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"शर्म कर लो" ज़िंदा हो हाँ तुम कोई शक नहीं साँस लेते हुए देखा मैं ने भी है हाथ औ’ पैरों और जिस्म को हरकतें ख़ूब देते हुए देखा मैं ने भी है अब भले हो ये करते हुए होंठ तुम दर्द सहते हुए सख़्त सी लेते हो अब है इतना भी कम क्या तुम्हारे लिए ख़ूब अपनी समझ में तो जी लेते हो गहराती रातों में उठती कराहट को अंदर ही अंदर दबाते तो होगे अगली सुब्ह फिर बरसने को बेताब कोड़ों को दिल में सजाते तो होगे ज़माने की ठोकर को सह के सड़क पे यूँँ चीख़ों को दिल में सजाते तो होगे ज़माने की ठोकर को सह के सड़क पे यूँँ चीख़ों की ज़हमत उठाते तो होगे रोते से चेहरे पे लटकी-सी गर्दन का थोड़ा इज़ाफ़ा बढ़ाते तो होगे सोचा कभी है कि ज़िंदा यूँँ रहने के मतलब के माने हैं कैसे कहीं ज़िंदा यूँँ रहने के माने पे थूकें जो ज़िंदा यूँँ रहने का मतलब यही बदबू को बलग़म को ख़ुशबू की मरहम बता के भरम में हो मल-मल रहे कीड़ा है वो संग कीड़ों की दुनिया में कीड़ा ही बन के जो हर पल रहे

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता

Shariq Kaifi

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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"पराधीन भारत में भगतसिंह" आबोहवा ज़हर है चारों तरफ़ क़हर है आलम नहीं है ऐसा कि इश्क़ कर सकूँ मैं मैं तुझ पे मर तो जाता पर क्या करूँँ मेरी जाँ हालात ऐसे ना हैं कि तुझ पे मर सकूँ मैं ये ख़ून भीगी होली ये सर कटी बैसाखी ऐसे में तेरी चुनरी क्या सूँघ पाऊँगा मैं? ये माँग उजड़ा टीका ये सुन्न बैठी ममता ऐसे में तेरे कंगन क्या चूम पाऊँगा मैं ईसा की ले गवाही गौतम की ले गवाही हज़रत कबीर नानक के मन की ले गवाही मीरा क़सम है मुझ को राधा क़सम है मुझ को है दूसरा जनम तो लेना जनम है मुझ को उस दूसरे जनम में सिंदूर लाऊँगा मैं तेरी क़सम कि डोला तेरा उठाऊँगा मैं

Piyush Mishra

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"चाँदनी चौक की फ़ैक्टरी और मज़दूर" गिटर-पिटर यूँँ धूँ-धक्कड़ ये गुत्थम-गुत्थी चटर-पटर ये दंगल लाशें ज़ोर-जबर ये हड्डी घिस के चरर-परर... पट्ठे उठ जा तू ताल ठोक ये पसली में जा घुसी नोक ये खाँसी तगड़ी ज़ोरदार ये एसिड संग में कोलतार... अजब दास्ताँ है लेकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्क-बक्का...! ये पीठ है लकड़ी सख़त-सख़त ये सौ मन बोरी पटक-पटक ये काली-काली क्रीम जमा ये पॉलिश कर के खाए दमा... अरे उठ साले कि दिन चढ़ता फिर आई दुपहरी देख भरी ये खौं-खौं खाँसी रेत भरी... अजब दास्ताँ है लकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्का-बक्का...! ये निकला बलग़म थूकों में इक रोटी है सौ भूखों में उस पे हैं क़र्ज़े लाख चढ़े ये सूद-ब्याज बिंदास बढ़े भट्ठी की चाँदनी चम-चम-चम इक हुआ फेफड़ा कम-कम-कम स्टील कटर से कटे हाथ तेज़ाब गटर नायाब साथ अजब दास्ताँ है लेकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्का-बक्का...! ना ग्लास मास्क ना चश्मा भई लाशों के ढेर पे सपना भई सीलन घुटती अब सड़न-सड़न बदबू साँसें अरे व्हाट ए फ़न... फिर दिन टूटा फिर शाम बढ़ी फिर सूनी सुनसाँ रात चढ़ी ये बदन टूट पुर्ज़ा-पुर्ज़ा ये थकन कहे मर जा मर जा... अजब दास्ताँ है लेकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्का-बक्का...! साले कुत्ते हर्रामी तू बदज़ात चोर है नामी तू तेज़ाब जलन पस फफ्फोले इक रात बिताने घर हो ले... भट्ठी की आग में मांस जला ये खाल खिंची और साँस जला ये पेट कटी आँतें बोलें आधी पूरी बातें बोलें... अजब दास्ताँ है लेकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्का-बक्का...

