nazmKuch Alfaaz

" चमड़े की बेल्ट " जी सर आप को क्या चाहिए बताओ मुझ को ऐसी भैंस की चमड़े की बेल्ट चाहिए जिस की पीठ में धूप फिसल के मानो ऐसा रंग खिलाती थी जैसे कि चाँदनी रंग-ए-शब चूम रही हो जिस की पूँछ हमेशा मटकती चटकती थी गाती थी नाचती थी पैहम मौज-ए-हवा की सोहबत में जिस की इक दुश्मन थी कम्बख़्त एक चिड़िया जो हरदम करवट मार के पीठ में बैठी रहती थी जो भैंस अपनी सींगो में से रगड़-रगड़ के धूल उड़ाती थी जो इतनी बेग़ैरत थी नाज़ुक-ओ-कमसिन से सुर्ख़ हाथ के मानिंद हर किसी को अपना थन छूने देती थी जिस के ऊपर बच्चे चढ़के यम हूँ मैं यम हूँ मैं कहते रहते थे जो दिन-भर मुँह से ग़ुब्बारे बनाती थी जो पानी के चार घड़े पी जाती थी जो पूरी रात रोज़ दूध बनाती थी बता किसी ऐसी भैंस का तिरे पास चमड़े की बेल्ट है क्या दुकान पर ऐसी बेल्ट तो कब की हाथों हाथ बिक चुकी है सॉरी सर सारी ख़त्म हो चुकी हैं

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”

Zubair Ali Tabish

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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अंदाज़ा गूँजा है पस-ए-अब्र ये नाला-ओ-फ़ुग़ाँ-ए-बिस्मिल चूम रही है सीना-ओ-पा ये लब-ए-लाशा सी बाद-ए-सर्द फैल रहा है साया हरसू बहर-ए-अर्श चड़क उठ्ठी है नस नस या तो बारिश होने वाली है या तो आज क़यामत का दिन है

khamakhaah

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“सीढ़ी “ ज़ीस्त के सीने में वक़्त के ज़ीने में क़दम क़दम पे ढल रहा हूँ क़दम क़दम पे सड़ रहा हूँ यादों को याद करते करते फिर उलटे पाँव चढ़ रहा हूँ

khamakhaah

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बेख़ुदी आधी रात को फिर दीवारें मुझ सेे बोली थीं तस्वीरें मुस्कुराई थीं खिड़की आँखें खोली थी घड़ी ख़ामोशी ओढ़ी थी आईने में दरवाज़ा खुला था ज़ख़्मों से जुगनू निकला था ख़ून से ख़ुशबू फूटी थी चौखट पर चाँदी बिखरी थी ज़ेहन-ओ-दिल में बे-फ़िक्री थी परछाई ने खाल उतारी थी आसेबों ने बाल सँवारे थे बिस्तर पे भी चाँद सितारे थे दुनिया भर के नज़ारे थे अपने पहलू में ख़्वाब थे और वो भी बे-हिसाब थे इक सिगरेट के बुझने तक इक छिपकली के करवट लेने तक

khamakhaah

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"मा'ज़ूर" मेरी खिड़की हॉस्पिटल के जानिब खुलती है वो जो कि सरकारी है रोज़ मुझे इन बीमारों की बू आती है उन बीमारों की जो हयात के ख़ातिर अपने अपने नंबर की पर्ची पकड़े दिन भर लाइन में रहते है रेंगते रहते हैं कीड़ों के मानिंद बूढ़े, बच्चे और औरतें तो बीमारी में बे-पर कीड़ों से लगते हैं मैं इनको देख देख कर ख़ुश होता रहता हूँ हँसता रहता हूँ इन की हालत पर इन की उम्मीदों पर क्यूँँकि मैं तो पैदाइशी अपाहिज हूँ इस लिए मेरी हालत इनसे काफ़ी बेहतर है जब मुझ को एहसास-ए-लम्स नहीं है तो फिर बिखरने का भी कोई डर नहीं है जब कोई आशा ही नहीं है तो फिर निराशा ही नहीं है

khamakhaah

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" शॉर्टकट " हम क्यूँँ दौड़ लगाऍं दोस्त ये सब अपना काम नहीं है ये भाग-दौड़ फ़क़त ज़िंदगी की है दोस्त जिस की मंज़िल मौत है पर सब को मगर उरूज-ए-तरक़्क़ी नशात-ए-दहर की तलाश या दौलत-ओ-शोहरत का रोज़ बहाना देती रहती है दोस्त अगर पहुँचना ही है मंज़िल-ए-मौत तलक तो वक़्त के ऊबड़-खाबड़ रस्ते पे हम क्यूँँ दौड़ लगाऍं दोस्त हम क्यूँँ न आज ऐसा करें कि अब इस ज़िंदगी के तलवों के नीचे हम अपने टूटे ख़्वाब बिछा दें आतिश-ए-अफ़सुर्दगी-ए-दिल से हम क्यूँँ न मलाल की तेग़-ए-आहन निकाल के इस ज़िंदगी के सीने में घुसा दें इस सफ़र-ए-मौत के तवील रस्ते को हम शॉर्टकट बना दें

khamakhaah

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