nazmKuch Alfaaz

कितनी रौशन क्यूँँ न हो 'आज़ाद' आख़िर एक दिन शम-ए-हस्ती मौत के झोंकों से गुल हो जाएगी जैसे गहवारे में सो जाता है तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वार ज़ीस्त आग़ोश-ए-अजल में इस तरह सो जाएगी माह ओ अख़्तर हैं ख़जिल जिस से वो चिंगारी ज़रूर इक न इक दिन आलम-ए-ज़ुल्मात में खो जाएगी लेकिन इस ज़ुल्मत-कदे में एक नूर ऐसा भी है गर्दिश-ए-अय्याम जिस के पास आ सकती नहीं एक ऐसा भी है लौह-ए-वक़्त पर नक़्श-ए-दवाम कोई शय भी जिस को आलम से मिटा सकती नहीं मौत झोंके ले के उट्ठे या बगूले ले के आए अज़्मत-ए-किरदार का शो'ला बुझा सकती नहीं

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

BR SUDHAKAR

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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ज़र्रे ज़र्रे पे बिजली सी बरसा गईं चलते चलते जो पंखा ज़रा रुक गया जिस को भी छू लिया उस को गरमा गईं झट पसीने का दरिया सा बहने लगा गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं ठंडी ठंडी हवाओं का मौसम गया गर्म पानी है कोई पिए किस तरह काली काली घटाओं का मौसम गया और न पानी पिए तो जिए किस तरह गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में पाँव मिट्टी पे जो पड़ गया लीजिए घर में बाहरस बर्फ़ आ गई धूप में क्या रखा आग पर रख दिया सारे बच्चों में पैदा हुई खलबली गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में घर से बाहर न जाए कोई बर्फ़ वाली कटोरी जो मुँह से लगी जान कर लू का झोंका न खाए कोई सच ये है जान में जान ही आ गई गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं मेज़ भी गर्म है खाट भी गर्म है फ़र्श भी गर्म है टाट भी गर्म है गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं

Jagan Nath Azad

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दामन-ए-लाला-ज़ार में आलम-ए-पुर-बहार देख कल्ला-ए-कोहसार पर जल्वा-ए-ज़र-निगार देख आब-ए-रवाँ की बात क्या ख़ाक पे है निखार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख देख नशात बाग़ में जल्वा-ए-सुब्ह का समाँ कैफ़ ओ नशात है ज़मीं नूर ओ सुरूर आसमाँ आह ये मंज़र-ए-जमील हाए ये जाँ-फ़ज़ा समाँ औज-ए-फ़लक से है रवाँ नूर का आबशार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख धार के कश्तियों का रूप ''डल'' पे रवाँ है ज़िंदगी चार तरफ़ फ़ज़ाओं में इत्र-फ़शाँ है ज़िंदगी बाद-ए-दज़ां है ज़िंदगी शोला-ब-जाँ है ज़िंदगी चर्ख़-ए-तख़य्युलात पर काहकशाँ है ज़िंदगी चेहरा-ब-चेहरा रू-ब-रू हुस्न का ये निखार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख ख़्वाह ''वुलर'' की झील है ख़्वाह फ़ज़ा-ए-पहल-गाम एक से बढ़ के एक है जो भी नज़र में है मक़ाम देख कि उन फ़ज़ाओं में फूल शराब के हैं जाम घास है फ़र्श-ए-मख़मलीं ज़र्रे हैं आसमाँ-मक़ाम और नहीं तुझे नसीब एक भी लम्हे का क़याम मौज-ए-नसीम-ए-सुब्ह से राज़ ये आश्कार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख

