nazmKuch Alfaaz

इस दौर में तू क्यूँँ है परेशान-ओ-हिरासाँ क्या बात है क्यूँँ है मुतज़लज़ल तेरा ईमाँ दानिश-कदा-ए-दहर की ऐ शम-ए-फ़रोज़ाँ ऐ मतला-ए-तहज़ीब के ख़ुर्शीद-ए-दरख़्शाँ हैरत है घटाओं में तेरा नूर हो तरसाँ भारत के मुसलमाँ तू दर्द-ए-मोहब्बत का तलबगार अज़ल से तू मेहर-ओ-मुरव्वत का परस्तार अज़ल से तू महरम-ए-हर-लज़्ज़त-ए-असरार अज़ल से विर्सा तेरा रानाई-ए-अफ़कार अज़ल से रानाई-ए-अफ़कार को कर फिर से ग़ज़ल-ख़्वाँ भारत के मुसलमाँ हरगिज़ न भला 'मीर' का 'ग़ालिब' का तराना बन जाए कहीं तेरी हक़ीक़त न फ़साना क़ज़्ज़ाक़-ए-फ़ना को तो है दरकार बहाना ताराज न हो 'क़ासिम'-ओ-'सय्यद' का ख़ज़ाना ऐ 'क़ासिम'-ओ-'सय्यद' के ख़ज़ाने के निगहबाँ भारत के मुसलमाँ 'हाफ़िज़' के तरन्नुम को बसा क़ल्ब-ओ-नज़र में 'रूमी' के तफ़क्कुर को सजा क़ल्ब-ओ-नज़र में 'सादी' के तकल्लुम को बिठा क़ल्ब-ओ-नज़र में दे नग़्मा-ए-'ख़य्याम' को जा क़ल्ब-ओ-नज़र में ये लहन हो फिर हिन्द की दुनिया में हो अफ़्शाँ भारत के मुसलमाँ तूफ़ान में तू ढूँढ़ रहा है जो किनारा अमवाज का कर दीदा-ए-बातिन से नज़ारा मुमकिन है कि हर मौज बने तेरा सहारा मुमकिन है कि हर मौज नज़र को हो गवारा मुमकिन है कि साहिल हो पस-ए-पर्दा-ए-तूफ़ाँ भारत के मुसलमाँ ज़ाहिर की मोहब्बत से मुरव्वत से गुज़र जा बातिन की अदावत से कुदूरत से गुज़र जा बे-कार दिल-अफ़गार क़यादत से गुज़र जा इस दौर की बोसीदा सियासत से गुज़र जा और अज़्म से फिर थाम ज़रा दामन-ए-ईमाँ भारत के मुसलमाँ इस्लाम की ता'लीम से बेगाना हुआ तू ना-महरम-ए-हर-जुरअत-ए-रिंदाना हुआ तू आबादी-ए-हर-बज़्म था वीराना हुआ तू तू एक हक़ीक़त था अब अफ़्साना हुआ तू मुमकिन हो तो फिर ढूँढ़ गँवाए हुए सामाँ भारत के मुसलमाँ अजमेर की दरगाह-ए-मुअ'ल्ला तेरी जागीर महबूब-ए-इलाही की ज़मीं पर तिरी तनवीर ज़र्रात में कलियर के फ़रोज़ाँ तिरी तस्वीर हांसी की फ़ज़ाओं में तिरे कैफ़ की तासीर सरहिंद की मिट्टी से तिरे दम से फ़रोज़ाँ भारत के मुसलमाँ हर ज़र्रा-ए-देहली है तिरे ज़ौ से मुनव्वर पंजाब की मस्ती असर-ए-जज़्ब-ए-क़लंदर गंगोह की तक़्दीस से क़ुद्दूस सरासर पटने की ज़मीं निकहत-ए-ख़्वाजा से मोअ'त्तर मद्रास की मिट्टी में निहाँ ताज-ए-शहीदाँ भारत के मुसलमाँ 'बस्तामी'ओ-'बसरी'-ओ-'मुअर्रा'-ओ-'ग़ज़ाली' जिस इल्म की जिस फ़क़्र की दुनिया के थे वाली हैरत है तू अब है उसी दुनिया में सवाली है गोशा-ए-पस्ती में तिरी हिम्मत-ए-आली अफ़्सोस-सद-अफ़्सोस तिरी तंगी-ए-दामाँ भारत के मुसलमाँ मज़हब जिसे कहते हैं वो कुछ और है प्यारे नफ़रत से परे इस का हर इक तौर है प्यारे मज़हब में तअ'स्सुब तो बड़ा जौर है प्यारे अक़्ल-ओ-ख़िरद-ओ-इल्म का ये दौर है प्यारे इस दौर में मज़हब की सदाक़त हो नुमायाँ भारत के मुसलमाँ इस्लाम तो मेहर और मोहब्बत का बयाँ है इख़्लास की रूदाद-ए-मुरव्वत का बयाँ है हर शो'बा-ए-हस्ती में सदाक़त का बयाँ है एक ज़िंदा-ओ-पाइंदा हक़ीक़त का बयाँ है क्यूँँ दिल में तिरे हो न हक़ीक़त ये फ़रोज़ाँ भारत के मुसलमाँ इस्लाम की ता'लीम फ़रामोश हुई क्यूँँ इंसान की ताज़ीम फ़रामोश हुई क्यूँँ अफ़राद की तंज़ीम फ़रामोश हुई क्यूँँ ख़ल्लास की अक़्लीम फ़रामोश हुई क्यूँँ हैरत में हूँ मैं देख के ये आलम-ए-निस्याँ भारत के मुसलमाँ माहौल की हो ताज़ा हवा तुझ को गवारा दरकार है तहज़ीब को फिर तेरा सहारा कर आज नए रंग से दुनिया का नज़ारा चमकेगा फिर इक बार तिरे बख़्त का तारा हो जाएगी तारीकी-ए-माहौल गुरेज़ाँ भारत के मुसलमाँ

