आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो नज़्ज़ारे दिखलाने वाला जग की सैर कराने वाला डब्बा अपने सर पे उठाए गली गली में जाने वाला आज तुम्हारे घर के बाहर रंग जमाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो उस ने डब्बा ला कर रखा तुम ने इक शीशे में झाँका तस्वीरों पर तस्वीरें हैं बिल्ली कुत्ता मैना तोता खेल तमाशे वाला इक संसार बसाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो कितना अच्छा रंग जमाया एक ज़रा सा पेच घुमाया तुम ने चाँदनी चौक को खो कर कलकत्ते के शहर को पाया सर पे उठा कर कलकत्ते का शहर दिखाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो आगरे आओ ताज को देखो कल को देखो आज को देखो चाहो अगर तो यूरोप जा कर अफ़रंगी के राज को देखो तुम को सैर-सपाटे का शौक़ीन बनाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो गाड़ी लाया इंजन लाया पैरिस लाया लंदन लाया गठड़ी अपने सर पे उठाए बारह मन की धोबन लाया जितने रोते बच्चे थे उन सब को हँसाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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ज़र्रे ज़र्रे पे बिजली सी बरसा गईं चलते चलते जो पंखा ज़रा रुक गया जिस को भी छू लिया उस को गरमा गईं झट पसीने का दरिया सा बहने लगा गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं ठंडी ठंडी हवाओं का मौसम गया गर्म पानी है कोई पिए किस तरह काली काली घटाओं का मौसम गया और न पानी पिए तो जिए किस तरह गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में पाँव मिट्टी पे जो पड़ गया लीजिए घर में बाहरस बर्फ़ आ गई धूप में क्या रखा आग पर रख दिया सारे बच्चों में पैदा हुई खलबली गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में घर से बाहर न जाए कोई बर्फ़ वाली कटोरी जो मुँह से लगी जान कर लू का झोंका न खाए कोई सच ये है जान में जान ही आ गई गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं मेज़ भी गर्म है खाट भी गर्म है फ़र्श भी गर्म है टाट भी गर्म है गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं
Jagan Nath Azad
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कितनी रौशन क्यूँँ न हो 'आज़ाद' आख़िर एक दिन शम-ए-हस्ती मौत के झोंकों से गुल हो जाएगी जैसे गहवारे में सो जाता है तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वार ज़ीस्त आग़ोश-ए-अजल में इस तरह सो जाएगी माह ओ अख़्तर हैं ख़जिल जिस से वो चिंगारी ज़रूर इक न इक दिन आलम-ए-ज़ुल्मात में खो जाएगी लेकिन इस ज़ुल्मत-कदे में एक नूर ऐसा भी है गर्दिश-ए-अय्याम जिस के पास आ सकती नहीं एक ऐसा भी है लौह-ए-वक़्त पर नक़्श-ए-दवाम कोई शय भी जिस को आलम से मिटा सकती नहीं मौत झोंके ले के उट्ठे या बगूले ले के आए अज़्मत-ए-किरदार का शो'ला बुझा सकती नहीं