Jagan Nath Azad

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मैं इस ख़याल में था बुझ चुकी है आतिश-ए-दर्द भड़क रही थी मिरे दिल में जो ज़माने से मैं इस ख़याल में था हो चुकी है आग वो सर्द वो एक शोला-ए-दर्द-आफ़रीं मता-ए-हयात मैं इस ख़याल में था मैं उसे बचा न सका गुमाँ ये था कि वो इक शोला-ए-हयात-अफ़रोज़ हवा-ए-पैरिस-ओ-लंदन की ताब ला न सका मैं सोचता था कि शायद भुला चुका हूँ तुझे जो अपने दिल की कहानी तुझे सुनाना थी वो अपने साज़-ए-ग़ज़ल पर सुना चुका हूँ तुझे कुछ ऐसा मुझ को गुमाँ था तुफ़ैल-ए-मरहम-ए-वक़्त कोई भी घाव हो इक रोज़ भर ही जाता है ज़माना वक़्त के पर्दे पे हर घड़ी शायद नया तिलिस्म नई दिलकशी सजाता है जो हैं रफ़ीक़-ए-दिल-ओ-जान उन आँसुओं की क़सम तिरे हुज़ूर अभी तक जो बार पा न सके जिन्हें है तुझ से सिवा तिरी आबरू का ख़याल जो दिल में रुक न सके और मिज़ा तक आ न सका मिला हूँ आज मैं तुझ से तो वसवसे ये तमाम मिटे ख़याल की दुनिया से मिस्ल-ए-नक़्श-बर-आब पता चला कि वो शो'ला बुझा नहीं है अभी बस इतनी बात है अब जल रहा है ज़ेर-ए-नक़ाब नक़ाब-ए-वक़्त-ओ-मसाफ़त के दो दबीज़ हिजाब गुज़र गई तिरी फ़ुर्क़त में ज़िंदगी जितनी अदन की सुब्ह कि पैरिस की रात में गुज़री दिल ओ नज़र के किसी वारदात में गुज़री कि इक हसीना-ए-आलम से बात में गुज़री फ़क़त वो एक नदामत है और कुछ भी नहीं और आज मेरी नदामत का ये शदीद एहसास हर एक साँस में मुझ से सवाल करता है हवस है इश्क़ से कितने क़दम? दो-चार क़दम? किया है फ़ासला उन में कई हज़ार क़दम? पिकैडली में भी हम याद थे तुझे कि न थे पिगाल में भी ख़लिश कोई दिल में थी की न थी वो शाम टेम्स की अब भी नज़र में है कि नहीं कि जब हवस की नज़र पर कोई हिजाब न था वो सतह-ए-बहर पे रक़्साँ जहाज़ का अर्शा और उस पे चार तरफ़ एक नूर का आलम कि जैसे बर्क़-ए-तजल्ली-ए-तूर का आलम वेलेंशिया में वो रक़्स-ए-बरहनगी के तिलिस्म तिरी निगाह-ए-तमाशा को कुछ झिजक तो न थी ये इक सवाल कि जिस के हज़ार पहलू हैं मैं एक लम्हे को जब इन पे ग़ौर करता हूँ तो सोचता हूँ की मैं तुझ से अब मलूँ न मलूँ

Jagan Nath Azad

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रात फिर तेरे ख़यालों ने जगाया मुझ को टिमटिमाती हुई यादों का ज़रा सा शो'ला आज भड़का तो फिर इक शोला-ए-जव्वाला बना अक़्ल ने तुझ को भुलाने के किए लाख जतन ले गए मुझ को कभी मिस्र के बाज़ारों में कभी इटली कभी एस्पेन के गुलज़ारों में बेल्जियम के, कभी हॉलैंड के मय-ख़ानों में कभी पैरिस, कभी लंदन के सनम-ख़ानों में और मैं अक़्ल की बातों में कुछ ऐसा आया मैं ये समझा कि तुझे भूल चुका हूँ शायद दिल ने तो मुझ से कई बार कहा वहम है ये इस तरह तुझ को भुलाना कोई आसान नहीं मैं मगर वहम में कुछ ऐसा गिरफ़्तार रहा मैं ये समझा कि तुझे भूल चुका हूँ शायद कल मगर फिर तिरी आवाज़ ने तड़पा ही दिया आलम-ए-ख़्वाब से गोया मुझे चौंका ही दिया और फिर तेरा हर इक नक़्श मिरे सामने था तिरी ज़ुल्फ़ें, तिरी ज़ुल्फ़ों की घटाओं का समाँ तिरी चितवन, तिरी चितवन वही बातिन का सुराग़ तिरे आरिज़ वही ख़ुश-रंग महकते हुए फूल तिरी आँखें वो शराबों के छलकते हुए जाम तिरे लब जैसे सजाए हुए दो बर्ग-ए-गुलाब तिरी हर बात का अंदाज़ तिरी चाल का हुस्न तिरे आने का नज़ारा तिरे जाने का समाँ तिरा हर नक़्श तो क्या तू ही मिरे सामने थी दिल ने जो बात कई बार कही थी मुझ से शब के अनवार में भी दिन के अँधेरों में भी मिरे एहसास में अब गूँज रही थी पैहम इस तरह तुझ को भुलाना कोई आसान नहीं दिल हक़ीक़त है कोई ख़्वाब-ए-परेशाँ तो नहीं याद मानिंद-ए-ख़िरद मस्लहत-अंदेश नहीं डूबती ये नहीं हॉलैंड के मय-ख़ानों में गुम नहीं होती ये पैरिस के सनम-ख़ानों में ये भटकती नहीं एस्पेन के गुलज़ारों में भूलती राह नहीं मिस्र के बाज़ारों में याद मानिंद-ए-ख़िरद मस्लहत-अंदेश नहीं अक़्ल अय्यार है सौ भेस बना लेती है याद का आज भी अंदाज़ वही है कि जो था आज भी उस का है आहंग वही रंग वही भेस है उस का वही तौर वही ढंग वही फिर इसी याद ने कल रात जगाया मुझ को और फिर तेरा हर इक नक़्श मिरे सामने था