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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ज़र्रे ज़र्रे पे बिजली सी बरसा गईं चलते चलते जो पंखा ज़रा रुक गया जिस को भी छू लिया उस को गरमा गईं झट पसीने का दरिया सा बहने लगा गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं ठंडी ठंडी हवाओं का मौसम गया गर्म पानी है कोई पिए किस तरह काली काली घटाओं का मौसम गया और न पानी पिए तो जिए किस तरह गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में पाँव मिट्टी पे जो पड़ गया लीजिए घर में बाहरस बर्फ़ आ गई धूप में क्या रखा आग पर रख दिया सारे बच्चों में पैदा हुई खलबली गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में घर से बाहर न जाए कोई बर्फ़ वाली कटोरी जो मुँह से लगी जान कर लू का झोंका न खाए कोई सच ये है जान में जान ही आ गई गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं मेज़ भी गर्म है खाट भी गर्म है फ़र्श भी गर्म है टाट भी गर्म है गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं

Jagan Nath Azad

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दामन-ए-लाला-ज़ार में आलम-ए-पुर-बहार देख कल्ला-ए-कोहसार पर जल्वा-ए-ज़र-निगार देख आब-ए-रवाँ की बात क्या ख़ाक पे है निखार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख देख नशात बाग़ में जल्वा-ए-सुब्ह का समाँ कैफ़ ओ नशात है ज़मीं नूर ओ सुरूर आसमाँ आह ये मंज़र-ए-जमील हाए ये जाँ-फ़ज़ा समाँ औज-ए-फ़लक से है रवाँ नूर का आबशार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख धार के कश्तियों का रूप ''डल'' पे रवाँ है ज़िंदगी चार तरफ़ फ़ज़ाओं में इत्र-फ़शाँ है ज़िंदगी बाद-ए-दज़ां है ज़िंदगी शोला-ब-जाँ है ज़िंदगी चर्ख़-ए-तख़य्युलात पर काहकशाँ है ज़िंदगी चेहरा-ब-चेहरा रू-ब-रू हुस्न का ये निखार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख ख़्वाह ''वुलर'' की झील है ख़्वाह फ़ज़ा-ए-पहल-गाम एक से बढ़ के एक है जो भी नज़र में है मक़ाम देख कि उन फ़ज़ाओं में फूल शराब के हैं जाम घास है फ़र्श-ए-मख़मलीं ज़र्रे हैं आसमाँ-मक़ाम और नहीं तुझे नसीब एक भी लम्हे का क़याम मौज-ए-नसीम-ए-सुब्ह से राज़ ये आश्कार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख

Jagan Nath Azad

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कितनी रौशन क्यूँँ न हो 'आज़ाद' आख़िर एक दिन शम-ए-हस्ती मौत के झोंकों से गुल हो जाएगी जैसे गहवारे में सो जाता है तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वार ज़ीस्त आग़ोश-ए-अजल में इस तरह सो जाएगी माह ओ अख़्तर हैं ख़जिल जिस से वो चिंगारी ज़रूर इक न इक दिन आलम-ए-ज़ुल्मात में खो जाएगी लेकिन इस ज़ुल्मत-कदे में एक नूर ऐसा भी है गर्दिश-ए-अय्याम जिस के पास आ सकती नहीं एक ऐसा भी है लौह-ए-वक़्त पर नक़्श-ए-दवाम कोई शय भी जिस को आलम से मिटा सकती नहीं मौत झोंके ले के उट्ठे या बगूले ले के आए अज़्मत-ए-किरदार का शो'ला बुझा सकती नहीं

