी ठिकाना तो वो कहाँ है जहाँ कहीं है सवाल ये है वहाँ से आगे कोई ज़मीं है कोई फ़लक है अगर नहीं है तो ये नहीं कितनी दूर तक है मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ ये काएनात और इस की वुसअत तमाम हैरत तमाम हैरत सितारे जिन की सफ़ीर किरनें करोड़ों बरसों से राह में है ज़मीं से मिलने की चाह में है कभी तो आ के करेंगी ये मेरी आँखें रौशन कभी तो आएगी मेरे हाथों में रौशनी का एक ऐसा दामन कि जिस को था में मैं जा के देखूँगा इन ख़लाओं के फैले आँगन कभी तो मुझ को ये काएनात अपने राज़ खुल के सुना ही देगी ये अपना आग़ाज़ अपना अंजाम मुझ को इक दिन बता ही देगी अगर कोई वाइज़ अपने मिम्बर से नख़वत-आमेज़ लहज़े में ये कहे कि तुम तो कभी समझ ही नहीं सकोगे कि इस क़दर है ये बात गहरी तो कोई पूछे जो मैं न समझा तो कौन समझाएगा और जिस को कभी न कोई समझ सके ऐसी बात तो फिर फ़ुज़ूल ठहरी
Javed Akhtar
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गलियाँ और गलियों में गलियाँ छोटे घर नीचे दरवाज़े टाट के पर्दे मैली बद-रंगी दीवारें दीवारों से सर टकराती कोई गाली गलियों के सीने पर बहती गंदी नाली गलियों के माथे पर बहता आवाज़ों का गंदा नाला आवाज़ों की भीड़ बहुत है इंसानों की भीड़ बहुत है कड़वे और कसीले चेहरे बद-हाली के ज़हरस हैं ज़हरीले चेहरे बीमारी से पीले चेहरे मरते चेहरे हारे चेहरे बे-बस और बेचारे चेहरे सारे चेहरे एक पहाड़ी कचरे की और उस पर फिरते आवारा कुत्तों से बच्चे अपना बचपन ढूँड रहे हैं दिन ढलता है इस बस्ती में रहने वाले औरों की जन्नत को अपनी मेहनत दे कर अपने जहन्नम की जानिब अब थके हुए झुँझलाए हुए से लौट रहे हैं एक गली में ज़ंग लगे पीपे रक्खे हैं कच्ची दारू महक रही है आज सवेरे से बस्ती में क़त्ल-ओ-ख़ूँ का चाक़ू-ज़नी का कोई क़िस्सा नहीं हुआ है ख़ैर अभी तो शाम है पूरी रात पड़ी है यूँँ लगता है सारी बस्ती जैसे इक दुखता फोड़ा है यूँँ लगता है सारी बस्ती जैसे है इक जलता कढ़ाव यूँँ लगता है जैसे ख़ुदा नुक्कड़ पर बैठा टूटे-फूटे इंसाँ औने-पौने दामों बेच रहा है!
