डाइरी के ये सादा वरक़ और क़लम छीन लो आईनों की दुकानों में सब अपने चेहरे लिए इक बरहना तबस्सुम के मोहताज हैं सर्द बाज़ार में एक भी चाहने वाला ऐसा नहीं जो उन्हें ज़िंदगी का सबब बख़्श दे धुँद से जगमगाते हुए शहर की बत्तियाँ सज्दा करती हुई कहकशाँ ख़ूब-सूरत ख़ुदाओं की फिरती हुई टोलियाँ ऐसा लगता है सब एक मुद्दत से परछाइयों को पकड़ने में मसरूफ़ हैं!!!
Related Nazm
"तेरी याद है" मैं हूँ ये काली अँधेरी रात है तन्हाई है और तेरी याद है मेरे हाथ में क़लम है पास में रखा एक गिलास है जो शराब से भरा है तुझे याद किए जा रहा हूँ शराब पीते हुए नज़्म लिखते जा रहा हूँ सुनो मेरे लिखे नज़्म तो पढ़ोगी ना ख़्वाबों में मुलाक़ात तो करोगी ना प्यार से न सही, नफ़रत से ही मुझे याद तो करोगी ना जब याद आए मेरी तो ये भी ख़याल करना मैं तेरी आवाज़ सुनने को परेशान रहता हूँ मैं तुझे एक बार देखना चाहता हूँ मैं चाहता हूँ कि तू फिर से मेरे सर पे हाथ फेरे मैं ये भी चाहता हूँ कि तू फिर से आए मेरे पास और आ कर फिर कभी न जाए पर ऐसा तो हो ही नहीं सकता ऐसा होना तो नामुम्किन है
Rovej sheikh
10 likes
"तुम अकेली नहीं हो सहेली" तुम अकेली नहीं हो सहेली जिसे अपने वीरान घर को सजाना था और एक शाइ'र के लफ़्ज़ों को सच मान कर उस की पूजा में दिन काटने थे तुम से पहले भी ऐसा ही एक ख़्वाब झूठी तस्सली में जाँ दे चुका है तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो तुम से पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है वो तो शाइ'र है और साफ़ ज़ाहिर है, शाइ'र हवा की हथेली पे लिखी हुई वो पहेली है जिस ने अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है वो तो शाइ'र है, शाइ'र तमन्ना के सेहरा में रम करने वाला हिरन है शोब्दा शास सुब्हो की पहली किरन है, अदब गाहे उलफ़त का मेमार है और ख़ुद अपने ख़्वाबों का ग़द्दार है वो तो शाइ'र है, शाइ'र को बस फ़िक्र लोह क़लम है, उसे कोई दुख है किसी का न ग़म है, वो तो शाइ'र है, शाइ'र को क्या ख़ौफ़ मरने से? शाइ'र तो ख़ुद शाह सवार-ए-अज़ल है, उसे किस तरह टाल सकता है कोई कि वो तो अटल है, मैं उसे जानती हूँ सहेली, वो समुंदर की वो लहर है जो किनारो से वापस पलटते हुए मेरी खुरदरी एड़ियों पे लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुयी शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया उस ने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़् में क़सीदी जिन्हें पढ़के मैं काँप उठती हूँ और सोचती हूँ कि ये मसला दिलबरी का नहीं ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ, वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं सहेली मेरी बात मानो, तुम उसे जानती ही नहीं, वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई, उसी की ही एक नज़्म
Tehzeeb Hafi
41 likes