Jagan Nath Azad
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इस तरह आज फिर आबाद है वीराना-ए-दिल कि है लबरेज़ मय-ए-शौक़ से पैमाना-ए-दिल दिल-ए-बेताब में पिन्हाँ है हर अरमान-ए-नज़र चश्म-ए-मुश्ताक़ में है सुर्ख़ी-ए-अफ़्साना-ए-दिल आज शम्ओं से ये कह दो कि ख़बर-दार रहें आज बेदार है ख़ाकिस्तर-ए-परवाना-ए-दिल इस को है एक फ़क़त देखने वाला दरकार तूर से कम तो नहीं जल्वा-ए-जानाना-ए-दिल जाग भी ख़्वाब से ऐ मशरिक़ ओ मग़रिब के हकीम कि तिरे वास्ते लाया हूँ मैं नज़राना-ए-दिल ये ज़रा देख कि आए हैं कहाँ से दोनों दिल तिरी ख़ाक का दीवाना मैं दीवाना-ए-दिल शौक़ की राह में इक सख़्त मक़ाम आया है मिरा टूटा हुआ दिल ही मिरे काम आया है साक़ी-ए-जाँ तिरे मय-ख़ाने का इक रिंद-ए-हक़ीर मिस्ल-ए-बू तोड़ के हर क़ैद-ए-मक़ाम आया है अल्लाह अल्लाह तिरी बज़्म का ये आलम-ए-कैफ़ मेरे हाथों में छलकता हुआ जाम आया है तिरे नाम आज ज़माने के महकते हुए फूल 'ग़ालिब' ओ 'मीर' के गुलशन का सलाम आया है वो मिरी हसरत-ए-देरीना का शहबाज़-ए-जलील कितनी मुद्दत में बिल-आख़िर तह-ए-दाम आया है तुझ को भी दिल में बसाया है जो 'इक़बाल' के साथ तो कहीं जा के ये अंदाज़-ए-कलाम आया है क्यूँँ तुझे ये अबदी नींद पसंद आई है ऐ कि हर लफ़्ज़ तिरा शान-ए-मसीहाई है साक़ी-ए-मय-कदा-ए-ज़ीस्त ज़रा आँख तो खोल तिरी तुर्बत पे सियह मस्त घटा छाई है जाग भी ख़्वाब से दिल-दादा-ए-गुलज़ार-ओ-चमन कि तिरे देस की बाग़ों पे बहार आई है जो तिरे घर में है आज उस चमनिस्ताँ को तो देख ज़र्रे ज़र्रे को जुनून-ए-चमन-आराई है 'हाथवे' का है मकाँ वो कि ''मक़ाम-ए-नौ'' है जो भी ख़ित्ता है वो इक पैकर-ए-ज़ेबाई है कुछ ख़बर भी है कि ऐवाँ की हसीं मौजों में जो तिरे दौर में थी अब भी वो रा'नाई है वो तिरा नग़्मा कि सीनों में तपाँ आज भी है अहल-ए-एहसास का सरमाया-ए-जाँ आज भी है रिंद हैं मशरिक़ ओ मग़रिब में उसी के मुश्ताक़ वो तिरा बादा-ए-कोहना कि जवाँ आज भी है आज भी काबा-ए-अरबाब-ए-नज़र है तिरी फ़िक्र विर्सा-ए-अहल-ए-जुनूँ तेरा बयाँ आज भी है आज से चार सदी क़ब्ल जो चमका था कभी तिरे नग़्मात में वो सोज़-ए-निहाँ आज भी है जिस में है बादा जुनूँ का भी मय-ए-होश के साथ तिरे हाथों में वही रत्ल-ए-गिराँ आज भी है तू ने तमसील के जादे पे दिखाया जो कभी वही मील और वही संग-ए-निशाँ आज भी है ज़ुल्मत-ए-दहर की रातों में सहर-बार है तू ज़ीस्त इक क़ाफ़िला है क़ाफ़िला-सालार है तू तू हर इक दौर में है दीदा-ए-बीना की तरह हर ज़माने में दिल-ए-ज़िंदा-ओ-बेदार है तू जिस की बातों में धड़कता है दिल-ए-अस्र-ए-रवाँ आज तमसील-ए-ज़माना का वो किरदार है तू क्यूँँ न हो लौह ओ क़लम को तिरे उस्लूब पे नाज़ हसन-ए-गुफ़्तार है गंजीना-ए-अफ़्कार है तू बज़्म-ए-जानाँ हो तो अंदाज़ तिरा फूल की शाख़ ज़ुल्म के सामने शमशीर-ए-जिगर-दार है तो तू किसी मुल्क किसी दौर का फ़नकार नहीं बल्कि हर मुल्क का हर दौर का फ़नकार है तू
