nazmKuch Alfaaz

"शराब नहीं, शराबियत, या'नी अल्कोहलिज़्म" आदत जिस को समझे हो वो मर्ज़ कभी बन जाएगा फिर मर्ज़ की आदत पड़ जाएगी अर्ज़ ना कुछ कर पाओगे गर तब्दीली की गुंजाइश ने साथ दिया तो ठीक सही पर उस ने भी गर छोड़ दिया तो यार बड़े पछताओगे जो बूँद कहीं बोतल की थी तो साथ वहीं दो पल का था फिर पता नहीं कब दो पल का वो साथ सदी में बदल गया हम चुप्प बैठके सुन्न गुज़रते लम्हे को ना समझ सके वो कब भीगी उन पलकों की उस सुर्ख़ नमी में बदल गया और नींद ना जाने कहाँ गई उन सहमी सिकुड़ी रातों में हम सन्नाटे को चीर राख से भरा अँधेरा तकते थे फिर सिहर-सिहर फिर काँप-काँप के थाम कलेजा हाथों में जिस को ना वापस आना था वो गया सवेरा तकते थे जिस को समझे हो तुम मज़ाक़ वो दर्द की आदत पड़ जाएगी अर्ज़ ना कुछ कर पाओगे गर तब्दीली की गुंजाइश ने साथ दिया तो ठीक सही पर उस ने भी गर छोड़ दिया तो यार बड़े पछताओगे कट-फट के हम बिखर चुके थे जब तुम आए थे भाई और सभी रास्ते गुज़र चुके थे जब तुम आए थे भाई वो दौर ना तुम सेे देखा था वो क़िस्से ना सुन पाए थे जिस दौर की आँधी काली थी जिस दौर के काले साए थे उस दौर नशे में ज़ेहन था उस दौर नशे में ये मन था उस दौर पेशानी गीली थी उस दौर पसीने में तन था उस दौर में सपने डर लाते उस दौर दुपहरी सन्नाटा उस दौर सभी कुछ था भाई और सच बोलें कुछ भी ना था ये नर्म सुरीला नग़्मा कड़वी तर्ज़ कभी बन जाएगा फिर तर्ज़ की आदत पड़ जाएगी अर्ज़ ना कुछ कर पाओगे गर तब्दीली की गुंजाइश ने साथ दिया तो ठीक सही पर उस ने भी गर छोड़ दिया तो यार बड़े पछताओगे उस दौर से पहले दौर रहा जब साथ ज़िंदगी रहती थी वो दौर बड़ा पुरज़ोर रहा जब साथ बंदगी रहती थी जब साथ क़हक़हों का होता जब बात लतीफ़ों की होती और शाम महकते ख़्वाबों की और रात हसीनों की होती जब कहे नाज़नीं बोलो साजन कौर पहर को आऊँ मैं और हुस्न कहे कि तू मेरा और तेरा ही हो जाऊँ मैं बस मैं पागल ना समझ सका किस ओर तरफ़ को जाना है बस जाम ने खींचा, बोतल इतराई कि तुझ को आना है मैं मयख़ाने की ओर चला ये भूल के पीछे क्या होता इक नन्हा बचपन सुन्न हिचकियाँ अटक-अटक के जो रोता इक भरी जवानी कसक मार के चुप-चुप बैठी रहती है और ख़ामोशी से ‘खा लेना कुछ’ नम आँखों से कहती है उन सहमी सिसकी रातों को मैं कभी नहीं ना समझ सका उन पल्लू ठूँसी फफक फफकती बातों में ना अटक सका ये कभी-कभार का काम अटूटा फ़र्ज़ कभी बन जाएगा फिर फ़र्ज़ की आदत पड़ जाएगी अर्ज़ ना कुछ कर पाओगे गर तब्दीली की गुंजाइश ने साथ दिया तो ठीक सही पर उस ने भी गर छोड़ दिया तो यार बड़े पछताओगे वो पछतावे के आँसू भी मैं साथ नहीं ला पाया था उन जले पुलों की क्या बोलूँ जो जला जला के आया था वो बोले थे कि देखो इस को ज़र्द-सर्द इंसान है ये इक ज़िंदा दिल तबीअत में बैठा मुर्दादिल हैवान है ये मैं शर्मसार तो क्या होता मैं शर्म जला के आया था उस सुर्ख़ जाम को सुर्ख़ लार में नहला कर के आया था मैं आँख की लाली साथ लहू मदहोश कहीं पे रहता था ख़ूँख़ार चुटकले तंज़ लतीफ़े बना-बना के कहता था ये दर्द को सहने का झूठा हमदर्द कभी बन जाएगा हमदर्द की आदत पड़ जाएगी अर्ज़ ना कुछ कर पाओगे गर तब्दीली की गुंज़ाइश ने साथ दिया तो ठीक सही पर उस ने भी गर छोड़ दिया तो यार बड़े पछताओगे

