घर में बैठे हुए क्या लिखते हो बाहर निकलो देखो क्या हाल है दुनिया का ये क्या आलम है सूनी आँखें हैं सभी ख़ुशियों से ख़ाली जैसे आओ इन आँखों में ख़ुशियों की चमक हम लिख दें ये जो माथे हैं उदासी की लकीरों के तले आओ इन माथों पे क़िस्मत की दमक हम लिख दें चेहरों से गहरी ये मायूसी मिटा के आओ इन पे उम्मीद की इक उजली किरन हम लिख दें दूर तक जो हमें वीराने नज़र आते हैं आओ वीरानों पर अब एक चमन हम लिख दें लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ समुंदर सा बहे मौज-ब-मौज बहर-ए-नग़्मात में हर कोह-ए-सितम हल हो जाए दुनिया दुनिया न रहे एक ग़ज़ल हो जाए
Related Nazm
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
73 likes
मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
78 likes
क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
42 likes
"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
46 likes
More from Javed Akhtar
मेरे रस्ते में इक मोड़ था और उस मोड़ पर पेड़ था एक बरगद का ऊँचा घना जिस के साए में मेरा बहुत वक़्त बीता है लेकिन हमेशा यही मैं ने सोचा कि रस्ते में ये मोड़ ही इस लिए है कि ये पेड़ है उम्र की आँधियों में वो पेड़ एक दिन गिर गया है मोड़ लेकिन है अब तक वहीं का वहीं देखता हूँ तो आगे भी रस्ते में बस मोड़ ही मोड़ हैं पेड़ कोई नहीं रास्तों में मुझे यूँँ तो मिल जाते हैं मेहरबाँ फिर भी हर मोड़ पर पूछता है ये दिल वो जो इक छाँव थी खो गई है कहाँ
Javed Akhtar
0 likes
दिल वो सहरा था कि जिस सहरा में हसरतें रेत के टीलों की तरह रहती थीं जब हवादिस की हवा उन को मिटाने के लिए चलती थी यहाँ मिटती थीं कहीं और उभर आती थीं शक्ल खोते ही नई शक्ल में ढल जाती थीं दिल के सहरा पे मगर अब की बार सानेहा गुज़रा कुछ ऐसा कि सुनाए न बने आँधी वो आई कि सारे टीले ऐसे बिखरे कि कहीं और उभर ही न सके यूँँ मिटे हैं कि कहीं और बनाए न बने अब कहीं टीले नहीं रेत नहीं रेत का ज़र्रा नहीं दिल में अब कुछ नहीं दिल को सहरा भी अगर कहिए तो कैसे कहिए
Javed Akhtar
1 likes
कुछ तुम ने कहा कुछ मैं ने कहा और बढ़ते बढ़ते बात बढ़ी दिल ऊब गया दिल डूब गया और गहरी काली रात बढ़ी तुम अपने घर मैं अपने घर सारे दरवाज़े बंद किए बैठे हैं कड़वे घूँट पिए ओढ़े हैं ग़ुस्से की चादर कुछ तुम सोचो कुछ मैं सोचूँ क्यूँँ ऊँची हैं ये दीवारें कब तक हम इन पर सर मारें कब तक ये अँधेरे रहने हैं कीना के ये घेरे रहने हैं चलो अपने दरवाज़े खोलें और घर के बाहर आएँ हम दिल ठहरे जहाँ हैं बरसों से वो इक नुक्कड़ है नफ़रत का कब तक इस नुक्कड़ पर ठहरें अब इस के आगे जाएँ हम बस थोड़ी दूर इक दरिया है जहाँ एक उजाला बहता है वाँ लहरों लहरों हैं किरनें और किरनों किरनों हैं लहरें इन किरनों में इन लहरों में हम दिल को ख़ूब नहाने दें सीनों में जो इक पत्थर है उस पत्थर को घुल जाने दें दिल के इक कोने में भी छुपी गर थोड़ी सी भी नफ़रत है इस नफ़रत को धुल जाने दें दोनों की तरफ़ से जिस दिन भी इज़हार नदामत का होगा तब जश्न मोहब्बत का होगा
Javed Akhtar
3 likes