Jagan Nath Azad
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रात फिर तेरे ख़यालों ने जगाया मुझ को टिमटिमाती हुई यादों का ज़रा सा शो'ला आज भड़का तो फिर इक शोला-ए-जव्वाला बना अक़्ल ने तुझ को भुलाने के किए लाख जतन ले गए मुझ को कभी मिस्र के बाज़ारों में कभी इटली कभी एस्पेन के गुलज़ारों में बेल्जियम के, कभी हॉलैंड के मय-ख़ानों में कभी पैरिस, कभी लंदन के सनम-ख़ानों में और मैं अक़्ल की बातों में कुछ ऐसा आया मैं ये समझा कि तुझे भूल चुका हूँ शायद दिल ने तो मुझ से कई बार कहा वहम है ये इस तरह तुझ को भुलाना कोई आसान नहीं मैं मगर वहम में कुछ ऐसा गिरफ़्तार रहा मैं ये समझा कि तुझे भूल चुका हूँ शायद कल मगर फिर तिरी आवाज़ ने तड़पा ही दिया आलम-ए-ख़्वाब से गोया मुझे चौंका ही दिया और फिर तेरा हर इक नक़्श मिरे सामने था तिरी ज़ुल्फ़ें, तिरी ज़ुल्फ़ों की घटाओं का समाँ तिरी चितवन, तिरी चितवन वही बातिन का सुराग़ तिरे आरिज़ वही ख़ुश-रंग महकते हुए फूल तिरी आँखें वो शराबों के छलकते हुए जाम तिरे लब जैसे सजाए हुए दो बर्ग-ए-गुलाब तिरी हर बात का अंदाज़ तिरी चाल का हुस्न तिरे आने का नज़ारा तिरे जाने का समाँ तिरा हर नक़्श तो क्या तू ही मिरे सामने थी दिल ने जो बात कई बार कही थी मुझ से शब के अनवार में भी दिन के अँधेरों में भी मिरे एहसास में अब गूँज रही थी पैहम इस तरह तुझ को भुलाना कोई आसान नहीं दिल हक़ीक़त है कोई ख़्वाब-ए-परेशाँ तो नहीं याद मानिंद-ए-ख़िरद मस्लहत-अंदेश नहीं डूबती ये नहीं हॉलैंड के मय-ख़ानों में गुम नहीं होती ये पैरिस के सनम-ख़ानों में ये भटकती नहीं एस्पेन के गुलज़ारों में भूलती राह नहीं मिस्र के बाज़ारों में याद मानिंद-ए-ख़िरद मस्लहत-अंदेश नहीं अक़्ल अय्यार है सौ भेस बना लेती है याद का आज भी अंदाज़ वही है कि जो था आज भी उस का है आहंग वही रंग वही भेस है उस का वही तौर वही ढंग वही फिर इसी याद ने कल रात जगाया मुझ को और फिर तेरा हर इक नक़्श मिरे सामने था
Jagan Nath Azad
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इस दौर में तू क्यूँँ है परेशान-ओ-हिरासाँ क्या बात है क्यूँँ है मुतज़लज़ल तेरा ईमाँ दानिश-कदा-ए-दहर की ऐ शम-ए-फ़रोज़ाँ ऐ मतला-ए-तहज़ीब के ख़ुर्शीद-ए-दरख़्शाँ हैरत है घटाओं में तेरा नूर हो तरसाँ भारत के मुसलमाँ तू दर्द-ए-मोहब्बत का तलबगार अज़ल से तू मेहर-ओ-मुरव्वत का परस्तार अज़ल से तू महरम-ए-हर-लज़्ज़त-ए-असरार अज़ल से विर्सा तेरा रानाई-ए-अफ़कार अज़ल से रानाई-ए-अफ़कार को कर फिर से ग़ज़ल-ख़्वाँ भारत के मुसलमाँ हरगिज़ न भला 'मीर' का 'ग़ालिब' का तराना बन जाए कहीं तेरी हक़ीक़त न फ़साना क़ज़्ज़ाक़-ए-फ़ना को तो है दरकार बहाना ताराज न हो 'क़ासिम'-ओ-'सय्यद' का ख़ज़ाना ऐ 'क़ासिम'-ओ-'सय्यद' के