nazmKuch Alfaaz

" शॉर्टकट " हम क्यूँँ दौड़ लगाऍं दोस्त ये सब अपना काम नहीं है ये भाग-दौड़ फ़क़त ज़िंदगी की है दोस्त जिस की मंज़िल मौत है पर सब को मगर उरूज-ए-तरक़्क़ी नशात-ए-दहर की तलाश या दौलत-ओ-शोहरत का रोज़ बहाना देती रहती है दोस्त अगर पहुँचना ही है मंज़िल-ए-मौत तलक तो वक़्त के ऊबड़-खाबड़ रस्ते पे हम क्यूँँ दौड़ लगाऍं दोस्त हम क्यूँँ न आज ऐसा करें कि अब इस ज़िंदगी के तलवों के नीचे हम अपने टूटे ख़्वाब बिछा दें आतिश-ए-अफ़सुर्दगी-ए-दिल से हम क्यूँँ न मलाल की तेग़-ए-आहन निकाल के इस ज़िंदगी के सीने में घुसा दें इस सफ़र-ए-मौत के तवील रस्ते को हम शॉर्टकट बना दें

khamakhaah0 Likes

Related Nazm

"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

37 likes

"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था

Divya 'Kumar Sahab'

28 likes

"नज़्म क्या है" शा'इरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़ल उर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटल नज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भी ये कभी नस्र है और मुअर्रा कभी नज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँ और आज़ाद में भी है इस का निशाँ नज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़ इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़ नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र है वज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर है वज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुए नसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगे वज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तो इस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहो मसनवी हो क़सीदा हो या मर्सिया नज़्म का मिलता है बच्चो हम को पता नज़्म में सिलसिला है ख़यालात का एक दरिया सा है देखो जज़्बात का वो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोई ये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद की वो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनो दोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो 'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगह हैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशह नज़्म में जो कहानी कही जाएगी शौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगी नज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखीं जो निहायत ही मशहूर साबित हुईं करता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआ नज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा

Amjad Husain Hafiz Karnataki

13 likes

“ख़ुदा अब मुझे चैन मिलता नहीं है” न आराम अब मुझ को इक पल भी यारों मुझे याद आया था वो कल भी यारों वो यारों मेरे साथ क्यूँँ कर गया ये कोई तो दवा हो जो आराम दे दे मैं दफ़्तर के पहिये में पिसने लगा हूँ हैं हाथों में पत्थर मैं ख़ुद आइना हूँ वो तारों से आगे मैं धरती के अंदर बना है वो पागल जो कल था सिकंदर वो कल था जहाँ पर वो अब भी वहीं है ख़ुदा अब मुझे चैन मिलता नहीं है मैं बरसों से दर दर भटकता रहा हूँ मैं बेचैन भी हूँ मैं बे-आसरा हूँ नए ज़ख़्म फिर से है लाई मोहब्बत कि जब से हुई है परायी मोहब्बत मोहब्बत का मुझ को सिला ये मिला है दिवानों का अब साथ में क़ाफ़िला है सुकूँ ढूँढ़ते ढूँढ़ते थक गया हूँ मैं दुनिया से आगे फ़लक तक गया हूँ ये दिल है कहीं और धड़कन कहीं है ख़ुदा अब मुझे चैन मिलता नहीं है

Amaan Pathan

7 likes

"कब तक ख़ैर मनाते हम" उल्फ़त के कूचों से साबित कैसे बचकर आते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम बड़ी बड़ी बातें कर दी थीं उन पर जान लुटाएंगे हुक़्म करें वो, आसमान से तारे भी ले आएँगे पर क़िस्मत और क़ुदरत इक थाली के चट्टे बट्टे थे कोशिश अपनी पूरी रहती पर अंगूर तो खट्टे थे बिगड़ा स्वाद जो उन के मुँह का उन को चटनी खानी थी बेचारा दिल, बेवकूफ़ था कुछ अपनी नादानी थी अदने से दिल की ख़ातिर क्या मूसल से डर जाते हम? हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम हम ने पूरी जुगत लगाई मगर सफलता ना मिल पाई फिर हम ने उम्मीद छोड़ दी ख़ुदस छेड़ी एक लड़ाई अब बातों में ना आएँगे उन जैसे ही बन जाएँगे उन की जानिब ना देखेंगे नाम 'नयनसुख' कह लाएँगे लेकिन हम थे सावन वाले और ऊपर से दिल के छाले छोड़ रेवड़ी उन की ख़ातिर हम ने रूखी सूखी खाई ऊँट सो गया उलटी करवट जमके ली उस ने जम्हाई पड़ते ओलों में अब देखो अपना सर मुंडवाते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम इधर प्रिये मधु है, और हम हैं तुम उस पार नज़र आते हो कैसे बीन बजाएँ हिय की तुम तो ऐसे पगुराते हो कान पे जूँ रेंगाने ख़ातिर हम प्रयत्न करते रहते हैं तिस पर तुम क्रोधित होते हो हम तुम सेे डरते रहते हैं ख़ैर, हुआ सो बिसरा देते तुम थोड़ा सा इतरा लेते हम थोड़ी मनुहार लगाकर कोप तुम्हारा छितरा देते किन्तु अतिप्रिय तुम्हें क्रोध था और ना इस का कोई बोध था हम सेे तुम कटते जाते थे यथा दुग्ध, फटते जाते थे इतने फटे हुए में कैसे अपनी टांग अड़ाते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

