ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही तुझ को इस वादी-ए-रंगीं से अक़ीदत ही सही मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मअ'नी सब्त जिस राह में हों सतवत-ए-शाही के निशाँ उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मअ'नी मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तश्हीर-ए-वफ़ा तू ने सतवत के निशानों को तो देखा होता मुर्दा-शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली अपने तारीक मकानों को तो देखा होता अन-गिनत लोगों ने दुनिया में मोहब्बत की है कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उन के लेकिन उन के लिए तश्हीर का सामान नहीं क्यूँँकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़्लिस थे ये इमारात ओ मक़ाबिर ये फ़सीलें ये हिसार मुतलक़-उल-हुक्म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूँ सीना-ए-दहर के नासूर हैं कोहना नासूर जज़्ब है उन में तिरे और मिरे अज्दाद का ख़ूँ मेरी महबूब उन्हें भी तो मोहब्बत होगी जिन की सन्नाई ने बख़्शी है उसे शक्ल-ए-जमील उन के प्यारों के मक़ाबिर रहे बेनाम-ओ-नुमूद आज तक उन पे जलाई न किसी ने क़िंदील ये चमन-ज़ार ये जमुना का किनारा ये महल ये मुनक़्क़श दर ओ दीवार ये मेहराब ये ताक़ इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़ मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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"वो सुब्ह कभी तो आएगी" 1 वो सुब्ह कभी तो आएगी इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगा जब अंबर झूम के नाचेगा जब धरती नग़्में गाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी जिस सुब्ह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर कर जीते हैं जिस सुब्ह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहीं इंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तौली जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा चाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगा अपने काले करतूतों पर जब ये दुनिया शरमाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूख के और बेकारी के टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारा-दारी के जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फाँकेगा मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगा हक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी फ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इंसाँ न जलाए जाएँगे सीनों के दहकते दोज़ख़ में अरमाँ न जलाए जाएँगे ये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बनाई जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी 2 वो सुब्ह हमीं से आएगी जब धरती करवट बदलेगी जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे जब पाप घरौंदे फूटेंगे जब ज़ुल्म के बंधन टूटेंगे उस सुब्ह को हम ही लाएँगे वो सुब्ह हमीं से आएगी वो सुब्ह हमीं से आएगी मनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म न पाले जाएँगे जब हाथ न काटे जाएँगे जब सर न उछाले जाएँगे जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगी वो सुब्ह हमीं से आएगी संसार के सारे मेहनत-कश खेतों से मिलों से निकलेंगे बे-घर बे-दर बे-बस इंसाँ तारीक बिलों से निकलेंगे दुनिया अम्न और ख़ुश-हाली के फूलों से सजाई जाएगी वो सुब्ह हमीं से आएगी
Sahir Ludhianvi
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ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के ये लुटते हुए कारवां ज़िन्दगी के कहाँ हैं, कहाँ है, मुहाफ़िज़ ख़ुदी के जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ये पुरपेच गलियाँ, ये बदनाम बाज़ार ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झन्कार ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ये सदियों से बेख्वाब, सहमी सी गलियाँ ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियाँ ये बिकती हुई खोखली रंग-रलियां जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं वो उजले दरीचों में पायल की छन-छन थकी-हारी साँसों पे तबले की धन-धन ये बेरूह कमरों में खांसी की ठन-ठन जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख फ़िकरे ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं यहाँ पीर भी आ चुके हैं, जवां भी तनोमंद बेटे भी, अब्बा, मियाँ भी ये बीवी भी है और बहन भी है, मां भी जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी पयम्बर की उम्मत, ज़ुलयखां की बेटी जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ ये कुचे, ये गलियाँ, ये मंज़र दिखाओ जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उन को लाओ जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
Sahir Ludhianvi
