nazmKuch Alfaaz

बेख़ुदी आधी रात को फिर दीवारें मुझ सेे बोली थीं तस्वीरें मुस्कुराई थीं खिड़की आँखें खोली थी घड़ी ख़ामोशी ओढ़ी थी आईने में दरवाज़ा खुला था ज़ख़्मों से जुगनू निकला था ख़ून से ख़ुशबू फूटी थी चौखट पर चाँदी बिखरी थी ज़ेहन-ओ-दिल में बे-फ़िक्री थी परछाई ने खाल उतारी थी आसेबों ने बाल सँवारे थे बिस्तर पे भी चाँद सितारे थे दुनिया भर के नज़ारे थे अपने पहलू में ख़्वाब थे और वो भी बे-हिसाब थे इक सिगरेट के बुझने तक इक छिपकली के करवट लेने तक

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”

Zubair Ali Tabish

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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अंदाज़ा गूँजा है पस-ए-अब्र ये नाला-ओ-फ़ुग़ाँ-ए-बिस्मिल चूम रही है सीना-ओ-पा ये लब-ए-लाशा सी बाद-ए-सर्द फैल रहा है साया हरसू बहर-ए-अर्श चड़क उठ्ठी है नस नस या तो बारिश होने वाली है या तो आज क़यामत का दिन है

khamakhaah

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“सीढ़ी “ ज़ीस्त के सीने में वक़्त के ज़ीने में क़दम क़दम पे ढल रहा हूँ क़दम क़दम पे सड़ रहा हूँ यादों को याद करते करते फिर उलटे पाँव चढ़ रहा हूँ

khamakhaah

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"मा'ज़ूर" मेरी खिड़की हॉस्पिटल के जानिब खुलती है वो जो कि सरकारी है रोज़ मुझे इन बीमारों की बू आती है उन बीमारों की जो हयात के ख़ातिर अपने अपने नंबर की पर्ची पकड़े दिन भर लाइन में रहते है रेंगते रहते हैं कीड़ों के मानिंद बूढ़े, बच्चे और औरतें तो बीमारी में बे-पर कीड़ों से लगते हैं मैं इनको देख देख कर ख़ुश होता रहता हूँ हँसता रहता हूँ इन की हालत पर इन की उम्मीदों पर क्यूँँकि मैं तो पैदाइशी अपाहिज हूँ इस लिए मेरी हालत इनसे काफ़ी बेहतर है जब मुझ को एहसास-ए-लम्स नहीं है तो फिर बिखरने का भी कोई डर नहीं है जब कोई आशा ही नहीं है तो फिर निराशा ही नहीं है

khamakhaah

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"याद का चेहरा" इक रोज़ की इक शाम को इक पार्क में मेरी तरफ़ रख रख के माथे को ज़मीं पे धूप वो आती रही और साथ में उस के कोई तो याद का चेहरा भी था जो धूप सीने पे लगा के अपने वो चेहरे की याद या याद का चेहरे को मेरी सम्त को लाती रही वो याद का चेहरा ढका था रौशनी से सर-ब-सर सो इस लिए मेरी नज़र में दूर से ओझल रहा पर जब मेरे नज़दीक वो आता रहा तो ये हुआ मेरी नज़र में और भी ओझल हुआ फिर और हुआ जैसे कि मिट्टी ख़ाक में ख़ुश्बू हवा में या सफ़ेद अक्षर किसी काग़ज़ पे और फिर देखते ही देखते जब मुझ सेे वो गुज़रा तो फिर मालूम मुझ को ये हुआ वो धूप था जो जाके कल की सुब्ह में खो जाएगा और मैं वो साया हूँ जो जा के रात में खो जाएगा

khamakhaah

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" शॉर्टकट " हम क्यूँँ दौड़ लगाऍं दोस्त ये सब अपना काम नहीं है ये भाग-दौड़ फ़क़त ज़िंदगी की है दोस्त जिस की मंज़िल मौत है पर सब को मगर उरूज-ए-तरक़्क़ी नशात-ए-दहर की तलाश या दौलत-ओ-शोहरत का रोज़ बहाना देती रहती है दोस्त अगर पहुँचना ही है मंज़िल-ए-मौत तलक तो वक़्त के ऊबड़-खाबड़ रस्ते पे हम क्यूँँ दौड़ लगाऍं दोस्त हम क्यूँँ न आज ऐसा करें कि अब इस ज़िंदगी के तलवों के नीचे हम अपने टूटे ख़्वाब बिछा दें आतिश-ए-अफ़सुर्दगी-ए-दिल से हम क्यूँँ न मलाल की तेग़-ए-आहन निकाल के इस ज़िंदगी के सीने में घुसा दें इस सफ़र-ए-मौत के तवील रस्ते को हम शॉर्टकट बना दें

khamakhaah

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