nazmKuch Alfaaz

तुम मिरे पास रहो साथ रहो और ये एहसास रहे मैं कि आज़ाद हूँ जीने के लिए और ज़िंदा हूँ ख़ुद अपने अंदर अपनी ही ज़ात में ताबिंदा हूँ अपनी हर साँस पे क़ब्ज़ा है मिरा अपनी पाकीज़ा तमन्नाओं की तकमील का हक़ है मुझ को अपने मासूम से जज़्बात की तर्सील का हक़ है मुझ को ये ज़मीं मेरी भी ये दश्त-ओ-चमन मेरे भी सिर्फ़ आँगन ही नहीं कोह-ओ-दमन मेरे भी माह-ओ-अंजुम भी मिरे नीला तबक़ मेरा भी जितना उन पर है तुम्हारा वही हक़ मेरा भी शर्त बस ये है कि तुम साथ रहो पास रहो मेरी हर मर्ज़ी में शामिल हो तुम्हारी मर्ज़ी मेरी हर साँस की शाहिद हों तुम्हारी साँसें मेरे हर राज़ की हासिल हो तुम्हारी धड़कन और हम एक ही ज़ंजीर में पा-बस्ता हों

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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याद है एक दिन? मेरी मेज़ पे बैठे-बैठे सिगरेट की डिबिया पर तुम ने एक स्केच बनाया था आ कर देखो उस पौधे पर फूल आया है.

Gulzar

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अभी कुछ और साँसें रह गई हैं अभी कुछ और रिसालों तक मुझे गिनना है उन को अभी कुछ क़र्ज़ है मुझ पर सभी का अभी कुछ और ख़ुशियाँ बाँटनी हैं अभी कुछ क़हक़हों को नग़्मगी ख़ैरात करनी है गुहर करना है लफ़्ज़ों को ज़मीन-ए-हर्फ़-ओ-मा'नी से अभी कुछ ख़ार चुनने हैं ख़यालों को धनक बनना है शायद नए ख़्वाबों को सूरत बख़्शनी है अभी ज़र्रों को वुसअ'त बख़्शनी है हरे मौसम से ख़ुशबू कस्ब करनी है लहू देना है सारे ज़र्द पत्तों और फूलों को हवाओं को सुबुक-गामी सिखानी है अँधेरों को सितारों को अभी मशअ'ल दिखानी है अभी बादल को बारिश दान देनी है चमकते चाँद को वीरान माथे पर सजाना है कहीं मेहंदी का बूटा और कहीं पर नीम उगाना है मिरे अल्लह समझ में आ गया मेरे अभी कुछ और दिन जीना है मुझ को अभी दुनिया को है मेरी ज़रूरत

Rafia Shabnam Abidi

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अपने बढ़ते हुए बालों को कटा लूँ तो चलूँ ग़ुस्ल-ख़ाने में ज़रा धूम मचा लूँ तो चलूँ और एक केक मज़ेदार सा खा लूँ तो चलूँ अभी चलता हूँ ज़रा प्यास बुझा लूँ तो चलूँ रात में इक बड़ा दिलचस्प तमाशा देखा मुझ से मत पूछ मिरे यार कि क्या क्या देखा ठीक कहते हो मधुर सा कोई सपना देखा आँख तो मल लूँ ज़रा होश में आ लूँ तो चलूँ मैं थका-हारा था इतने में मदारी आया उस ने कुछ पढ़ के मिरे सर को ज़रा सहलाया मैं ने ख़ुद को किसी रंगीन महल में पाया ऐसे दो-चार महल और बना लूँ तो चलूँ जाने क्या बात है बाजी को जो है मुझ से जलन सब से कहती हैं कि इस लौंडे के बिगड़े हैं चलन मुझ को पीटा तो मिरा अश्कों से भीगा दामन अपने भीगे हुए दामन को सुखा लूँ तो चलूँ मेरी आँखों में अभी तक है शरारत का ग़ुरूर अपनी दानाई का या'नी कि हिमाक़त का ग़ुरूर दोस्त कहते हैं इसे तो है ज़ेहानत का ग़ुरूर ऐसे वहमों से अभी ख़ुद को निकालूँ तो चलूँ

Rafia Shabnam Abidi

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आज भी कोई कहीं गोश-बर-आवाज़ न था आज भी चारों तरफ़ लोग थे अंधे बहरे आज भी मेरी हर इक सोच पे बैठे पहरे आज भी तुम मिरी हर साँस के मालिक ठहरे मेरा गुम-नाम सा खोया सा ये बेचैन वजूद एक पहचान का सदियों से जो दीवाना रहा आज भी अपने से बेगाना रहा और जिया भी तो जिया बन के किसी का साया आज भी मुझ से मिरा मैं नहीं मिलने पाया आज भी मैं ने ख़ुद अपने से मुलाक़ात न की एक पल ही को सही अपने ही दिल से मगर दिल की कोई बात न की बीती सदियों की तरह आज भी आज का दिन बीत गया

Rafia Shabnam Abidi

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