“है एक ऐसी भी लड़की” वो इश्क़ है वो वफ़ा है वो आयत है, इबादत है वो दुआ है, वो आमीन है वो सच है, वो यक़ीन है वो मेरी धूप है, छाँव है आसमाँ है, ज़मीन है है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है वो थोड़ी सी पागल है थोड़ी थोड़ी ज़हीन है, उस की हरकतों में अल्हड़पन, जिस का नक़्श आ'ला जिस का चर्बा हसीन है, हर भौंरा दिवाना उस का जो बर्ग-ए-गुल पे नशीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है। वो इस क़दर माहेरीन है वही मेरी दामन भी है वही मेरी आस्तीन है, वो इमली सी खट्टी है शहद सी मीठी है, कभी वो चटपटी सी कभी वो नमकीन है, वो एक उम्दा परवाज़ है एक आ'ला शाहीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है। वो मेरी दुनिया है, जहान है मेरी पगड़ी है, ज़बीन है, मेरा क़लमा है, ईमान है वो एक तशरीह-ए-दीन है, वो बर्ग-ए-गुल है, काँटा है वो मतीन है, वो महीन है, वो नील-कँवल है, गुलाब है, एक गुलदस्ता रंगीन है, मैं अब क्या क्या लिखूँ सर से पाँव तक वो हसीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है।
Shivang Tiwari
5 likes
'फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है' फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है ख़्वाब सारे टूट कर कहीं सिफ़र जाने को हैं घोंसला वहम-ओ-गुमान का फिर से उजड़ जाने को है ज़ख़्म वो पुराने फिर निखर आने को हैं सारा जहाँ मानो गहरी नींद में सो गया है ये मन मेरा फिर उन हसीं यादों में खो गया है क़लम जैसे फिर कोई नज़्म लिखने की ज़िद पे अड़ी है शरीफ़ दिल की ये आदत आज भी बहुत बुरी है आँखों से नींद फिर गुम सी गई है सीने में धड़कन जैसे थम सी गई है ये चंचल हवाऍं ये गुम सुम घटाऍं मुझे ख़ुद से कहीं दूर ले जा रही हैं वो सुनसान सड़कें वो वीरान गलियाँ मुझे फिर से अपने पास बुला रही हैं हरेक परवाने को जैसे बस शमा' की तलाश है लहरों के मन में भी कोई अधूरी सी प्यास है सितारे अब चमक चमक कर थक से गए हैं पत्ते भी पूरी तरह शबनम से लिपट गए हैं वक़्त जैसे रेत की तरह फिसल रहा है चाँद तेजी से फ़लक की ओर बढ़ रहा है ये सुकून-ए-अँधेरा फिर से उतर जाने को है ये ख़ूब-सूरत नज़ारे फिर से बिखर जाने को हैं फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है
Rehaan
4 likes
"अपनी कहानी" मैं अपनी कहानी क़लमबंद करने की कोशिश तो करता रहा हूँ मगर मेरा माज़ी तो नाकामियों के अँधेरों से उजड़ा हुआ है नहीं याद मुझ को कि उम्र-ए-गुज़िश्ता के इक मरहले में हयात-ए-रवां से रक़ीब-ए-अमाँ से भी वहम-ओ-गुमाँ में कभी जीत पाया मैं लिखने को लिख दूँ कि मैं ने ज़माने से जो कुछ भी चाहा नहीं मिल सका कँवल मेरे ख़्वाबों का हक़ीक़त की बंजर ज़मीनो पे हरगिज़ नहीं खिल सका मैं लड़ता रहा पर हमेशा कि मैं ने कभी भी सर-ए-तस्लीम-ए-ख़म ना किया मैं टूटा मैं बिखरा मैं हारा मगर हौसला फिर भी कम ना किया मैं फिर से चला हूँ सवा लाख कोशिश को एक रंग देने मैं लिखने को लिख दूँ मगर ये कहानी भी पढ़नी है किस ने सभी को तो दुनिया में सक्सेस का नुस्ख़ा ही लाहक रहा है जो हारा नालायक़ जो जीता हमेशा वही तो ज़माने की असली कसौटी पे लायक़ रहा है मेरे फ़ेलियर के तजरबात मुझ को बताने लगे हैं कि मेरी कहानी अधूरी है अबतक इसे दरकिनार है सक्सेस की दस्तक वो सक्सेस जो बहरो के कानों में चीख़े चिल्लाए उन्हे ये बताए कि चलने से पहले कई मर्तबा तुम को गिरना पड़ेगा
Salman Yusuf
2 likes
More from Aashufta Changezi
