बचपन में जब मैं शाम को गाड़ी की खिड़की से झाँक कर देखता तो मुस्कुराते दूधिया सफ़ेद चाँद को अपने बग़ल में पाता मानो मुझ से दौड़ लगा रहा है कोई भी सड़क कोई भी मोड़ किसी भी सम्त किसी भी ओर मैं जहाँ भी जाऊँ मुझ से क़दम से क़दम मिला रहा है पर जाने क्यूँ ये मुझ से जीतने के लिए नहीं दौड़ता कि मैं जब रुकूँ ये रुकता है मैं जब चलूँ या चलता है गाड़ी रफ़्तार पकड़े चाँद भी रफ़्तार पकड़ता है गाड़ी रेड लाइट पर रुके चाँद भी रुकता है अब बड़ा हो रहा हूँ तो ज़िंदगी से दौड़ लगा रहा हूँ ज़िंदगी संग-दिल है मैं आगे रहूँ या पीछे ज़िंदगी नहीं रुकती है मुझे ज़िंदगी से दौड़ नहीं लगानी चाँद निकल आया है तो गाड़ी भी निकालो मुझे चाँद से दौड़ लगानी है
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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हथियार हाथ में लिए साँस रोके आँखें खोले शिकार की ताक में बैठा हूँ मैं चूक की कोई गुंजाइश ही नहीं न ज़रा सी भी नहीं कि हल्की से हल्की हरकत पर आँखों से ओझल हो जाने के लिए मशहूर है मेरा शिकार बिजली सा तेज़ लोमड़ी सा चालाक-ओ-चतुर है मिरा शिकार बड़ा ही जोखम भरा खेल है शिकार आँख और कान बचा कर सीधे आँख पर धावा बोलता है मेरा शिकार और ऐसी ख़ौफ़नाक आवाज़ रातों की नींद उड़ा देता है मेरा शिकार शिकार खिलाड़ियों का खेल शिकार ताज-ओ-तख़्त वालों का खेल राजा महाराजा नवाब ओ अफ़सर जागीर-दार ज़मींदार वॉय्सरॉय गवर्नर सदियों से साहिबों को मसरूफ़ रखता ये खेल मैं भी कोई ख़ाली नहीं बैठा हथियार हाथ में लिए साँस रोके आँखें खोले शिकार की ताक में बैठा हूँ मैं खिड़की के पार अख़बार मोड़े बे-ख़ौफ़ मक्खी के इंतिज़ार में बैठा हूँ मैं
Uday Bansal
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दिन चढ़ते ही जहाँ बुद्धम् शर्णम् गच्छामी गूँज उठता है जहाँ हनूमान मंदिर में घंटियाँ बजने लगती हैं जहाँ लोग मस्जिद गिरजे से ऊपर वाले को याद कर दिन के काम पे निकल पड़ते हैं मैं ने वो लंका देखी है मैं ने सोने की लंका देखी है मैं ने रावन राक्षस की लंका देखी है लेकिन मैं ने लंका में ये भी देखा कि इंसान अपने अंदर के राक्षस का वध कर सारी भिन्नताएँ भुला कर आपसी रंज मिटा कर एक दूसरे के साथ अम्न-ओ-शांति से रह सकता है बस शर्त ये उसे समुंदर से घिरे एक जज़ीरे पर छोड़ कर तो देखो
Uday Bansal
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जब कभी मैं अपनी कोई पुरानी लिखी नज़्म उठाऊँ तो वो कुछ बदली बदली सी लगती है उसे जितनी बार पढ़ो उतनी ही बार मेरी राय उस के बारे में बदलने लगती है कि कभी नज़्म जी को अच्छी लगती है तो कभी अखरती है कभी चेहरे पे मुस्कान तो कभी माथे पे शिकन आने लगती है इस उलझन का क्या कोई हल है क्या मैं अपने क़लम पे भरोसा कर अपनी चिंताओं को नज़र-अंदाज़ कर अपनी नज़्में दुनिया के हवाले कर सकता हूँ क्या मैं ये जोखम ले सकता हूँ नतीजा कुछ भी हो मोती की तलाश में समुंदर की गहराइयों में ग़ोता-ख़ोर जाने से ख़ुद को रोक नहीं सकता बारिश हो न हो फ़स्ल उगे न उगे किसान बोवाई करना हल चलाना छोड़ नहीं सकता अगर ग़ौर किया जाए तो जोखम वो मोल ले रहा है जो मेरी नज़्में पढ़ने वाला है
Uday Bansal
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धुएँ के क़फ़स में क़ैद पैसिव स्मोकर खुल कर साँस लेने को तरसता तड़पता गले से हवा मानो उतरती नहीं हवा में कीलें लगीं है जैसे जो खाँसने पर भी गले से गिरती नहीं धुएँ के क़फ़स में क़ैद पैसिव स्मोकर हवा इस क़दर है रूखी कि अंदर से गला छिलने लगा है अंदर एक ज़ख़्म होने लगा है बहुत बीमार होने लगा है पैसिव स्मोकर कैंसर का शिकार होने लगा है पैसिव स्मोकर अन-गिनत फ़ैक्ट्रीयों की सिगरेट सी चिमनियों ने इस धरती को बना दिया है एक पैसिव स्मोकर
Uday Bansal
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