Jagan Nath Azad

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बाद-ओ-बाराँ से उलझता ख़ंदा-ज़न गिर्दाब पर इक जज़ीरा तैरता जाता है सतह-ए-आब पर गुम कई सदियों का उस में जज़्बा-ए-तहक़ीक़ है ये जज़ीरा आदमी के ज़ेहन की तख़्लीक़ है जा रहा है हर घड़ी मौजों से टकराता हुआ अपने ही अंदाज़ में अपना रजज़ गाता हुआ बहर की अमवाज पर बहते हुए शहर-ए-जमील हर क़दम तेरा लिए है तेरी अज़्मत की दलील आँधियों का ज़ोर, मौजों की रवानी तुझ में है इर्तिक़ा-ए-ज़ेहन-ए-इंसाँ की कहानी तुझ में है हर भँवर में और हर तूफ़ान में साहिल है तू सीना-ए-इमरोज़-ओ-फ़र्दा का धड़कता दिल है तू तो तजल्ली ही तजल्ली है अँधेरी रात में रौशनी का है मनारा आलम-ए-ज़ुल्मात में रात आई जाग उठा इंसाँ का ज़ौक़-ए-बे-बिसात आख़िरी इस का ठिकाना मर्द ओ ज़न का इख़्तिलात किस क़दर अर्ज़ां हुए तहज़ीब के लमआत-ए-नूर अल्लाह अल्लाह चार जानिब रौशनी का ये वफ़ूर इस तरह से मैं ने कब देखी थी मय-ख़ाने में धूम औरतों मर्दों का लड़कों लड़कियों का ये हुजूम सब नशे में मस्त हैं लेकिन हैं कितने बा-ख़बर फिर रहे हैं सब के सब इक दूसरे को थाम कर अहमरीं साग़र, लब-ए-ल'अलीं, निगाहें मय-फ़रोश हर तरफ़ है एक मस्ती, हर तरफ़ है इक ख़रोश इस जगह इदराक से बेगाना कोई भी नहीं सब हैं फ़रज़ाने यहाँ दीवाना कोई भी नहीं अक़्ल की इस बज़्म में दीवानगी का काम क्या ढूँढ़ता है तू यहाँ आ कर दिल-ए-नाकाम क्या इतनी आगाही किसी को हो ये मोहलत ही नहीं किस की बाहें किस की गर्दन में हमाइल हो गईं आ के आग़ोश-ए-हवस में ख़ुद यहाँ गिरता है हुस्न किस क़दर कच्चे सहारे ढूँढ़ता फिरता है हुस्न जिस से ख़ीरा तेरी आँखें हैं चमक यूरोप की है देख ऐ 'आज़ाद'! ये पहली झलक यूरोप की है

Jagan Nath Azad

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