Piyush Mishra

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"लेकिन प्रोड्यूसर्स ही बेवक़ूफ़ निकले" रात है नशे में... चाँद था में बोतल ये ही पल है अपने... इनको जी ले दो पल ये खारे-मीठे सपने... ये ज़िंदगी का टोटल बोतल के... दो पल... हैं टोटल मसख़रा समाँ है... बेवड़ा जहाँ है ज़िंदगी का पहिया... साला घिस रहा यहाँ है जिस दुकाँ पे दिल है... साली वो दुकाँ कहाँ है यहाँ की... दुकाँ वो... कहाँ है रात है नशे में... चाँद था में बोतल ये रात... कह रही है... हम सेे चल पड़ो कोई... मिला... तो रुक के पूछ लेंगे भई हलो ख़ैरियत तो है या कुछ मलाल है आदमी का आजकल कैसा हाल है... कभी मिले तो बोलना... कि हम भी ठीक-ठाक हैं आदमी का क्या है... वो ठीकइच होगा टुटेला-सा फुटेला... सड़क के बीच होगा उस को है पकड़नी... साली पाँच दो की लोकल लोकल से... होटल से... लोकल रात है नशे में... चाँद था में बोतल

Piyush Mishra

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"मुंबई, सफलता, स्टारडम" वो चकाचौंध है यार कहीं तुम खो मत जाना...! वो बिजली की इक कौंध यार वो बादल की एक ग़रज़ यार वो चमक मारती... गड़-गड़ करती आज रवाँ कल मुर्दा है... और आज जवाँ कल बूढ़ी है... और आज हसीं कल बद सेूरत और आज पास कल दूरी है... वो रेल की छुक-छुक जैसी है जो दूर-दूर को जाते-जाते बहुत दूर खो जाती है... और धुन उस की बस आस-पास की पटरी पे रो जाती है... वो कोहरे वाली रात को जाते राहगरी के जूतों की वैसी वाली-सी खट्-खट् है जो दरवाज़े के पास गुज़रती चौंकाती झकझोर मारती... भरी नींद की तोड़ मारती कानों से टकराती है... और फिर इकदम उस धुप्प अँधेरे के अंदर घुस जाती है...! वो बूढ़े चौकीदार की सूजी थकन भरी आँखों में आई नींद की वैसी झपकी है... जो रात में पल-पल आती है... पर मालिक की गाड़ी के तीखे हॉर्न की चीख़ी पौं-पौं में इक झटके में भग जाती है...! वो भरी जवानी की बेवा की आँख में बैठी हसरत है... जो बाल खोल उजली साड़ी में... भरी महकती काया ले सूनापन तकती जाती है... जो कसक मारती... भरे गले में फँसती-दबती मुश्किल से बस इक पल को ही आ पाती है... और दूजे पल ही टूट पड़ी चूड़ी की छन्नक छन्न-छन्न से बिखर-बिखर को जाती है...! ...खोज में जिस की जाते हो उस को इक पल... थोड़ा टटोल के हाथ घुमा के... ज़रा मोड़ के पैंट के पिछले पॉकेट में भी छूने की कोशिश करना...! ऐसा ना हो कि खोज तुम्हारे अंदर ही बैठी हो और बस... किसी वजह से लुकी-छिपी हो...! खोजे जाने के डर से शायद तुम सेे ही कुछ डरी-डरी हो...! गर आँख खोल के देखोगे तो दिख जाएगी... पर अँधे हो के देख लिया तो याद हमेशा रखना ये कि पास तुम्हारे आज अगर तो कल तक के आते-आते वो धुँधली भी हो सकती है और परसों तक तो पक्का ही हाथों से भी खो सकती है... वो चकाचौंध है यार कहीं तुम खो मत जाना...

Piyush Mishra

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"जीना इसी का नाम है" दर-ब-दर की ठोकरों का लुत्फ़ पूछो क्या सनम आवारगी को हम ने तो अल्लाह समझ लिया...! ज़िंदगी से बात की इक कश लिया फिर चल दिए ज़िंदगी को धुएँ का छल्ला समझ लिया... वक़्त से यारी हमारी जम नहीं पाई कभी वो जो मिला हम को नहीं बोला वो करता था यही... कि संग चल ओ यार मेरे संग चल हाँ संग चल तू छोड़ परवाह और कुछ बस संग चल बस संग चल... हर आह मीठी हो पड़ेगी जो रहूँगा साथ मैं हर राह सीधी हो पड़ेगी जो रहूँगा साथ मैं... मैं पर्वतों के इस सिरे से उस सिरे तक ले चलूँ कि जिस सिरे पे बैठने का ख़्वाब पाले बैठा तू! पर क्या बताएँ हम को तो आदत ही कुछ ऐसी पड़ी वो बात करता रास्तों की हम करे पगडंडी की... वो जन्नतों की बात करता हम ये कह देते मियाँ कि दोज़ख़ों का भी लगे हाथों ना ले लें जायज़ा...? वो पक गया वो चट गया फिर एक दिन बोला यही... कि बिन मेरे तू क्या करेगा तू ने सोचा है कभी...? ...अब हम ने भी फिर ज़ोर डाला थोड़ा-सा दिम्माग़ पर और बोले क्यूँ ना कश लगा लें इक तुम्हारी बात पर... होंठ के आगे ये अंगारा सुलग जो जाएगा तो आग पे सोचेंगे सोचो लुत्फ़ आएगा... वो बोला कि बस पंगा यही ये आग मुझ को दे दे तू फिर जो कहेगा तेरे क़दमों में पड़ा है शर्त यूँँ... तो हम भड़क के हट लिए और हम कड़क के फट लिए कि एक तो तू ने हमें निठल्ला समझ लिया... अरे सौदे हम ने भी किए हैं जो हमें तू ने यूँँ ही इक नातजुर्बेकार-सा दल्ला समझ लिया...

Piyush Mishra

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