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हिरास तेरे होंटों पे तबस्सुम की वो हल्की सी लकीर मेरे तख़्य्युल में रह रह के झलक उठती है यूँ अचानक तिरे आरिज़ का ख़याल आता है जैसे ज़ुल्मत में कोई शमां भड़क उठती है तेरे पैराहन-ए-रंगीं की जुनूं-ख़ेज़ महक ख़्वाब बन बन के मिरे ज़ेहन में लहराती है रात की सर्द ख़मोशी में हर इक झोंके से तेरे अन्फ़ास तिरे जिस्म की आँच आती है मैं सुलगते हुए राज़ों को अयां तो कर दूँ लेकिन उन राज़ों की तशहीर से जी डरता है रात के ख़्वाब उजाले में बयाँ तो कर दूँ उन हसीं ख़्वाबों की ता'बीर से जी डरता है तेरी साँसों की थकन तेरी निगाहों का सुकूत दर-हक़ीक़त कोई रंगीन शरारत ही न हो मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँ वो तबस्सुम वो तकल्लुम तिरी आदत ही न हो सोचता हूँ कि तुझे मिल के मैं जिस सोच में हूँ पहले उस सोच का मक़्सूम समझ लूँ तो कहूँ मैं तिरे शहर में अंजान हूँ परदेसी हूँ तेरे अल्ताफ़ का मफ़्हूम समझ लूँ तो कहूँ कहीं ऐसा न हो पाँव मिरे थर्रा जाएँ और तिरी मरमरीं बाँहों का सहारा न मिले अश्क बहते रहें ख़ामोश सियह रातों में और तिरे रेशमी आंचल का किनारा न मिले
Sahir Ludhianvi
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साथियो! मैं ने बरसों तुम्हारे लिए चाँद तारों बहारों के सपने बुने हुस्न और इश्क़ के गीत गाता रहा आरज़ूओं के ऐवाँ सजाता रहा मैं तुम्हारा मुग़न्नी तुम्हारे लिए जब भी आया नए गीत लाता रहा आज लेकिन मिरे दामन-ए-चाक में गर्द-ए-राह-ए-सफ़र के सिवा कुछ नहीं मेरे बरबत के सीने में नग़्मों का दम घुट गया तानें चीख़ों के अम्बार में दब गई हैं और गीतों के सुर हिचकियाँ बन गए हैं मैं तुम्हारा मुग़न्नी हूँ नग़्मा नहीं हूँ और नग़्में की तख़्लीक़ का साज़-ओ-सामाँ साथियो! आज तुम ने भस्म कर दिया है और मैं अपना टूटा हुआ साज़ था में सर्द लाशों के अम्बार को तक रहा हूँ मेरे चारों तरफ़ मौत की वहशतें नाचती हैं और इंसाँ की हैवानियत जाग उठी है बरबरियत के ख़ूँ-ख़ार इफ़रीत अपने नापाक जबड़ों को खोले ख़ून पी पी के ग़ुर्रा रहे हैं बच्चे माँओं की गोदों में सह में हुए हैं इस्मतें सर-बरहना परेशान हैं हर तरफ़ शोर-ए-आह-ओ-बुका है और मैं इस तबाही के तूफ़ान में आग और ख़ूँ के हैजान में सर-निगूँ और शिकस्ता मकानों के मलबे से पुर रास्तों पर अपने नग़्मों की झोली पसारे दर-ब-दर फिर रहा हूँ मुझ को अम्न और तहज़ीब की भीक दो मेरे गीतों की लय मेरा सुर मेरी नय मेरे मजरूह होंटों को फिर सौंप दो साथियो! मैं ने बरसों तुम्हारे लिए इंक़लाब और बग़ावत के नग़्में अलापे अजनबी राज के ज़ुल्म की छाँव में सरफ़रोशी के ख़्वाबीदा जज़्बे उभारे और उस सुब्ह की राह देखी जिस में इस मुल्क की रूह आज़ाद हो आज ज़ंजीर-ए-महकूमियत कट चुकी है और इस मुल्क के बहर-ओ-बर बाम-ओ-दर अजनबी क़ौम के ज़ुल्मत-अफ़्शाँ फरेरे की मनहूस छाँव से आज़ाद हैं खेत सोना उगलने को बेचैन हैं वादियाँ लहलहाने को बेताब हैं कोहसारों के सीने में हैजान है संग और ख़िश्त बे-ख़्वाब व बेदार हैं उन की आँखों में तामीर के ख़्वाब हैं उन के ख़्वाबों को तकमील का रूप दो मुल्क की वादियाँ घाटियाँ खेतियाँ औरतें बच्चियां हाथ फैलाए ख़ैरात की मुंतज़िर हैं इन को अम्न और तहज़ीब की भीक दो माँओं को उन के होंटों की शादाबियाँ नन्हे बच्चों को उन की ख़ुशी बख़्श दो मुल्क की रूह को ज़िंदगी बख़्श दो मुझ को मेरा हुनर मेरी लय बख़्श दो आज सारी फ़ज़ा है भिकारी और मैं इस भिकारी फ़ज़ा में अपने नग़्मों की झोली पसारे दर-ब-दर फिर रहा हूँ मुझ को फिर मेरा खोया हुआ साज़ दो मैं तुम्हारा मुग़न्नी तुम्हारे लिए जब भी आया नए गीत लाता रहूँगा
Sahir Ludhianvi
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मेरे ख़्वाबों के झरोकों को सजाने वाली तेरे ख़्वाबों में कहीं मेरा गुज़र है कि नहीं पूछ कर अपनी निगाहों से बता दे मुझ को मेरी रातों के मुक़द्दर में सहर है कि नहीं चार दिन की ये रिफ़ाक़त जो रिफ़ाक़त भी नहीं उम्र भर के लिए आज़ार हुई जाती है ज़िंदगी यूँ तो हमेशा से परेशान सी थी अब तो हर साँस गिरां-बार हुई जाती है मेरी उजड़ी हुई नींदों के शबिस्तानों में तू किसी ख़्वाब के पैकर की तरह आई है कभी अपनी सी कभी ग़ैर नज़र आई है कभी इख़्लास की मूरत कभी हरजाई है प्यार पर बस तो नहीं है मिरा लेकिन फिर भी तू बता दे कि तुझे प्यार करूँं या न करूँं तू ने ख़ुद अपने तबस्सुम से जगाया है जिन्हें उन तमन्नाओं का इज़हार करूँं या न करूँं तू किसी और के दामन की कली है लेकिन मेरी रातें तिरी ख़ुश्बू से बसी रहती हैं तू कहीं भी हो तिरे फूल से आरिज़ की क़सम तेरी पलकें मिरी आँखों पे झुकी रहती हैं तेरे हाथों की हरारत तिरे साँसों की महक तैरती रहती है एहसास की पहनाई में ढूंढ़ती रहती हैं तख़्ईल की बांहें तुझ को सर्द रातों की सुलगती हुई तन्हाई में तेरा अल्ताफ़-ओ- करम एक हक़ीक़त है मगर ये हक़ीक़त भी हक़ीक़त में फ़साना ही न हो तेरी मानूस निगाहों का ये मोहतात पयाम दिल के ख़ूँ करने का एक और बहाना ही न हो कौन जाने मिरे इमरोज़ का फ़र्दा क्या है क़ुर्बतें बढ़ के पशेमान भी हो जाती हैं दिल के दामन से लिपटती हुई रंगीं नज़रें देखते देखते अंजान भी हो जाती हैं मेरी दरमांदा जवानी की तमन्नाओं के मुज़्महिल ख़्वाब की ता'बीर बता दे मुझ को मेरा हासिल मेरी तक़दीर बता दे मुझ को
Sahir Ludhianvi
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