nazmKuch Alfaaz

ख़्वाब शब की मुंडेरों पे बैठे हुए घूरते हैं मुझे मेरी आँखों में बसने को बेचैन हैं मैं इसी ख़ौफ़ से रात भर जागता हूँ कि मैं सो गया गर तो ये मेरी आँखों में बस जाएँगे और कल उन की क़ीमत चुकानी पड़ेगी मुझे

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है

Sandeep Thakur

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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कैसी ख़ामोशी है वीरानी है सन्नाटा है कोई आहट है न आवाज़ न कोई धड़कन दिल है या क़ब्र सुलगती हुई तन्हाई की ज़ेहन है या किसी बेवा का अकेला आँगन उड़ गया रंग हर इक सोच के आईने का शब के बे-नूर दुपट्टे से सितारे टूटे जम गई गर्द ख़यालों की हसीं राहों पर मुद्दतें हो गईं उम्मीद का दामन छूटे यक-ब-यक दूर बहुत दूर बहुत दूर कहीं तेरी पाज़ेब छनकने की सदा आने लगी शौक़ ने पाँव बढ़ाए उसी आवाज़ की सम्त तुझ से मिलने की लगन और भी तड़पाने लगी ये खंडर आज जहाँ रात की तारीकी में तू ने भूले हुए अफ़्साने को दोहराया है इसी उजड़े हुए वीरान खंडर में कि जहाँ कितने दिन ब'अद तिरा साया नज़र आया है इसी उजड़े हुए वीरान खंडर में हम ने उम्र भर साथ निभाने की क़सम खाई थी इसी उजड़े हुए वीरान खंडर में तेरे थरथराते हुए होंटों पे दुआ आई थी रस्म कोई हो मगर हम को जुदा कर न सके ये रिवायात न पहनाएँ कभी ज़ंजीरें हम कि इस राज़ से इस बात से ना-वाक़िफ़ थे कि दु'आओं से बदलती ही नहीं तक़दीरें लेकिन अब रस्म कोई कुछ न कहेगी मुझ से अब रिवायात को मजबूर किया है मैं ने अब न रोकेगा मिरी राह ज़माना बढ़ कर जो भी अंजाम हो ये सोच लिया है मैं ने मैं मुक़द्दर से गले मिल के नहीं रो सकता तुझ को पाना मिरा मक़्सद है तुझे पाऊँगा आज ठुकरा के हर इक मस्लहत-अंदेशी को तेरे साए के तआक़ुब में चला जाऊँगा

Kafeel Aazar Amrohvi

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सुना है कि बूढ़ी हवेली में हर शब भटकती है इक रूह जिस के बदन पर पुरानी रिवायात के खोखले-पन का मल्बूस है जिस की पेशानी के ज़ख़्म से ख़ून बहता है माज़ी की तहज़ीब का और वो चीख़ती है कि बूढ़ी हवेली से उस को निकालो पुरानी रिवायात के खोखले-पन के मल्बूस को फाड़ डालो सुनो शहर वालो

Kafeel Aazar Amrohvi

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हर एक शाम मुझे यूँँ ख़याल आता है कि जैसे टाट का मैला फटा हुआ पर्दा तुम्हारे हाथ की जुम्बिश से काँप जाएगा कि जैसे तुम अभी दफ़्तर से लौट आओगे मुझे तो याद नहीं कुछ तुम्हारे सर की क़सम मगर पड़ोस की लड़की बता रही थी कि मैं अब अपनी माँग में अफ़्शाँ नहीं सजाती हूँ तवे पे रोटियाँ अक्सर जलाई हैं मैं ने शकर के बदले नमक चाय में मिलाती हूँ वो कह रही थी कि नंगी कलाइयाँ मेरी तमाम उम्र यूँँही चूड़ियों को तरसेंगी ग़मों की धूप में जलते हुए इस आँगन पर मसर्रतों की घटाएँ कभी न बरसेंगी वो कह रही थी कि तुम अब कभी न आओगे गली के मोड़ पे लेकिन हर एक शाम मुझे तुम्हारे क़दमों की आहट सुनाई देती है हर एक शाम मुझे यूँँ ख़याल आता है कि जैसे तुम अभी दफ़्तर से लौट आओगे

Kafeel Aazar Amrohvi

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अभी से उन के लिए इतनी बे-क़रार न हो किया है मुझ को बहुत बे-क़रार छेड़ा है तुम्हारे शे'र सुना कर तुम्हारे सर की क़सम सहेलियों ने मुझे बार बार छेड़ा है कशिश नहीं है तुम्हारे बिना बहारों में ये छत ये चाँद सितारे उदास लगते हैं चमन का रंग नसीम-ए-सहर गुलाब के फूल नहीं हो तुम तो ये सारे उदास लगते हैं ख़बर सुनी है कभी जब तुम्हारे आने की मैं आइने में दुल्हन बन के मुस्कुराई हूँ गई हूँ दामन-ए-दिल को ख़ुशी से भरने मगर जहान भर की उदासी समेट लाई हूँ कहीं पे गाए गए हैं जो गीत बाबुल के तो अजनबी से ख़यालों में खो गई हूँ मैं तुम्हारी याद के सीने पे बार-हा 'आज़र' तसव्वुरात का सर रख के सो गई हूँ मैं तुम्हें यक़ीन न होगा अकेले कमरे में मैं अपनी जान से प्यारे ख़ुतूत पढ़ती हूँ तमाम रात तुम्हें याद करती रहती हूँ तमाम रात तुम्हारे ख़ुतूत पढ़ती हूँ तुम आ भी जाओ कि गुज़रे हुए दिनों की तरह सुलग न जाएँ कहीं हसरतों की तस्वीरें उदास पा के न छेड़ें सहेलियाँ मुझ को बदल भी दो मिरी तन्हाइयों की तक़दीरें

Kafeel Aazar Amrohvi

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कब तलक ख़्वाबों से धोका खाओगी कब तलक स्कूल के बच्चों से दिल बहलाओगी कब तलक मुन्ना से शादी के करोगी तज़्किरे ख़्वाहिशों की आग में जलती रहोगी कब तलक छुट्टियों में कब तलक हर साल दिल्ली जाओगी कब तलक शादी के हर पैग़ाम को ठुकराओगी चाय में पड़ता रहेगा और कितने दिन नमक बंद कमरे में पढ़ोगी और कितने दिन ख़ुतूत ये उदासी कब तलक कब तलक नज़्में लिखोगी रोओगी यूँँ रात की ख़ामोशियों में कब तलक बाइबल में कब तलक ढूँडोगी ज़ख़्मों का इलाज मुस्कुराहट में छुपाओगी कहाँ तक अपने ग़म कब तलक पूछोगी टेलीफ़ोन पर मेरा मिज़ाज फ़ैसला कर लो कि किस रस्ते पे चलना है तुम्हें मेरी बाँहों में सिमटना है हमेशा के लिए या हमेशा दर्द के शो'लों में जलना है तुम्हें कब तलक ख़्वाबों से धोके खाओगी

Kafeel Aazar Amrohvi

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