10 likes

More from khamakhaah

"मा'ज़ूर" मेरी खिड़की हॉस्पिटल के जानिब खुलती है वो जो कि सरकारी है रोज़ मुझे इन बीमारों की बू आती है उन बीमारों की जो हयात के ख़ातिर अपने अपने नंबर की पर्ची पकड़े दिन भर लाइन में रहते है रेंगते रहते हैं कीड़ों के मानिंद बूढ़े, बच्चे और औरतें तो बीमारी में बे-पर कीड़ों से लगते हैं मैं इनको देख देख कर ख़ुश होता रहता हूँ हँसता रहता हूँ इन की हालत पर इन की उम्मीदों पर क्यूँँकि मैं तो पैदाइशी अपाहिज हूँ इस लिए मेरी हालत इनसे काफ़ी बेहतर है जब मुझ को एहसास-ए-लम्स नहीं है तो फिर बिखरने का भी कोई डर नहीं है जब कोई आशा ही नहीं है तो फिर निराशा ही नहीं है

khamakhaah

0 likes

अंदाज़ा गूँजा है पस-ए-अब्र ये नाला-ओ-फ़ुग़ाँ-ए-बिस्मिल चूम रही है सीना-ओ-पा ये लब-ए-लाशा सी बाद-ए-सर्द फैल रहा है साया हरसू बहर-ए-अर्श चड़क उठ्ठी है नस नस या तो बारिश होने वाली है या तो आज क़यामत का दिन है

khamakhaah

1 likes

“सीढ़ी “ ज़ीस्त के सीने में वक़्त के ज़ीने में क़दम क़दम पे ढल रहा हूँ क़दम क़दम पे सड़ रहा हूँ यादों को याद करते करते फिर उलटे पाँव चढ़ रहा हूँ

khamakhaah

0 likes

बेख़ुदी आधी रात को फिर दीवारें मुझ सेे बोली थीं तस्वीरें मुस्कुराई थीं खिड़की आँखें खोली थी घड़ी ख़ामोशी ओढ़ी थी आईने में दरवाज़ा खुला था ज़ख़्मों से जुगनू निकला था ख़ून से ख़ुशबू फूटी थी चौखट पर चाँदी बिखरी थी ज़ेहन-ओ-दिल में बे-फ़िक्री थी परछाई ने खाल उतारी थी आसेबों ने बाल सँवारे थे बिस्तर पे भी चाँद सितारे थे दुनिया भर के नज़ारे थे अपने पहलू में ख़्वाब थे और वो भी बे-हिसाब थे इक सिगरेट के बुझने तक इक छिपकली के करवट लेने तक

khamakhaah

0 likes

" चमड़े की बेल्ट " जी सर आप को क्या चाहिए बताओ मुझ को ऐसी भैंस की चमड़े की बेल्ट चाहिए जिस की पीठ में धूप फिसल के मानो ऐसा रंग खिलाती थी जैसे कि चाँदनी रंग-ए-शब चूम रही हो जिस की पूँछ हमेशा मटकती चटकती थी गाती थी नाचती थी पैहम मौज-ए-हवा की सोहबत में जिस की इक दुश्मन थी कम्बख़्त एक चिड़िया जो हरदम करवट मार के पीठ में बैठी रहती थी जो भैंस अपनी सींगो में से रगड़-रगड़ के धूल उड़ाती थी जो इतनी बेग़ैरत थी नाज़ुक-ओ-कमसिन से सुर्ख़ हाथ के मानिंद हर किसी को अपना थन छूने देती थी जिस के ऊपर बच्चे चढ़के यम हूँ मैं यम हूँ मैं कहते रहते थे जो दिन-भर मुँह से ग़ुब्बारे बनाती थी जो पानी के चार घड़े पी जाती थी जो पूरी रात रोज़ दूध बनाती थी बता किसी ऐसी भैंस का तिरे पास चमड़े की बेल्ट है क्या दुकान पर ऐसी बेल्ट तो कब की हाथों हाथ बिक चुकी है सॉरी सर सारी ख़त्म हो चुकी हैं

khamakhaah

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on khamakhaah.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with khamakhaah's nazm.