"शिकवा-ए-फ़िलिस्तीन" बाक़ी है दिल में थोड़ी सी इंसानियत अगर अहल-ए-नज़र तो करिए फ़िलिस्तीन पे नज़र जलते हुए ख़याम ये उठता हुआ धुआँ टूटे हुए मकान ये वीरान बस्तियाँ कुछ कह रही हैं अहल-ए-जहाँ ग़ौर से सुनो मज़लूम कर रहे हैं बयाँ ग़ौर से सुनो बाक़ी है दिल में थोड़ी सी इंसानियत अगर अहल-ए-नज़र तो करिए फ़िलिस्तीन पे नज़र हर रोज़ सुब्ह-ओ-शाम याँ बे-जुर्म-ओ-बे-ख़ता होती है बे-गुनाहों पे बे-इंतिहा जफ़ा मेरा मुतालबा है हर इक हक़-शनास से मरते हैं रोज़ लोग यहाँ भूख प्यास से मंज़र ये देख देख के दम घुटता है मिरा माँएँ पिसर की लाश पे पढ़ती हैं मर्सिया आती है शौर-ओ-शैन की हर सिम्त से सदा तिफ़्ल-ओ-जवान बूढ़ों के लाशे हैं जा-ब-जा कोई नहीं है बेकस-ओ-मुज़्तर का हम-नवाँ ज़ुल्म-ओ-सितम ये देख के ख़ामोश है जहाँ कहते हैं ख़ुद को उम्मत-ए-मुस्लिम का रहनुमा हामी नहीं है कोई मुसीबत में पर मिरा अहल-ए-अरब से आज ये मेरा ख़िताब है शिकवे का मेरे क्या कोई तुम पर जवाब है
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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"वो भी क्या ज़माना था" वो भी क्या ज़माना था तुझ को याद करने से ज़ेहन चैन पाता था दिल के ज़ख़्म भरते थे तेरा नाम लेने से इन उदास होंठो पर झट से मुस्कुराहट के ढेरो फूल खिलते थे तेरा दीद करने से कोर चश्म आँखों को रौशनाई मिलती थी तेरा ज़िक्र करने से गाँव की फ़ज़ा सारी ख़ुश गवार होती थी एक ये ज़माना है तुझ को याद करने से ज़ेहन तंग होता है दिल के ज़ख़्म खुलते हैं इन लतीफ़ होंठो पर ग़म की बिजली गिरती है होंठ अब मिरे ग़म की आग में झुलसते हैं तेरा दीद करने से सिर्फ़ दर्द मिलता हैं तेरा चेहरा आँखों में तीर बन के चुभता है तेरा ज़िक्र करने से गाँव की फ़ज़ा सारी दिल मलूल होती है ये अजब ज़माना है सिर्फ़ इस ज़माने में दर्द हाथ आया है अब मैं बस ये सोचूँ हूँ वो भी क्या ज़माना था
Shajar Abbas
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"हैरत" हुस्न महव-ए-हैरत है आज माजरा क्या है इश्क़ के मुसल्ले पर आज हज़रत-ए-दिल ने अपने पाँव रक्खे हैं आज हज़रत-ए-दिल को क्या हुआ है रब जाने जो हमेशा दामन को हुस्न से बचाते थे आज बा-वुज़ू होकर इश्क़ के मुसल्ले पर कैसे आ गए हैं वो हुस्न महव-ए-हैरत है
Shajar Abbas
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“वसीयत“ हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत मैं अब से पहले ख़ुतूत लिखता रहा हूँ तुझ को तुझे पता है मैं अब से पहले सभी ख़तों में ख़ुशी के अफ़्साने लिख रहा था हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत मगर ज़माना बदल गया अब ये ख़त जो मैं ने तुझे लिखा है पुराने वाले ख़तों के जैसा ये ख़त नहीं है तमाम ख़त से ये ख़त जुदा है हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत ये ख़त नहीं है ये ख़त की सूरत में मैं ने क़ासिद के हाथ तुझ को वसीयतें हैं जो मेरी मैं ने वो सब की सब लिख के भेज दी हैं हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत मिरी गुज़ारिश है अब ये तुझ सेे वसीयतें जो लिखी हैं मैं ने हर इक वसीयत को मेरी पढ़ना हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत मिरे जनाज़े पे जब भी आना कफ़न को रुख़ से मिरे हटाना ग़मों की मारी हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत ख़याल रखना मिरी वसीयत का मान रखना लिपट के मय्यत से जाँ न खोना जुदाई में मत निढाल होना हसीन आँखों से ख़ूँ न रोना लहू से दामन को मत भिगोना तड़प तड़प के न जान खोना ग़मों की मारी हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत ख़याल रखना मिरी वसीयत का मान रखना