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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"पराधीन भारत में भगतसिंह" आबोहवा ज़हर है चारों तरफ़ क़हर है आलम नहीं है ऐसा कि इश्क़ कर सकूँ मैं मैं तुझ पे मर तो जाता पर क्या करूँँ मेरी जाँ हालात ऐसे ना हैं कि तुझ पे मर सकूँ मैं ये ख़ून भीगी होली ये सर कटी बैसाखी ऐसे में तेरी चुनरी क्या सूँघ पाऊँगा मैं? ये माँग उजड़ा टीका ये सुन्न बैठी ममता ऐसे में तेरे कंगन क्या चूम पाऊँगा मैं ईसा की ले गवाही गौतम की ले गवाही हज़रत कबीर नानक के मन की ले गवाही मीरा क़सम है मुझ को राधा क़सम है मुझ को है दूसरा जनम तो लेना जनम है मुझ को उस दूसरे जनम में सिंदूर लाऊँगा मैं तेरी क़सम कि डोला तेरा उठाऊँगा मैं

Piyush Mishra

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"लेकिन प्रोड्यूसर्स ही बेवक़ूफ़ निकले" रात है नशे में... चाँद था में बोतल ये ही पल है अपने... इनको जी ले दो पल ये खारे-मीठे सपने... ये ज़िंदगी का टोटल बोतल के... दो पल... हैं टोटल मसख़रा समाँ है... बेवड़ा जहाँ है ज़िंदगी का पहिया... साला घिस रहा यहाँ है जिस दुकाँ पे दिल है... साली वो दुकाँ कहाँ है यहाँ की... दुकाँ वो... कहाँ है रात है नशे में... चाँद था में बोतल ये रात... कह रही है... हम सेे चल पड़ो कोई... मिला... तो रुक के पूछ लेंगे भई हलो ख़ैरियत तो है या कुछ मलाल है आदमी का आजकल कैसा हाल है... कभी मिले तो बोलना... कि हम भी ठीक-ठाक हैं आदमी का क्या है... वो ठीकइच होगा टुटेला-सा फुटेला... सड़क के बीच होगा उस को है पकड़नी... साली पाँच दो की लोकल लोकल से... होटल से... लोकल रात है नशे में... चाँद था में बोतल

Piyush Mishra

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"मुंबई, सफलता, स्टारडम" वो चकाचौंध है यार कहीं तुम खो मत जाना...! वो बिजली की इक कौंध यार वो बादल की एक ग़रज़ यार वो चमक मारती... गड़-गड़ करती आज रवाँ कल मुर्दा है... और आज जवाँ कल बूढ़ी है... और आज हसीं कल बद सेूरत और आज पास कल दूरी है... वो रेल की छुक-छुक जैसी है जो दूर-दूर को जाते-जाते बहुत दूर खो जाती है... और धुन उस की बस आस-पास की पटरी पे रो जाती है... वो कोहरे वाली रात को जाते राहगरी के जूतों की वैसी वाली-सी खट्-खट् है जो दरवाज़े के पास गुज़रती चौंकाती झकझोर मारती... भरी नींद की तोड़ मारती कानों से टकराती है... और फिर इकदम उस धुप्प अँधेरे के अंदर घुस जाती है...! वो बूढ़े चौकीदार की सूजी थकन भरी आँखों में आई नींद की वैसी झपकी है... जो रात में पल-पल आती है... पर मालिक की गाड़ी के तीखे हॉर्न की चीख़ी पौं-पौं में इक झटके में भग जाती है...! वो भरी जवानी की बेवा की आँख में बैठी हसरत है... जो बाल खोल उजली साड़ी में... भरी महकती काया ले सूनापन तकती जाती है... जो कसक मारती... भरे गले में फँसती-दबती मुश्किल से बस इक पल को ही आ पाती है... और दूजे पल ही टूट पड़ी चूड़ी की छन्नक छन्न-छन्न से बिखर-बिखर को जाती है...! ...खोज में जिस की जाते हो उस को इक पल... थोड़ा टटोल के हाथ घुमा के... ज़रा मोड़ के पैंट के पिछले पॉकेट में भी छूने की कोशिश करना...! ऐसा ना हो कि खोज तुम्हारे अंदर ही बैठी हो और बस... किसी वजह से लुकी-छिपी हो...! खोजे जाने के डर से शायद तुम सेे ही कुछ डरी-डरी हो...! गर आँख खोल के देखोगे तो दिख जाएगी... पर अँधे हो के देख लिया तो याद हमेशा रखना ये कि पास तुम्हारे आज अगर तो कल तक के आते-आते वो धुँधली भी हो सकती है और परसों तक तो पक्का ही हाथों से भी खो सकती है... वो चकाचौंध है यार कहीं तुम खो मत जाना...

