मुसाफ़िर हुए फिर इक अंधे सफ़र के पता तय-शुदा मौसमों का कहीं खो गया है बड़े शहर के इक क्लब में दीवाली मनाते हुए कल किसी ने कहा था सिनेमा के पर्दे कई तीज त्यौहार मेले समेटे हुए हैं तुम्हें फ़िक्र कैसी ये क्यूँँ रंग चेहरे का फीका पड़ा है तुम्हीं सुस्त क़दमों पे नादिम हुए थे तुम्हीं को हवस थी कि रफ़्तार क़ाबू में कर लें ख़लाएँ खंगालें गए मौसमों का जनाज़ा उठाए कहाँ जा रहे हो कोई इब्न-ए-मरयम न हाथ आ सकेगा चलो उस को मिट्टी के नीचे दबा दें यही आने वालों के हक़ में मुनासिब रहेगा
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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दयार-ए-ख़्वाब के उधर मुसाफ़िरों की बस्तियाँ नशीली काली बदलियाँ शराबियों की टोलियाँ नशा बढ़ाती धानी धानी चुनरियाँ महकते कुँवारे जिस्म चिलमनों की तीलियाँ सजीली रेशमी परों में रंग-बिरंगी तितलियाँ पकी पकाई औरतों में शहवतों की बिजलियाँ ज़रा सी रात भीग जाए, फिर सुनो अंधेरे की ज़बाँ थके थकाए जिस्म हाँफती लटकती छातियाँ शफ़ीक़ आँखें माँओं की रहीम लोरियाँ ख़िज़ाँ लुटाती कहकशाँ, धुआँ उगलती चिमनियाँ धड़कते दिल, निढाल जिस्म, धूप के मकाँ सुनहरे सुर्ख़ पैरहन भिगोती शहर-ज़ादियाँ गदेले गंदे पोखरों में तैरती हैं मछलियाँ न जाने किस गुनाह की सज़ा में बहती नदियाँ ज़रा सी रात भीग जाए, फिर सुनो अंधेरे की ज़बाँ दयार-ए-ख़्वाब के उधर मुसाफ़िरों की बस्तियाँ
Aashufta Changezi
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फिर इक जम्म-ए-ग़फ़ीर एक मैदान में आसमाँ की तरफ़ देर से तक रहा है! इमरा-उल-क़ैस की बेटियाँ शा'इरी की ज़बाँ फिर समझने लगीं लपलपाती ज़बानें ख़िताबत का जादू जगाने लगीं वो ख़ुदा-ज़ादियाँ मुस्कुराने लगीं और मेलों में फिर भीड़ बढ़ने लगी कोई मिम्बर से बोला कि ऐ मेरे प्यारो! तुम्हें अपने अगलों की 'उम्रें लगें बाज़ आओ सफ़र से कुछ आराम लो क़ाफ़िलों की मधुर घंटियाँ रेत के सिलसिले उस की देंगे गवाही तुम्हें हम ने पहले कहा था घरों में रहो तुम न माने तो उस की सज़ा पा चुके बाज़ आओ अभी वक़्त है बे-कराँ नीली नीली ख़ला फिर न मसहूर कर दे तुम्हें
Aashufta Changezi
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डाइरी के ये सादा वरक़ और क़लम छीन लो आईनों की दुकानों में सब अपने चेहरे लिए इक बरहना तबस्सुम के मोहताज हैं सर्द बाज़ार में एक भी चाहने वाला ऐसा नहीं जो उन्हें ज़िंदगी का सबब बख़्श दे धुँद से जगमगाते हुए शहर की बत्तियाँ सज्दा करती हुई कहकशाँ ख़ूब-सूरत ख़ुदाओं की फिरती हुई टोलियाँ ऐसा लगता है सब एक मुद्दत से परछाइयों को पकड़ने में मसरूफ़ हैं!!!
Aashufta Changezi
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नुज़ूल-ए-इताब की घड़ी नज़दीक है…… दरबारी कुत्ते! रू-पोश बाग़ियों की तलाश में ज़मीनें सूँघते फिर रहे हैं सरबराहों की क़ुव्वत-ए-फ़ैसला जवाब दे चुकी है उन के मफ़्लूज हाथ दरबारियों के रचाए षड़यंत्रों पर क्यूँँ दस्तख़त करने की मशीनें हैं उन की ज़बानें सिर्फ़ धमकियाँ बोलती हैं उन के अना-परस्त कान गिड़गिढ़ाहटें सुनने के आदी हो चुके हैं मुशीरों और सलाह-कारों का दावा है कि वो जल्द ही सरबराहों को दस्त-ख़तों की ज़हमत से भी नजात दिलाने का रास्ता ढूँड निकालेंगे!
Aashufta Changezi
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ख़ुदा-ए-लम-यज़ल की बारगाह में सर-ब-सुजूद! अना की चौखटों में जुड़े चेहरों वाले लोग पेशानियों पर ग़ट्टे डालने में मसरूफ़ हैं आटे में सनी मुट्ठियाँ उन की बख़्शिश की ज़मानत हैं ये कौन सी जन्नत-ए-नईम है जिस का रास्ता चि यूँँटियों की बाँबी से हो कर गुज़रता है दरबानों और कुत्तों को खुली आज़ादी है 'जागते रहो' की सदाएँ इनायतों का ख़िराज वसूल करते नहीं थकती हैं सर्कस का पंडाल खचा-खच भरा है मेम्नों के बाड़े में सहमा-दुबका…घास खाता शे'र कैसा बे-ज़रर दिखाई देता है बौनों की उछल-कूद फ़लक-शगाफ़ क़हक़हे…मुसलसल क़हक़हे तालियों की गूँज! महल-सारा के बंद फाटक को छू कर लौट आती है बस्ती के जहाँ-दीदा बूढ़े फ़रियादी मातम करते पंडाल से रवाना हो जाते हैं
Aashufta Changezi
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