“सीढ़ी “ ज़ीस्त के सीने में वक़्त के ज़ीने में क़दम क़दम पे ढल रहा हूँ क़दम क़दम पे सड़ रहा हूँ यादों को याद करते करते फिर उलटे पाँव चढ़ रहा हूँ
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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अंदाज़ा गूँजा है पस-ए-अब्र ये नाला-ओ-फ़ुग़ाँ-ए-बिस्मिल चूम रही है सीना-ओ-पा ये लब-ए-लाशा सी बाद-ए-सर्द फैल रहा है साया हरसू बहर-ए-अर्श चड़क उठ्ठी है नस नस या तो बारिश होने वाली है या तो आज क़यामत का दिन है
khamakhaah
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" शॉर्टकट " हम क्यूँँ दौड़ लगाऍं दोस्त ये सब अपना काम नहीं है ये भाग-दौड़ फ़क़त ज़िंदगी की है दोस्त जिस की मंज़िल मौत है पर सब को मगर उरूज-ए-तरक़्क़ी नशात-ए-दहर की तलाश या दौलत-ओ-शोहरत का रोज़ बहाना देती रहती है दोस्त अगर पहुँचना ही है मंज़िल-ए-मौत तलक तो वक़्त के ऊबड़-खाबड़ रस्ते पे हम क्यूँँ दौड़ लगाऍं दोस्त हम क्यूँँ न आज ऐसा करें कि अब इस ज़िंदगी के तलवों के नीचे हम अपने टूटे ख़्वाब बिछा दें आतिश-ए-अफ़सुर्दगी-ए-दिल से हम क्यूँँ न मलाल की तेग़-ए-आहन निकाल के इस ज़िंदगी के सीने में घुसा दें इस सफ़र-ए-मौत के तवील रस्ते को हम शॉर्टकट बना दें
khamakhaah
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"मा'ज़ूर" मेरी खिड़की हॉस्पिटल के जानिब खुलती है वो जो कि सरकारी है रोज़ मुझे इन बीमारों की बू आती है उन बीमारों की जो हयात के ख़ातिर अपने अपने नंबर की पर्ची पकड़े दिन भर लाइन में रहते है रेंगते रहते हैं कीड़ों के मानिंद बूढ़े, बच्चे और औरतें तो बीमारी में बे-पर कीड़ों से लगते हैं मैं इनको देख देख कर ख़ुश होता रहता हूँ हँसता रहता हूँ इन की हालत पर इन की उम्मीदों पर क्यूँँकि मैं तो पैदाइशी अपाहिज हूँ इस लिए मेरी हालत इनसे काफ़ी बेहतर है जब मुझ को एहसास-ए-लम्स नहीं है तो फिर बिखरने का भी कोई डर नहीं है जब कोई आशा ही नहीं है तो फिर निराशा ही नहीं है
khamakhaah
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बेख़ुदी आधी रात को फिर दीवारें मुझ सेे बोली थीं तस्वीरें मुस्कुराई थीं खिड़की आँखें खोली थी घड़ी ख़ामोशी ओढ़ी थी आईने में दरवाज़ा खुला था ज़ख़्मों से जुगनू निकला था ख़ून से ख़ुशबू फूटी थी चौखट पर चाँदी बिखरी थी ज़ेहन-ओ-दिल में बे-फ़िक्री थी परछाई ने खाल उतारी थी आसेबों ने बाल सँवारे थे बिस्तर पे भी चाँद सितारे थे दुनिया भर के नज़ारे थे अपने पहलू में ख़्वाब थे और वो भी बे-हिसाब थे इक सिगरेट के बुझने तक इक छिपकली के करवट लेने तक
khamakhaah
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" चमड़े की बेल्ट " जी सर आप को क्या चाहिए बताओ मुझ को ऐसी भैंस की चमड़े की बेल्ट चाहिए जिस की पीठ में धूप फिसल के मानो ऐसा रंग खिलाती थी जैसे कि चाँदनी रंग-ए-शब चूम रही हो जिस की पूँछ हमेशा मटकती चटकती थी गाती थी नाचती थी पैहम मौज-ए-हवा की सोहबत में जिस की इक दुश्मन थी कम्बख़्त एक चिड़िया जो हरदम करवट मार के पीठ में बैठी रहती थी जो भैंस अपनी सींगो में से रगड़-रगड़ के धूल उड़ाती थी जो इतनी बेग़ैरत थी नाज़ुक-ओ-कमसिन से सुर्ख़ हाथ के मानिंद हर किसी को अपना थन छूने देती थी जिस के ऊपर बच्चे चढ़के यम हूँ मैं यम हूँ मैं कहते रहते थे जो दिन-भर मुँह से ग़ुब्बारे बनाती थी जो पानी के चार घड़े पी जाती थी जो पूरी रात रोज़ दूध बनाती थी बता किसी ऐसी भैंस का तिरे पास चमड़े की बेल्ट है क्या दुकान पर ऐसी बेल्ट तो कब की हाथों हाथ बिक चुकी है सॉरी सर सारी ख़त्म हो चुकी हैं
khamakhaah
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