Jagan Nath Azad

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मैं इस ख़याल में था बुझ चुकी है आतिश-ए-दर्द भड़क रही थी मिरे दिल में जो ज़माने से मैं इस ख़याल में था हो चुकी है आग वो सर्द वो एक शोला-ए-दर्द-आफ़रीं मता-ए-हयात मैं इस ख़याल में था मैं उसे बचा न सका गुमाँ ये था कि वो इक शोला-ए-हयात-अफ़रोज़ हवा-ए-पैरिस-ओ-लंदन की ताब ला न सका मैं सोचता था कि शायद भुला चुका हूँ तुझे जो अपने दिल की कहानी तुझे सुनाना थी वो अपने साज़-ए-ग़ज़ल पर सुना चुका हूँ तुझे कुछ ऐसा मुझ को गुमाँ था तुफ़ैल-ए-मरहम-ए-वक़्त कोई भी घाव हो इक रोज़ भर ही जाता है ज़माना वक़्त के पर्दे पे हर घड़ी शायद नया तिलिस्म नई दिलकशी सजाता है जो हैं रफ़ीक़-ए-दिल-ओ-जान उन आँसुओं की क़सम तिरे हुज़ूर अभी तक जो बार पा न सके जिन्हें है तुझ से सिवा तिरी आबरू का ख़याल जो दिल में रुक न सके और मिज़ा तक आ न सका मिला हूँ आज मैं तुझ से तो वसवसे ये तमाम मिटे ख़याल की दुनिया से मिस्ल-ए-नक़्श-बर-आब पता चला कि वो शो'ला बुझा नहीं है अभी बस इतनी बात है अब जल रहा है ज़ेर-ए-नक़ाब नक़ाब-ए-वक़्त-ओ-मसाफ़त के दो दबीज़ हिजाब गुज़र गई तिरी फ़ुर्क़त में ज़िंदगी जितनी अदन की सुब्ह कि पैरिस की रात में गुज़री दिल ओ नज़र के किसी वारदात में गुज़री कि इक हसीना-ए-आलम से बात में गुज़री फ़क़त वो एक नदामत है और कुछ भी नहीं और आज मेरी नदामत का ये शदीद एहसास हर एक साँस में मुझ से सवाल करता है हवस है इश्क़ से कितने क़दम? दो-चार क़दम? किया है फ़ासला उन में कई हज़ार क़दम? पिकैडली में भी हम याद थे तुझे कि न थे पिगाल में भी ख़लिश कोई दिल में थी की न थी वो शाम टेम्स की अब भी नज़र में है कि नहीं कि जब हवस की नज़र पर कोई हिजाब न था वो सतह-ए-बहर पे रक़्साँ जहाज़ का अर्शा और उस पे चार तरफ़ एक नूर का आलम कि जैसे बर्क़-ए-तजल्ली-ए-तूर का आलम वेलेंशिया में वो रक़्स-ए-बरहनगी के तिलिस्म तिरी निगाह-ए-तमाशा को कुछ झिजक तो न थी ये इक सवाल कि जिस के हज़ार पहलू हैं मैं एक लम्हे को जब इन पे ग़ौर करता हूँ तो सोचता हूँ की मैं तुझ से अब मलूँ न मलूँ

Jagan Nath Azad

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आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो नज़्ज़ारे दिखलाने वाला जग की सैर कराने वाला डब्बा अपने सर पे उठाए गली गली में जाने वाला आज तुम्हारे घर के बाहर रंग जमाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो उस ने डब्बा ला कर रखा तुम ने इक शीशे में झाँका तस्वीरों पर तस्वीरें हैं बिल्ली कुत्ता मैना तोता खेल तमाशे वाला इक संसार बसाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो कितना अच्छा रंग जमाया एक ज़रा सा पेच घुमाया तुम ने चाँदनी चौक को खो कर कलकत्ते के शहर को पाया सर पे उठा कर कलकत्ते का शहर दिखाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो आगरे आओ ताज को देखो कल को देखो आज को देखो चाहो अगर तो यूरोप जा कर अफ़रंगी के राज को देखो तुम को सैर-सपाटे का शौक़ीन बनाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो गाड़ी लाया इंजन लाया पैरिस लाया लंदन लाया गठड़ी अपने सर पे उठाए बारह मन की धोबन लाया जितने रोते बच्चे थे उन सब को हँसाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया

Jagan Nath Azad

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