Piyush Mishra

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ओ रात के मुसाफ़िर तू भागना संभल के पोटली में तेरी हो आग ना संभल के चल तो तू पड़ा है फ़ासला बड़ा है जान ले अंधेरे के सर पे ख़ूं चढ़ा है मुक़ाम खोज ले तू इनसान के शहर में इनसान खोज ले तू देख तेरी ठोकर से राह का वो पत्थर माथे पे तेरे कस के लग जाए ना उछल के ओ रात के मुसाफ़िर माना कि जो हुआ है वो तू ने ही किया है इन्होंने भी किया है उन्होंने भी किया है माना कि तू ने हां-हां चाहा नहीं था लेकिन तू जानता नहीं कि ये कैसे हो गया है लेकिन तू फिर भी सुन ले नहीं सुनेगा कोई तुझे ये सारी दुनिया खा जाएगी निगल के ओ रात के मुसाफ़िर तू भागना संभल के पोटली में तेरी हो आग ना संभल के

Piyush Mishra

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"चाँदनी चौक की फ़ैक्टरी और मज़दूर" गिटर-पिटर यूँँ धूँ-धक्कड़ ये गुत्थम-गुत्थी चटर-पटर ये दंगल लाशें ज़ोर-जबर ये हड्डी घिस के चरर-परर... पट्ठे उठ जा तू ताल ठोक ये पसली में जा घुसी नोक ये खाँसी तगड़ी ज़ोरदार ये एसिड संग में कोलतार... अजब दास्ताँ है लेकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्क-बक्का...! ये पीठ है लकड़ी सख़त-सख़त ये सौ मन बोरी पटक-पटक ये काली-काली क्रीम जमा ये पॉलिश कर के खाए दमा... अरे उठ साले कि दिन चढ़ता फिर आई दुपहरी देख भरी ये खौं-खौं खाँसी रेत भरी... अजब दास्ताँ है लकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्का-बक्का...! ये निकला बलग़म थूकों में इक रोटी है सौ भूखों में उस पे हैं क़र्ज़े लाख चढ़े ये सूद-ब्याज बिंदास बढ़े भट्ठी की चाँदनी चम-चम-चम इक हुआ फेफड़ा कम-कम-कम स्टील कटर से कटे हाथ तेज़ाब गटर नायाब साथ अजब दास्ताँ है लेकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्का-बक्का...! ना ग्लास मास्क ना चश्मा भई लाशों के ढेर पे सपना भई सीलन घुटती अब सड़न-सड़न बदबू साँसें अरे व्हाट ए फ़न... फिर दिन टूटा फिर शाम बढ़ी फिर सूनी सुनसाँ रात चढ़ी ये बदन टूट पुर्ज़ा-पुर्ज़ा ये थकन कहे मर जा मर जा... अजब दास्ताँ है लेकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्का-बक्का...! साले कुत्ते हर्रामी तू बदज़ात चोर है नामी तू तेज़ाब जलन पस फफ्फोले इक रात बिताने घर हो ले... भट्ठी की आग में मांस जला ये खाल खिंची और साँस जला ये पेट कटी आँतें बोलें आधी पूरी बातें बोलें... अजब दास्ताँ है लेकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्का-बक्का...

Piyush Mishra

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