मुसाफ़िर हुए फिर इक अंधे सफ़र के पता तय-शुदा मौसमों का कहीं खो गया है बड़े शहर के इक क्लब में दीवाली मनाते हुए कल किसी ने कहा था सिनेमा के पर्दे कई तीज त्यौहार मेले समेटे हुए हैं तुम्हें फ़िक्र कैसी ये क्यूँँ रंग चेहरे का फीका पड़ा है तुम्हीं सुस्त क़दमों पे नादिम हुए थे तुम्हीं को हवस थी कि रफ़्तार क़ाबू में कर लें ख़लाएँ खंगालें गए मौसमों का जनाज़ा उठाए कहाँ जा रहे हो कोई इब्न-ए-मरयम न हाथ आ सकेगा चलो उस को मिट्टी के नीचे दबा दें यही आने वालों के हक़ में मुनासिब रहेगा
Aashufta Changezi
0 likes
दयार-ए-ख़्वाब के उधर मुसाफ़िरों की बस्तियाँ नशीली काली बदलियाँ शराबियों की टोलियाँ नशा बढ़ाती धानी धानी चुनरियाँ महकते कुँवारे जिस्म चिलमनों की तीलियाँ सजीली रेशमी परों में रंग-बिरंगी तितलियाँ पकी पकाई औरतों में शहवतों की बिजलियाँ ज़रा सी रात भीग जाए, फिर सुनो अंधेरे की ज़बाँ थके थकाए जिस्म हाँफती लटकती छातियाँ शफ़ीक़ आँखें माँओं की रहीम लोरियाँ ख़िज़ाँ लुटाती कहकशाँ, धुआँ उगलती चिमनियाँ धड़कते दिल, निढाल जिस्म, धूप के मकाँ सुनहरे सुर्ख़ पैरहन भिगोती शहर-ज़ादियाँ गदेले गंदे पोखरों में तैरती हैं मछलियाँ न जाने किस गुनाह की सज़ा में बहती नदियाँ ज़रा सी रात भीग जाए, फिर सुनो अंधेरे की ज़बाँ दयार-ए-ख़्वाब के उधर मुसाफ़िरों की बस्तियाँ
Aashufta Changezi
0 likes
फिर इक जम्म-ए-ग़फ़ीर एक मैदान में आसमाँ की तरफ़ देर से तक रहा है! इमरा-उल-क़ैस की बेटियाँ शा'इरी की ज़बाँ फिर समझने लगीं लपलपाती ज़बानें ख़िताबत का जादू जगाने लगीं वो ख़ुदा-ज़ादियाँ मुस्कुराने लगीं और मेलों में फिर भीड़ बढ़ने लगी कोई मिम्बर से बोला कि ऐ मेरे प्यारो! तुम्हें अपने अगलों की 'उम्रें लगें बाज़ आओ सफ़र से कुछ आराम लो क़ाफ़िलों की मधुर घंटियाँ रेत के सिलसिले उस की देंगे गवाही तुम्हें हम ने पहले कहा था घरों में रहो तुम न माने तो उस की सज़ा पा चुके बाज़ आओ अभी वक़्त है बे-कराँ नीली नीली ख़ला फिर न मसहूर कर दे तुम्हें
Aashufta Changezi
0 likes
ख़ुदा-ए-लम-यज़ल की बारगाह में सर-ब-सुजूद! अना की चौखटों में जुड़े चेहरों वाले लोग पेशानियों पर ग़ट्टे डालने में मसरूफ़ हैं आटे में सनी मुट्ठियाँ उन की बख़्शिश की ज़मानत हैं ये कौन सी जन्नत-ए-नईम है जिस का रास्ता चि यूँँटियों की बाँबी से हो कर गुज़रता है दरबानों और कुत्तों को खुली आज़ादी है 'जागते रहो' की सदाएँ इनायतों का ख़िराज वसूल करते नहीं थकती हैं सर्कस का पंडाल खचा-खच भरा है मेम्नों के बाड़े में सहमा-दुबका…घास खाता शे'र कैसा बे-ज़रर दिखाई देता है बौनों की उछल-कूद फ़लक-शगाफ़ क़हक़हे…मुसलसल क़हक़हे तालियों की गूँज! महल-सारा के बंद फाटक को छू कर लौट आती है बस्ती के जहाँ-दीदा बूढ़े फ़रियादी मातम करते पंडाल से रवाना हो जाते हैं
Aashufta Changezi
0 likes
नुज़ूल-ए-इताब की घड़ी नज़दीक है…… दरबारी कुत्ते! रू-पोश बाग़ियों की तलाश में ज़मीनें सूँघते फिर रहे हैं सरबराहों की क़ुव्वत-ए-फ़ैसला जवाब दे चुकी है उन के मफ़्लूज हाथ दरबारियों के रचाए षड़यंत्रों पर क्यूँँ दस्तख़त करने की मशीनें हैं उन की ज़बानें सिर्फ़ धमकियाँ बोलती हैं उन के अना-परस्त कान गिड़गिढ़ाहटें सुनने के आदी हो चुके हैं मुशीरों और सलाह-कारों का दावा है कि वो जल्द ही सरबराहों को दस्त-ख़तों की ज़हमत से भी नजात दिलाने का रास्ता ढूँड निकालेंगे!
Aashufta Changezi
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Aashufta Changezi.
Similar Moods
More moods that pair well with Aashufta Changezi's nazm.







