दयार-ए-ख़्वाब के उधर मुसाफ़िरों की बस्तियाँ नशीली काली बदलियाँ शराबियों की टोलियाँ नशा बढ़ाती धानी धानी चुनरियाँ महकते कुँवारे जिस्म चिलमनों की तीलियाँ सजीली रेशमी परों में रंग-बिरंगी तितलियाँ पकी पकाई औरतों में शहवतों की बिजलियाँ ज़रा सी रात भीग जाए, फिर सुनो अंधेरे की ज़बाँ थके थकाए जिस्म हाँफती लटकती छातियाँ शफ़ीक़ आँखें माँओं की रहीम लोरियाँ ख़िज़ाँ लुटाती कहकशाँ, धुआँ उगलती चिमनियाँ धड़कते दिल, निढाल जिस्म, धूप के मकाँ सुनहरे सुर्ख़ पैरहन भिगोती शहर-ज़ादियाँ गदेले गंदे पोखरों में तैरती हैं मछलियाँ न जाने किस गुनाह की सज़ा में बहती नदियाँ ज़रा सी रात भीग जाए, फिर सुनो अंधेरे की ज़बाँ दयार-ए-ख़्वाब के उधर मुसाफ़िरों की बस्तियाँ
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"मज़हबी जंग" उधर मज़हबी जंग का शोर है ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर है टूटी इमारत दुकानें सभी है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर कहीं चीख़ ने की सदा है कहीं ख़ामुशी का है आलम कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई हैं तलवार हाथों में पकड़े कई सितमगर बढ़ाते बग़ावत न दैर-ओ-हरम है सलामत ज़मीं पर है उतरी क़यामत है बिगड़े से हालात अब शहर में हुई हैं मियाँ कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की समुंदर लबा-लब है लाशों से ही न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है ये उठता धुआँ और जलता मकाँ बताते हैं नफ़रत का ये दौर है
MAHESH CHAUHAN NARNAULI
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"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र
ZafarAli Memon
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सावन आया उन के घर, मेरे भी घर उन के आंगन में मँडरायीं खूब घटायें काली काली, उन के ऑँगन के गमलों में विखर गई सुंदर हरियाली, नूतन किसलय फूट पडे हैं झूम रही है डाली डाली, कुछ भी हो उन के आँगन की सुन्दरता है बहुत निराली। उन के घर कोने कोने में उमडा है ख़ुशियों का सागर..। सावन आया............ मेरे घर की बूढी छत ने अपनी जर्जरता दिखलाई, कमरे में पानी भर आया आँगन में पसरी है काई, छोटू बिट्टू मुन्नू मिट्ठू ने अपनी कश्ती तैराई, वो भी ख़ुश हैं मैं भी ख़ुश हूँ सावन तुझ को लाख बधाई। उन का सावन भी सुंदर है मेरा सावन उन सेे सुन्दर। सावन आया उन के घर, मेरे भी घर
Gyan Prakash Akul
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"नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ" नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ मिरी जान हो तुम मिरे पास आओ नहीं दूर से देख कर मुस्कुराओ मिरी जाँ मोहब्बत में क्या शर्म करना ग़लत कुछ नहीं है मोहब्बत में आओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ मोहब्बत को मेरी न हल्के में लेना मैं पहुँचा हुआ आदमी हूँ समीना बहादुर हूँ बंदा किसी से न डरता मुझे जो भी कहना है मुँह पर ही कहता सुनाना है जो कुछ भी जल्दी सुनाओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ मिरी बात का मत बुरा मान जाना मैं ऐसा ही हूँ यार पागल दिवाना इधर देखो बातों पे मेरी न जाना समझदार हो तुम मैं पागल दिवाना मिरी जान हो तुम मिरे पास आओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ अगर आह भर के मुझे देखना हो अगर फूल ऊपर मिरे फेंकना हो घुमाकर नज़र हर तरफ़ देख लेना कहीं कोई है तो नहीं पास हमदम अगर पास हो कोई रुक जाना हमदम मिरी जान तुम काम दिल से ही लेना न तुम चुपके चुपके मिरे पास आना कोई चीज़ मेरे लिए तुम न लाना अगर देख लेगा कोई क्या कहेगा वो बदनाम सारे जहाँ में करेगा मोहब्बत है मुझ सेे तो मुझ को बताओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ जिधर बैठता मैं उधर बैठते हो हमेशा मिरी ही तरफ़ देखते हो समझदार हो यार समझा करो तुम मुझे देर तक यूँँ न देखा करो तुम अकेले मिलूँ तब ही बोला करो तुम कोई सामने हो तो बन जाओ अंजान फिर ऐसे रहो जैसे हो मेरे मेहमान करो काम सारे नज़र में मत आओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ तुम ऐसे में निकलो न लूँ चल रही है हवा भी कई रंग में ढल रही है बहुत तेज़ गर्मी इधर बैठ जाओ लो पानी पियो और फिर मुस्कुराओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ
