nazmKuch Alfaaz

हथियार हाथ में लिए साँस रोके आँखें खोले शिकार की ताक में बैठा हूँ मैं चूक की कोई गुंजाइश ही नहीं न ज़रा सी भी नहीं कि हल्की से हल्की हरकत पर आँखों से ओझल हो जाने के लिए मशहूर है मेरा शिकार बिजली सा तेज़ लोमड़ी सा चालाक-ओ-चतुर है मिरा शिकार बड़ा ही जोखम भरा खेल है शिकार आँख और कान बचा कर सीधे आँख पर धावा बोलता है मेरा शिकार और ऐसी ख़ौफ़नाक आवाज़ रातों की नींद उड़ा देता है मेरा शिकार शिकार खिलाड़ियों का खेल शिकार ताज-ओ-तख़्त वालों का खेल राजा महाराजा नवाब ओ अफ़सर जागीर-दार ज़मींदार वॉय्सरॉय गवर्नर सदियों से साहिबों को मसरूफ़ रखता ये खेल मैं भी कोई ख़ाली नहीं बैठा हथियार हाथ में लिए साँस रोके आँखें खोले शिकार की ताक में बैठा हूँ मैं खिड़की के पार अख़बार मोड़े बे-ख़ौफ़ मक्खी के इंतिज़ार में बैठा हूँ मैं

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”

Zubair Ali Tabish

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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बचपन में जब मैं शाम को गाड़ी की खिड़की से झाँक कर देखता तो मुस्कुराते दूधिया सफ़ेद चाँद को अपने बग़ल में पाता मानो मुझ से दौड़ लगा रहा है कोई भी सड़क कोई भी मोड़ किसी भी सम्त किसी भी ओर मैं जहाँ भी जाऊँ मुझ से क़दम से क़दम मिला रहा है पर जाने क्यूँ ये मुझ से जीतने के लिए नहीं दौड़ता कि मैं जब रुकूँ ये रुकता है मैं जब चलूँ या चलता है गाड़ी रफ़्तार पकड़े चाँद भी रफ़्तार पकड़ता है गाड़ी रेड लाइट पर रुके चाँद भी रुकता है अब बड़ा हो रहा हूँ तो ज़िंदगी से दौड़ लगा रहा हूँ ज़िंदगी संग-दिल है मैं आगे रहूँ या पीछे ज़िंदगी नहीं रुकती है मुझे ज़िंदगी से दौड़ नहीं लगानी चाँद निकल आया है तो गाड़ी भी निकालो मुझे चाँद से दौड़ लगानी है

Uday Bansal

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दिन चढ़ते ही जहाँ बुद्धम् शर्णम् गच्छामी गूँज उठता है जहाँ हनूमान मंदिर में घंटियाँ बजने लगती हैं जहाँ लोग मस्जिद गिरजे से ऊपर वाले को याद कर दिन के काम पे निकल पड़ते हैं मैं ने वो लंका देखी है मैं ने सोने की लंका देखी है मैं ने रावन राक्षस की लंका देखी है लेकिन मैं ने लंका में ये भी देखा कि इंसान अपने अंदर के राक्षस का वध कर सारी भिन्नताएँ भुला कर आपसी रंज मिटा कर एक दूसरे के साथ अम्न-ओ-शांति से रह सकता है बस शर्त ये उसे समुंदर से घिरे एक जज़ीरे पर छोड़ कर तो देखो

Uday Bansal

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जब कभी मैं अपनी कोई पुरानी लिखी नज़्म उठाऊँ तो वो कुछ बदली बदली सी लगती है उसे जितनी बार पढ़ो उतनी ही बार मेरी राय उस के बारे में बदलने लगती है कि कभी नज़्म जी को अच्छी लगती है तो कभी अखरती है कभी चेहरे पे मुस्कान तो कभी माथे पे शिकन आने लगती है इस उलझन का क्या कोई हल है क्या मैं अपने क़लम पे भरोसा कर अपनी चिंताओं को नज़र-अंदाज़ कर अपनी नज़्में दुनिया के हवाले कर सकता हूँ क्या मैं ये जोखम ले सकता हूँ नतीजा कुछ भी हो मोती की तलाश में समुंदर की गहराइयों में ग़ोता-ख़ोर जाने से ख़ुद को रोक नहीं सकता बारिश हो न हो फ़स्ल उगे न उगे किसान बोवाई करना हल चलाना छोड़ नहीं सकता अगर ग़ौर किया जाए तो जोखम वो मोल ले रहा है जो मेरी नज़्में पढ़ने वाला है

Uday Bansal

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धुएँ के क़फ़स में क़ैद पैसिव स्मोकर खुल कर साँस लेने को तरसता तड़पता गले से हवा मानो उतरती नहीं हवा में कीलें लगीं है जैसे जो खाँसने पर भी गले से गिरती नहीं धुएँ के क़फ़स में क़ैद पैसिव स्मोकर हवा इस क़दर है रूखी कि अंदर से गला छिलने लगा है अंदर एक ज़ख़्म होने लगा है बहुत बीमार होने लगा है पैसिव स्मोकर कैंसर का शिकार होने लगा है पैसिव स्मोकर अन-गिनत फ़ैक्ट्रीयों की सिगरेट सी चिमनियों ने इस धरती को बना दिया है एक पैसिव स्मोकर

Uday Bansal

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