दिन चढ़ते ही जहाँ बुद्धम् शर्णम् गच्छामी गूँज उठता है जहाँ हनूमान मंदिर में घंटियाँ बजने लगती हैं जहाँ लोग मस्जिद गिरजे से ऊपर वाले को याद कर दिन के काम पे निकल पड़ते हैं मैं ने वो लंका देखी है मैं ने सोने की लंका देखी है मैं ने रावन राक्षस की लंका देखी है लेकिन मैं ने लंका में ये भी देखा कि इंसान अपने अंदर के राक्षस का वध कर सारी भिन्नताएँ भुला कर आपसी रंज मिटा कर एक दूसरे के साथ अम्न-ओ-शांति से रह सकता है बस शर्त ये उसे समुंदर से घिरे एक जज़ीरे पर छोड़ कर तो देखो
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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
Lal Chand Falak
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है
ZafarAli Memon
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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बचपन में जब मैं शाम को गाड़ी की खिड़की से झाँक कर देखता तो मुस्कुराते दूधिया सफ़ेद चाँद को अपने बग़ल में पाता मानो मुझ से दौड़ लगा रहा है कोई भी सड़क कोई भी मोड़ किसी भी सम्त किसी भी ओर मैं जहाँ भी जाऊँ मुझ से क़दम से क़दम मिला रहा है पर जाने क्यूँ ये मुझ से जीतने के लिए नहीं दौड़ता कि मैं जब रुकूँ ये रुकता है मैं जब चलूँ या चलता है गाड़ी रफ़्तार पकड़े चाँद भी रफ़्तार पकड़ता है गाड़ी रेड लाइट पर रुके चाँद भी रुकता है अब बड़ा हो रहा हूँ तो ज़िंदगी से दौड़ लगा रहा हूँ ज़िंदगी संग-दिल है मैं आगे रहूँ या पीछे ज़िंदगी नहीं रुकती है मुझे ज़िंदगी से दौड़ नहीं लगानी चाँद निकल आया है तो गाड़ी भी निकालो मुझे चाँद से दौड़ लगानी है
Uday Bansal
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हथियार हाथ में लिए साँस रोके आँखें खोले शिकार की ताक में बैठा हूँ मैं चूक की कोई गुंजाइश ही नहीं न ज़रा सी भी नहीं कि हल्की से हल्की हरकत पर आँखों से ओझल हो जाने के लिए मशहूर है मेरा शिकार बिजली सा तेज़ लोमड़ी सा चालाक-ओ-चतुर है मिरा शिकार बड़ा ही जोखम भरा खेल है शिकार आँख और कान बचा कर सीधे आँख पर धावा बोलता है मेरा शिकार और ऐसी ख़ौफ़नाक आवाज़ रातों की नींद उड़ा देता है मेरा शिकार शिकार खिलाड़ियों का खेल शिकार ताज-ओ-तख़्त वालों का खेल राजा महाराजा नवाब ओ अफ़सर जागीर-दार ज़मींदार वॉय्सरॉय गवर्नर सदियों से साहिबों को मसरूफ़ रखता ये खेल मैं भी कोई ख़ाली नहीं बैठा हथियार हाथ में लिए साँस रोके आँखें खोले शिकार की ताक में बैठा हूँ मैं खिड़की के पार अख़बार मोड़े बे-ख़ौफ़ मक्खी के इंतिज़ार में बैठा हूँ मैं
Uday Bansal
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जब कभी मैं अपनी कोई पुरानी लिखी नज़्म उठाऊँ तो वो कुछ बदली बदली सी लगती है उसे जितनी बार पढ़ो उतनी ही बार मेरी राय उस के बारे में बदलने लगती है कि कभी नज़्म जी को अच्छी लगती है तो कभी अखरती है कभी चेहरे पे मुस्कान तो कभी माथे पे शिकन आने लगती है इस उलझन का क्या कोई हल है क्या मैं अपने क़लम पे भरोसा कर अपनी चिंताओं को नज़र-अंदाज़ कर अपनी नज़्में दुनिया के हवाले कर सकता हूँ क्या मैं ये जोखम ले सकता हूँ नतीजा कुछ भी हो मोती की तलाश में समुंदर की गहराइयों में ग़ोता-ख़ोर जाने से ख़ुद को रोक नहीं सकता बारिश हो न हो फ़स्ल उगे न उगे किसान बोवाई करना हल चलाना छोड़ नहीं सकता अगर ग़ौर किया जाए तो जोखम वो मोल ले रहा है जो मेरी नज़्में पढ़ने वाला है
Uday Bansal
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धुएँ के क़फ़स में क़ैद पैसिव स्मोकर खुल कर साँस लेने को तरसता तड़पता गले से हवा मानो उतरती नहीं हवा में कीलें लगीं है जैसे जो खाँसने पर भी गले से गिरती नहीं धुएँ के क़फ़स में क़ैद पैसिव स्मोकर हवा इस क़दर है रूखी कि अंदर से गला छिलने लगा है अंदर एक ज़ख़्म होने लगा है बहुत बीमार होने लगा है पैसिव स्मोकर कैंसर का शिकार होने लगा है पैसिव स्मोकर अन-गिनत फ़ैक्ट्रीयों की सिगरेट सी चिमनियों ने इस धरती को बना दिया है एक पैसिव स्मोकर
Uday Bansal
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