Prashant Kumar
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मुसाफ़िर हुए फिर इक अंधे सफ़र के पता तय-शुदा मौसमों का कहीं खो गया है बड़े शहर के इक क्लब में दीवाली मनाते हुए कल किसी ने कहा था सिनेमा के पर्दे कई तीज त्यौहार मेले समेटे हुए हैं तुम्हें फ़िक्र कैसी ये क्यूँँ रंग चेहरे का फीका पड़ा है तुम्हीं सुस्त क़दमों पे नादिम हुए थे तुम्हीं को हवस थी कि रफ़्तार क़ाबू में कर लें ख़लाएँ खंगालें गए मौसमों का जनाज़ा उठाए कहाँ जा रहे हो कोई इब्न-ए-मरयम न हाथ आ सकेगा चलो उस को मिट्टी के नीचे दबा दें यही आने वालों के हक़ में मुनासिब रहेगा
Aashufta Changezi
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फिर इक जम्म-ए-ग़फ़ीर एक मैदान में आसमाँ की तरफ़ देर से तक रहा है! इमरा-उल-क़ैस की बेटियाँ शा'इरी की ज़बाँ फिर समझने लगीं लपलपाती ज़बानें ख़िताबत का जादू जगाने लगीं वो ख़ुदा-ज़ादियाँ मुस्कुराने लगीं और मेलों में फिर भीड़ बढ़ने लगी कोई मिम्बर से बोला कि ऐ मेरे प्यारो! तुम्हें अपने अगलों की 'उम्रें लगें बाज़ आओ सफ़र से कुछ आराम लो क़ाफ़िलों की मधुर घंटियाँ रेत के सिलसिले उस की देंगे गवाही तुम्हें हम ने पहले कहा था घरों में रहो तुम न माने तो उस की सज़ा पा चुके बाज़ आओ अभी वक़्त है बे-कराँ नीली नीली ख़ला फिर न मसहूर कर दे तुम्हें
Aashufta Changezi
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ख़ुदा-ए-लम-यज़ल की बारगाह में सर-ब-सुजूद! अना की चौखटों में जुड़े चेहरों वाले लोग पेशानियों पर ग़ट्टे डालने में मसरूफ़ हैं आटे में सनी मुट्ठियाँ उन की बख़्शिश की ज़मानत हैं ये कौन सी जन्नत-ए-नईम है जिस का रास्ता चि यूँँटियों की बाँबी से हो कर गुज़रता है दरबानों और कुत्तों को खुली आज़ादी है 'जागते रहो' की सदाएँ इनायतों का ख़िराज वसूल करते नहीं थकती हैं सर्कस का पंडाल खचा-खच भरा है मेम्नों के बाड़े में सहमा-दुबका…घास खाता शे'र कैसा बे-ज़रर दिखाई देता है बौनों की उछल-कूद फ़लक-शगाफ़ क़हक़हे…मुसलसल क़हक़हे तालियों की गूँज! महल-सारा के बंद फाटक को छू कर लौट आती है बस्ती के जहाँ-दीदा बूढ़े फ़रियादी मातम करते पंडाल से रवाना हो जाते हैं
Aashufta Changezi
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नुज़ूल-ए-इताब की घड़ी नज़दीक है…… दरबारी कुत्ते! रू-पोश बाग़ियों की तलाश में ज़मीनें सूँघते फिर रहे हैं सरबराहों की क़ुव्वत-ए-फ़ैसला जवाब दे चुकी है उन के मफ़्लूज हाथ दरबारियों के रचाए षड़यंत्रों पर क्यूँँ दस्तख़त करने की मशीनें हैं उन की ज़बानें सिर्फ़ धमकियाँ बोलती हैं उन के अना-परस्त कान गिड़गिढ़ाहटें सुनने के आदी हो चुके हैं मुशीरों और सलाह-कारों का दावा है कि वो जल्द ही सरबराहों को दस्त-ख़तों की ज़हमत से भी नजात दिलाने का रास्ता ढूँड निकालेंगे!
Aashufta Changezi
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शंकर डमरू का मुतबादिल तलाश कर चुका गोपियाँ अब किसी ऊधौ की मुहताज नहीं ट्रंक कॉल उन की समस्याओं का हल है इज़राईल! एटम और हेलियम के हक़ में दस्त-बरदार होने की फ़िक्र में है इस्राफ़ील की जमालियाती हिस को जिला मिल गई अब वो किसी म्यूज़िक-स्कूल में दाख़िला ले लेगा फ़ूड-कॉरपोरेशन का मुतालबा: 'मीकाईल का रिटायर मेंट' मान लिया गया है वायरलेस-टेलिग्राफी का मोहकमा अफ़सर-ए-आला के ओहदे के लिए जिबरईल की दरख़्वास्त पर ग़ौर कर रहा है 'ख़ुदा की जगह ख़ाली है' मुतमन्नी हज़रात फ़ौरन से पेश-तर दरख़्वास्त दें!
Aashufta Changezi
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