ख़ज़ाने के निगहबाँ भारत के मुसलमाँ 'हाफ़िज़' के तरन्नुम को बसा क़ल्ब-ओ-नज़र में 'रूमी' के तफ़क्कुर को सजा क़ल्ब-ओ-नज़र में 'सादी' के तकल्लुम को बिठा क़ल्ब-ओ-नज़र में दे नग़्मा-ए-'ख़य्याम' को जा क़ल्ब-ओ-नज़र में ये लहन हो फिर हिन्द की दुनिया में हो अफ़्शाँ भारत के मुसलमाँ तूफ़ान में तू ढूँढ़ रहा है जो किनारा अमवाज का कर दीदा-ए-बातिन से नज़ारा मुमकिन है कि हर मौज बने तेरा सहारा मुमकिन है कि हर मौज नज़र को हो गवारा मुमकिन है कि साहिल हो पस-ए-पर्दा-ए-तूफ़ाँ भारत के मुसलमाँ ज़ाहिर की मोहब्बत से मुरव्वत से गुज़र जा बातिन की अदावत से कुदूरत से गुज़र जा बे-कार दिल-अफ़गार क़यादत से गुज़र जा इस दौर की बोसीदा सियासत से गुज़र जा और अज़्म से फिर थाम ज़रा दामन-ए-ईमाँ भारत के मुसलमाँ इस्लाम की ता'लीम से बेगाना हुआ तू ना-महरम-ए-हर-जुरअत-ए-रिंदाना हुआ तू आबादी-ए-हर-बज़्म था वीराना हुआ तू तू एक हक़ीक़त था अब अफ़्साना हुआ तू मुमकिन हो तो फिर ढूँढ़ गँवाए हुए सामाँ भारत के मुसलमाँ अजमेर की दरगाह-ए-मुअ'ल्ला तेरी जागीर महबूब-ए-इलाही की ज़मीं पर तिरी तनवीर ज़र्रात में कलियर के फ़रोज़ाँ तिरी तस्वीर हांसी की फ़ज़ाओं में तिरे कैफ़ की तासीर सरहिंद की मिट्टी से तिरे दम से फ़रोज़ाँ भारत के मुसलमाँ हर ज़र्रा-ए-देहली है तिरे ज़ौ से मुनव्वर पंजाब की मस्ती असर-ए-जज़्ब-ए-क़लंदर गंगोह की तक़्दीस से क़ुद्दूस सरासर पटने की ज़मीं निकहत-ए-ख़्वाजा से मोअ'त्तर मद्रास की मिट्टी में निहाँ ताज-ए-शहीदाँ भारत के मुसलमाँ 'बस्तामी'ओ-'बसरी'-ओ-'मुअर्रा'-ओ-'ग़ज़ाली' जिस इल्म की जिस फ़क़्र की दुनिया के थे वाली हैरत है तू अब है उसी दुनिया में सवाली है गोशा-ए-पस्ती में तिरी हिम्मत-ए-आली अफ़्सोस-सद-अफ़्सोस तिरी तंगी-ए-दामाँ भारत के मुसलमाँ मज़हब जिसे कहते हैं वो कुछ और है प्यारे नफ़रत से परे इस का हर इक तौर है प्यारे मज़हब में तअ'स्सुब तो बड़ा जौर है प्यारे अक़्ल-ओ-ख़िरद-ओ-इल्म का ये दौर है प्यारे इस दौर में मज़हब की सदाक़त हो नुमायाँ भारत के मुसलमाँ इस्लाम तो मेहर और मोहब्बत का बयाँ है इख़्लास की रूदाद-ए-मुरव्वत का बयाँ है हर शो'बा-ए-हस्ती में सदाक़त का बयाँ है एक ज़िंदा-ओ-पाइंदा हक़ीक़त का बयाँ है क्यूँँ दिल में तिरे हो न हक़ीक़त ये फ़रोज़ाँ भारत के मुसलमाँ इस्लाम की ता'लीम फ़रामोश हुई क्यूँँ इंसान की ताज़ीम फ़रामोश हुई क्यूँँ अफ़राद की तंज़ीम फ़रामोश हुई क्यूँँ ख़ल्लास की अक़्लीम फ़रामोश हुई क्यूँँ हैरत में हूँ मैं देख के ये आलम-ए-निस्याँ भारत के मुसलमाँ माहौल की हो ताज़ा हवा तुझ को गवारा दरकार है तहज़ीब को फिर तेरा सहारा कर आज नए रंग से दुनिया का नज़ारा चमकेगा फिर इक बार तिरे बख़्त का तारा हो जाएगी तारीकी-ए-माहौल गुरेज़ाँ भारत के मुसलमाँ
Jagan Nath Azad
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