वो जो कहलाता था दीवाना तिरा वो जिसे हिफ़्ज़ था अफ़्साना तिरा जिस की दीवारों पे आवेज़ां थीं तस्वीरें तिरी वो जो दोहराता था तक़रीरें तिरी वो जो ख़ुश था तिरी ख़ुशियों से तिरे ग़म से उदास दूर रह के जो समझता था वो है तेरे पास वो जिसे सज्दा तुझे करने से इनकार न था उस को दर-अस्ल कभी तुझ से कोई प्यार न था उस की मुश्किल थी कि दुश्वार थे उस के रस्ते जिन पे बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर घूमते रहज़न थे सदा उस की अना के दर पे उस ने घबरा के सब अपनी अना की दौलत तेरी तहवील में रखवा दी थी अपनी ज़िल्लत को वो दुनिया की नज़र और अपनी भी निगाहों से छुपाने के लिए कामयाबी को तिरी तिरी फ़ुतूहात तिरी इज़्ज़त को वो तिरे नाम तिरी शोहरत को अपने होने का सबब जानता था है वजूद उस का जुदा तुझ से ये कब मानता था वो मगर पुर-ख़तर रास्तों से आज निकल आया है वक़्त ने तेरे बराबर न सही कुछ न कुछ अपना करम उस पे भी फ़रमाया है अब उसे तेरी ज़रूरत ही नहीं जिस का दावा था कभी अब वो अक़ीदत ही नहीं तेरी तहवील में जो रक्खी थी कल उस ने अना आज वो माँग रहा है वापस बात इतनी सी है ऐ साहिब-ए-नाम-ओ-शोहरत जिस को कल तेरे ख़ुदा होने से इनकार न था वो कभी तेरा परस्तार न था
Javed Akhtar
1 likes
मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ ये काएनात और इस की वुसअत तमाम हैरत तमाम हैरत ये क्या तमाशा ये क्या समाँ है ये क्या अयाँ है ये क्या निहाँ है अथाह साग़र है इक ख़ला का न जाने कब से न जाने कब तक कहाँ तलक है हमारी नज़रों की इंतिहा है जिसे समझते हैं हम फ़लक है ये रात का छलनी छलनी सा काला आसमाँ है कि जिस में जुगनू की शक्ल में बे-शुमार सूरज पिघल रहे हैं शहाब-ए-साक़िब है या हमेशा की ठंडी काली फ़ज़ाओं में जैसे आग के तीर चल रहे हैं करोड़-हा नूरी बरसों के फ़ासलों में फैली ये कहकशाएँ ख़ला घेरे हैं या ख़लाओं की क़ैद में है ये कौन किस को लिए चला है हर एक लम्हा करोड़ों मीलों की जो मसाफ़त है इन को आख़िर कहाँ है जाना अगर है इन का कहीं कोई आख़िरी ठिकाना तो वो कहाँ है जहाँ कहीं है सवाल ये है वहाँ से आगे कोई ज़मीं है कोई फ़लक है अगर नहीं है तो ये नहीं कितनी दूर तक है मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ ये काएनात और इस की वुसअत तमाम हैरत तमाम हैरत सितारे जिन की सफ़ीर किरनें करोड़ों बरसों से राह में है ज़मीं से मिलने की चाह में है कभी तो आ के करेंगी ये मेरी आँखें रौशन कभी तो आएगी मेरे हाथों में रौशनी का एक ऐसा दामन कि जिस को था में मैं जा के देखूँगा इन ख़लाओं के फैले आँगन कभी तो मुझ को ये काएनात अपने राज़ खुल के सुना ही देगी ये अपना आग़ाज़ अपना अंजाम मुझ को इक दिन बता ही देगी अगर कोई वाइज़ अपने मिम्बर से नख़वत-आमेज़ लहज़े में ये कहे कि तुम तो कभी समझ ही नहीं सकोगे कि इस क़दर है ये बात गहरी तो कोई पूछे जो मैं न समझा तो कौन समझाएगा और जिस को कभी न कोई समझ सके ऐसी बात तो फिर फ़ुज़ूल ठहरी
Javed Akhtar
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Javed Akhtar.
Similar Moods
More moods that pair well with Javed Akhtar's nazm.