Shajar Abbas
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"याद" ग़मों का राग सदा ज़िंदगी सुनाएगी हर एक गाम पे माज़ी की याद आएगी न माँगो ऐसे दुआ रब से ज़िंदगी के लिए हमारे बा'द तरस जाओगे ख़ुशी के लिए हमारी याद तुम्हें उम्र भर रुलाएगी बिछड़ के हम सेे तुम्हारे हसीन होंठो का तवाफ़ करने तबस्सुम कभी न आएगा तुम्हारे हाल का ग़म बेबसी मनाएगी ज़मीन-ए-दिल पे मुहब्बत के फूल ऐ हमदम तमाम उम्र करेंगे फ़िराक़ का मातम ग़मों का राग ये बाद-ए-सबा सुनाएगी
Shajar Abbas
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“कहाँ हो माँ” तुम्हारे बा'द माँ चारों तरफ़ घर में उदासी है ये आँगन उजड़ा उजड़ा है ये आँगन सूना सूना है मुझे अब अपना ये घर मिस्ल-ए-क़ब्रिस्तान लगता है मकाँ में अब मकीं वीरानियाँ होने लगी हैं माँ ये मंज़र देख कर घर का मिरा दम घुटने लगता है मिरे सीने में दिल है दिल के अंदर बे-क़रारी है मिरी आँखों के दर से ख़ून का दरिया निकलता है ज़मीन-ए-लब पे जो पहले ख़ुशी के फूल खिलते थे वो सब मुरझा चुके हैं माँ समझ में ये नहीं आता बयाँ कैसे करूँँ इस को तुम्हारे दूर जाने से जो सदमा दिल पे गुज़रा है जो रंज-ओ-ग़म उठाए हैं जो मैं ने दर्द झेला है बयाँ कैसे करूँँ उस को मिरे लब कपकपाते हैं बदन भी थरथराता है मैं जब बाहरस आ कर घर के अंदर पाँव रखता हूँ तो मेरी नज़रें फ़ौरन घर में उस जानिब को जाती हैं जहाँ तुम बैठा करती थीं जहाँ तुम बैठ कर हर रोज़ मेरी राह तकती थीं मुझे जब वो जगह ख़ाली नज़र आती है मेरी माँ तो मेरे फूल से दिल पर ग़मों की बिजली गिरती है अचानक से बदन पर तेज़ लर्ज़ा तारी होता है ये मेरे पाँ ज़मीं के सद्र पर यूँँ लड़खड़ाते हैं मैं गिर पड़ता हूँ मेरी माँ मैं ग़श खाकर ज़मीं के सद्र पर ही हाल से बे-हाल होकर जान खोता हूँ मुझे जब होश आता है मैं अपने हाल की परवाह नहीं करता हूँ प्यारी माँ तुम्हारे दूर जाने का अलम दिल पर उठा कर मैं मुसलसल ख़ून रोता हूँ गिरेबाँ चाक करता हूँ तमाचे मार कर रुख़ पर मैं रुख़ को लाल करता हूँ मैं तुम को घर के हर हिस्से के अंदर ढूँढ़ता हूँ माँ तुम्हें घर में न पाकर लब से ये फ़िक़रा निकालता है कहाँ हो माँ अगर नाराज़ हो मुझ सेे तो मेरी इल्तिजा है माँ ख़ुदा के वास्ते नाराज़गी को दूर कर दो तुम ख़ुदारा रू-ब-रू आओ मुझे पहले के जैसे अपनी जाँ कह कर सदाएँ दो कहाँ हो माँ मुझे आग़ोश में ले लो मिरी माँ तुम मिरी पहले के जैसे फिर बलाएँ लो मिरी माँ प्यारी माँ फिर मेरी पेशानी पे अपने फूल से होंठों के पाँ फिर नक़्श कर दो तुम मुझे आराम आ जाए बड़ा बैचैन रहता हूँ मिरी माँ मुख़्तसर ये है तुम्हारे दूर जाने से तुम्हारे लाल का इस दुख भरी दुनिया के अंदर एक पल को दिल नहीं लगता तुम्हारी याद में बस बैठ कर मैं रोता रहता हूँ अरे हाँ याद आया माँ तुम्हारे बारे बाबा जान से जब पूछता हूँ मैं मिरे बाबा कहाँ है माँ तो बाबा जान की पलकों पे कुछ मोती नुमा सी शय नज़र आती है प्यारी माँ मैं फिर से पूछता हूँ प्यारे बाबा जाँ कहाँ है माँ तो बाबा पास आते हैं मुझे सीने लगाते हैं वो फिर गोदी में लेते हैं मिरे सर पर वो अपना हाथ रख कर मुझ सेे कहते हैं मिरे लख़्त-ए-जिगर नूर-ए-नज़र दिलबर मिरे हमदम सुनो सर को उठाओ आसमाँ की सिम्त देखो तुम वो जो महताब की करवट में एक रौशन सितारा है तुम्हारी प्यारी माँ है वो
Shajar Abbas
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