Javed Akhtar
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एक पत्थर की अधूरी मूरत चंद ताँबे के पुराने सिक्के काली चाँदी के अजब से ज़ेवर और कई कांसे के टूटे बर्तन एक सहरा मिले ज़ेर-ए-ज़मीं लोग कहते हैं कि सदियों पहले आज सहरा है जहाँ वहीं इक शहर हुआ करता था और मुझ को ये ख़याल आता है किसी तक़रीब किसी महफ़िल में सामना तुझ से मिरा आज भी हो जाता है एक लम्हे को बस इक पल के लिए जिस्म की आँच उचटती सी नज़र सुर्ख़ बिंदिया की दमक सरसराहट तिरी मल्बूस की बालों की महक बे-ख़याली में कभी लम्स का नन्हा सा फूल और फिर दूर तक वही सहरा वही सहरा कि जहाँ कभी इक शहर हुआ करता था
Javed Akhtar
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जाने किस की तलाश उन की आँखों में थी आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे जितना भी वो चले इतने ही बिछ गए राह में फ़ासले ख़्वाब मंज़िल थे और मंज़िलें ख़्वाब थीं रास्तों से निकलते रहे रास्ते जाने किस वास्ते आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे जिन पे सब चलते हैं ऐसे सब रास्ते छोड़ के एक अंजान पगडंडी की उँगली था में हुए इक सितारे से उम्मीद बाँधे हुए सम्त की हर गुमाँ को यक़ीं मान के अपने दिल से कोई धोका खाते हुए जान के सहरा सहरा समुंदर को वो ढूँडते कुछ सराबों की जानिब रहे गामज़न यूँँ नहीं था कि उन को ख़बर ही न थी ये समुंदर नहीं लेकिन उन को कहीं शायद एहसास था ये फ़रेब उन को महव-ए-सफ़र रक्खेगा ये सबब था कि था और कोई सबब जो लिए उन को फिरता रहा मंज़िलों मंज़िलों रास्ते रास्ते जाने किस वास्ते आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे अक्सर ऐसा हुआ शहर-दर-शहर और बस्ती बस्ती किसी भी दरीचे में कोई चराग़-ए-मोहब्बत न था बे-रुख़ी से भरी सारी गलियों में सारे मकानों के दरवाज़े यूँँ बंद थे जैसे इक सर्द ख़ामोश लहजे में वो कह रहे हों मुरव्वत का और मेहरबानी का मस्कन कहीं और होगा यहाँ तो नहीं है यही एक मंज़र समेटे थे शहरों के पथरीले सब रास्ते जाने किस वास्ते आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे और कभी यूँँ हुआ आरज़ू के मुसाफ़िर थे जलती सुलगती हुई धूप में कुछ दरख़्तों ने साए बिछाए मगर उन को ऐसा लगा साए में जो सुकून और आराम है मंज़िलों तक पहुँचने न देगा उन्हें और यूँँ भी हुआ महकी कलियों ने ख़ुशबू के पैग़ाम भेजे उन्हें उन को ऐसा लगा चंद कलियों पे कैसे क़नाअ'त करें उन को तो ढूँढ़ना है वो गुलशन कि जिस को किसी ने अभी तक है देखा नहीं जाने क्यूँँ था उन्हें इस का पूरा यक़ीं देर हो या सवेर उन को लेकिन कहीं ऐसे गुलशन के मिल जाएँगे रास्ते जाने किस वास्ते आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे धूप ढलने लगी बस ज़रा देर में रात हो जाएगी आरज़ू के मुसाफ़िर जो हैं उन के क़दमों तले जो भी इक राह है वो भी शायद अँधेरे में खो जाएगी आरज़ू के मुसाफ़िर भी अपने थके-हारे बे-जान पैरों पे कुछ देर तक लड़खड़ाएँगे और गिर के सो जाएँगे सिर्फ़ सन्नाटा सोचेगा ये रात भर मंज़िलें तो उन्हें जाने कितनी मिलीं ये मगर मंज़िलों को समझते रहे जाने क्यूँँ रास्ते जाने किस वास्ते आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे और फिर इक सवेरे की उजली किरन तीरगी चीर के जगमगा देगी जब अन-गिनत रहगुज़ारों पे बिखरे हुए उन के नक़्श-ए-क़दम आफ़ियत-गाहों में रहने वाले ये हैरत से मजबूर हो के कहेंगे ये नक़्श-ए-क़दम सिर्फ़ नक़्श-ए-क़दम ही नहीं ये तो दरयाफ़्त हैं ये तो ईजाद हैं ये तो अफ़्कार हैं ये तो अश'आर हैं ये कोई रक़्स हैं ये कोई राग हैं इन से ही तो हैं आरास्ता सारी तहज़ीब ओ तारीख़ के वक़्त के ज़िंदगी के सभी रास्ते वो मुसाफ़िर मगर जानते-बूझते भी रहे बे-ख़बर जिस को छू लें क़दम वो तो बस राह थी उन की मंज़िल दिगर थी अलग चाह थी जो नहीं मिल सके उस की थी आरज़ू जो नहीं है कहीं उस की थी जुस्तुजू शायद इस वास्ते आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे
Javed Akhtar
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