अभी कुछ और साँसें रह गई हैं अभी कुछ और रिसालों तक मुझे गिनना है उन को अभी कुछ क़र्ज़ है मुझ पर सभी का अभी कुछ और ख़ुशियाँ बाँटनी हैं अभी कुछ क़हक़हों को नग़्मगी ख़ैरात करनी है गुहर करना है लफ़्ज़ों को ज़मीन-ए-हर्फ़-ओ-मा'नी से अभी कुछ ख़ार चुनने हैं ख़यालों को धनक बनना है शायद नए ख़्वाबों को सूरत बख़्शनी है अभी ज़र्रों को वुसअ'त बख़्शनी है हरे मौसम से ख़ुशबू कस्ब करनी है लहू देना है सारे ज़र्द पत्तों और फूलों को हवाओं को सुबुक-गामी सिखानी है अँधेरों को सितारों को अभी मशअ'ल दिखानी है अभी बादल को बारिश दान देनी है चमकते चाँद को वीरान माथे पर सजाना है कहीं मेहंदी का बूटा और कहीं पर नीम उगाना है मिरे अल्लह समझ में आ गया मेरे अभी कुछ और दिन जीना है मुझ को अभी दुनिया को है मेरी ज़रूरत
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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अपने बढ़ते हुए बालों को कटा लूँ तो चलूँ ग़ुस्ल-ख़ाने में ज़रा धूम मचा लूँ तो चलूँ और एक केक मज़ेदार सा खा लूँ तो चलूँ अभी चलता हूँ ज़रा प्यास बुझा लूँ तो चलूँ रात में इक बड़ा दिलचस्प तमाशा देखा मुझ से मत पूछ मिरे यार कि क्या क्या देखा ठीक कहते हो मधुर सा कोई सपना देखा आँख तो मल लूँ ज़रा होश में आ लूँ तो चलूँ मैं थका-हारा था इतने में मदारी आया उस ने कुछ पढ़ के मिरे सर को ज़रा सहलाया मैं ने ख़ुद को किसी रंगीन महल में पाया ऐसे दो-चार महल और बना लूँ तो चलूँ जाने क्या बात है बाजी को जो है मुझ से जलन सब से कहती हैं कि इस लौंडे के बिगड़े हैं चलन मुझ को पीटा तो मिरा अश्कों से भीगा दामन अपने भीगे हुए दामन को सुखा लूँ तो चलूँ मेरी आँखों में अभी तक है शरारत का ग़ुरूर अपनी दानाई का या'नी कि हिमाक़त का ग़ुरूर दोस्त कहते हैं इसे तो है ज़ेहानत का ग़ुरूर ऐसे वहमों से अभी ख़ुद को निकालूँ तो चलूँ
Rafia Shabnam Abidi
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आज भी कोई कहीं गोश-बर-आवाज़ न था आज भी चारों तरफ़ लोग थे अंधे बहरे आज भी मेरी हर इक सोच पे बैठे पहरे आज भी तुम मिरी हर साँस के मालिक ठहरे मेरा गुम-नाम सा खोया सा ये बेचैन वजूद एक पहचान का सदियों से जो दीवाना रहा आज भी अपने से बेगाना रहा और जिया भी तो जिया बन के किसी का साया आज भी मुझ से मिरा मैं नहीं मिलने पाया आज भी मैं ने ख़ुद अपने से मुलाक़ात न की एक पल ही को सही अपने ही दिल से मगर दिल की कोई बात न की बीती सदियों की तरह आज भी आज का दिन बीत गया
Rafia Shabnam Abidi
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तुम मिरे पास रहो साथ रहो और ये एहसास रहे मैं कि आज़ाद हूँ जीने के लिए और ज़िंदा हूँ ख़ुद अपने अंदर अपनी ही ज़ात में ताबिंदा हूँ अपनी हर साँस पे क़ब्ज़ा है मिरा अपनी पाकीज़ा तमन्नाओं की तकमील का हक़ है मुझ को अपने मासूम से जज़्बात की तर्सील का हक़ है मुझ को ये ज़मीं मेरी भी ये दश्त-ओ-चमन मेरे भी सिर्फ़ आँगन ही नहीं कोह-ओ-दमन मेरे भी माह-ओ-अंजुम भी मिरे नीला तबक़ मेरा भी जितना उन पर है तुम्हारा वही हक़ मेरा भी शर्त बस ये है कि तुम साथ रहो पास रहो मेरी हर मर्ज़ी में शामिल हो तुम्हारी मर्ज़ी मेरी हर साँस की शाहिद हों तुम्हारी साँसें मेरे हर राज़ की हासिल हो तुम्हारी धड़कन और हम एक ही ज़ंजीर में पा-बस्ता हों
Rafia Shabnam Abidi
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